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ख़तने से एचआईवी का ख़तरा कम | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत में हुए एक शोध के बाद दावा किया गया है कि ख़तने वाले लोगों में एचआईवी संक्रमण होने का आसार बिना ख़तने वाले लोगों की तुलना में छह गुना कम होता है. प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका लैंसेट में छपी ख़बर में बताया गया है कि पुरूषों की जननेंद्रिय की पतली चमड़ी पर एचआईवी वायरस ज़्यादा कारगर तरीक़े से हमला करता है. शोध के मुताबिक़, ख़तने में जिनके लिंग के अगले हिस्से की चमड़ी हटा दी जाती है उनके लिए संक्रमण का ख़तरा कम हो जाता है. यह शोध भारत में दो हज़ार से अधिक लोगों पर किया गया और इसके परिणाम अफ्रीका में पहले हो चुके शोध से मिलते-जुलते हैं. शोध करने वालों का कहना है कि ख़तने की वजह से एचआईवी संक्रमण से तो बचाव होता है लेकिन दूसरे यौन रोगों से नहीं. पहले भी कई और शोधों में भी यही बात कही गई है कि ख़तने से एचआईवी का ख़तरा कम हो जाता है. जब पहले पहल 1980 के दशक में अफ्रीका में एड्स रोग फैलना शुरू हुआ तो शोधकर्ताओं ने पाया कि अफ्रीका के पूर्वी और दक्षिणी भागों में बीमारी का असर ज़्यादा है जबकि पश्चिमी भागों में कम. माना गया कि इस अंतर की वजह है लोगों के यौन व्यवहार में अंतर. मगर तब भी कुछ वैज्ञानिकों का कहना था कि पश्चिमी अफ्रीका में ख़तने का आम चलन है इसलिए वहाँ के लोग कम प्रभावित हो रहे हैं. वैज्ञानिकों का तब भी मानना था कि लिंग की बाहरी पतली चमड़ी एचआईवी के वायरस के लिए आसान शिकार है जहाँ से संक्रमण फैलना शुरू होता है. अब भारत में हुए ताज़ा शोध से यही साबित होता है कि ख़तने का एचआईवी संक्रमण से संबंध है. वैज्ञानिकों का कहना है कि लिंग की चमड़ी ऐसी कोशिकाओं से बनी होती है जिस पर एचआईवी वायरस सबसे पहले हमला करते हैं. |
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