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'एचआईवी पीड़ित को भी नौकरी देनी होगी'
भारत में क़ानूनी विशेषज्ञ एचआइवी से ग्रस्त लोगों के साथ नौकरी में भेदभाव को रोकने के लिए एक नए क़ानून का मसौदा तैयार करने में लगे हैं. एक संसदीय समिति के अनुरोध पर क़ानूनी विशेषज्ञ एड्स से संबंधित मामलों पर क़ानून बनाने की प्रक्रिया पर काम कर रहे हैं. कुछ ही दिनों पहले एक अदालत ने फ़ैसला दिया था कि केवल एड्सग्रस्त होने के कारण किसी व्यक्ति को नौकरी पर रखने से इनकार नहीं किया जा सकता. अदालत ने यह फ़ैसला एक सरकारी बीमा कंपनी में काम करने वाली महिला की अर्ज़ी पर सुनाया जिन्हें एचआईवी संक्रमण के कारण पक्की नौकरी देने से मना कर दिया गया था. अदालत ने कहा कि महिला को नौकरी देने से मना करने का फ़ैसला तर्क से परे और असंवैधानिक है. अदालत ने 1997 के एक आदेश का हवाला दिया है जिसमें कहा गया है कि किसी व्यक्ति को एड्स के कारण नौकरी से अलग नहीं रखा जा सकता, बशर्ते उसका स्वास्थ्य ठीक हो और वह नौकरी की सारी योग्यताएँ पूरी करता हो. एड्स पीड़ितों के संगठनों ने अदालत के इस फ़ैसले का स्वागत किया है. क़ानून विशेषज्ञों की इस कोशिश को एड्स पीड़ित लोगों के पुनर्वास की दिशा में एक महत्वपूर्ण क़दम माना जा रहा है. प्राइवेट नौकरियाँ भी भारतीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार भारत में लगभग 45 लाख लोग एचआईवी संक्रमण से ग्रस्त हैं. भारत की स्वास्थ्य मंत्री सुषमा स्वराज ने हाल ही में बीबीसी को बताया कि एड्स को रोकने के लिए भारत की नीति लोगों को शिक्षित करने, स्वास्थ्य सेवाएँ मुहैया कराने और लोगों में सेक्स को लेकर संयम बढ़ाने की है. इस प्रस्तावित क़ानून का मसौदा तैयार कर रहे विशेषज्ञों का कहना है कि अभी उनका काम जारी है और एचआईवी से पीड़ित लोगों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए वे कई सुझाव देंगे. इन क़ानून विशेषज्ञों में से एक आनंद ग्रोवर ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि प्राइवेट नौकरियों को भी इस दायरे में लाया जाएगा. उन्होंने कहा कि सरकारी नौकरियों में भी इस बात का पूरा ध्यान रखा जाएगा कि किसी के साथ एचआईवी संक्रमण के कारण अन्याय न हो. एचआईवी से पीड़ित लोगों और उनके हक़ की लड़ाई लड़ रहे संगठनों का कहना है कि ऐसे क़ानून की बहुत ज़रूरत है और इससे लाखों लोगों और उनके परिवारजनों का भला होगा. |
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