| 'भारतीयों में एड्स का ज़्यादा ख़तरा' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में हुए एक शोध से पता चला है कि पश्चिमी देशों के नागरिकों की तुलना में एचआईवी से ग्रस्त भारतीयों में एड्स होने का ख़तरा ज़्यादा है. दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में किए गए इस शोध के मुताबिक भारतीयों के शरीर में प्रतिरोध क्षमता कम होती है. ये उनके शरीर में मौजूद कुछ जीन के कारण है जिससे एचआईवी का एड्स में परिवर्तन तेज़ हो जाता है. एचआईवी से एड्स तक संस्थान के शोधकर्ताओं ने दो तरह के जीन का अध्ययन किया. इस शोध करने वाली टीम के अध्यक्ष डॉक्टर एनके मेहरा ने बीबीसी को बताया कि इन जीन्स के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि कुछ लोगों में एचआईवी एड्स में परिवर्तित होने में ज़्यादा समय क्यों लेता है. दरअसल, अन्य लोगों के मुकाबले में भारतीय में वह जीन पाने की संभावना ढ़ाई गुना ज़्यादा है जिसके कारण ऐसा होता है. जबकि दूसरा जीन जो कुछ सुरक्षा प्रदान करता है उसे पाने की संभावना कम है. डाक्टर मेहरा ने 200 एचआईवी से ग्रस्त लोगों और 2000 स्वस्थ लोगों पर अध्ययन किया. उनका कहना था, "ये शोध दो साल में किया गया और इसके बारे में नेचुरल मेडिसन पत्रिका में लिखा जा चुका है." एक एड्स विशेषज्ञ डॉक्टर समरजीत जाना का कहना था कि ये इस क्षेत्र में एक बड़ी खोज हो सकती है. उनका कहना था, "यदि ऐसा है तो एचआईवी से एड्स तक के रास्ते में जीन की भूमिका पर शोध के नए आयाम खुल सकते हैं." |
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