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शुक्रवार, 28 नवंबर, 2008 को 04:50 GMT तक के समाचार
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दहशत, दर्द और आक्रोश की अभिव्यक्ति

अख़बार
मुंबई में हुए चरमपंथियों के हमलों में अनेक लोग मारे गए हैं

दिल्ली के अख़बारों ने मुंबई में चरमपंथियों के हमले को लेकर लोगों में व्याप्त तनाव, ग़म और गुस्से को अपने पन्नों पर व्यक्त किया है.

हिंदुस्तान का शीर्षक है- दहशत, दर्द और आक्रोश.

हिंदुस्तान का कहना है कि देश की आर्थिक राजधानी के आलीशान ताज और ट्राइडेंट होटलों के अंदर मोर्चा खोले चरमपंथियों के सफ़ाए के लिए सुरक्षाबलों की दिनभर की कार्रवाई के बावजूद मुंबई देर रात तक बंधक रही.

दैनिक जागरण ने शीर्षक लगाया है- मुंबई में युद्ध जैसे हालात जारी.

अख़बार लिखता है कि चरमपंथियों के निशाने पर आई मुंबई में युद्ध जैसे हालात हैं.

होटल ताज, होटल ट्राइडेंट ओबरॉय और नरीमन हाउस का इलाक़ा खास तौर पर युद्ध का मैदान बना हुआ है.

जागरण लिखता है कि पहली बार एक सात तीनों सैन्य बल उतरे हैं.

भाजपा की कोशिश

भारतीय जनता पार्टी इन हमलों का दिल्ली के विधानसभा चुनावों में लाभ उठाने की कोशिश करती नज़र आ रही है.

दिल्ली के समाचारपत्रों में भाजपा की ओर से जारी विज्ञापन छपा है जिसका शीर्षक है- आतंक की चौतरफा मार लगातार, सरकार कमज़ोर और लाचार.

इधर अमर उजाला ने सुर्खी लगाई है-आतंक से महायुद्ध जारी.

अख़बार लिखता है कि तनावपूर्ण माहौल, गम और गुस्से के बीच गुरुवार को प्रधानमंत्री कार्यालय में कैबिनेट की बैठक जब निर्धारित समय से क़रीब एक घंटे देर से शुरू हुई तो मौजूद सदस्यों को पता था कि गृह मंत्री शिवराज पाटिल क्या कहनेवाले हैं.

पंजाब केसरी लिखता है कि मुंबई आंतकवाद निरोधक दस्ते एटीएस के प्रमुख हेमंत करकरे एक हीरो की तरह शहीद हो गए.

राष्ट्रीय सहारा की सुर्खी है- आतंक से निर्णायक संघर्ष.

समाचारपत्र लिखता है कि मुंबई के ताज और ओबेरॉय होटल में चरमपंथियों के पहुँचने से पहले ही वहाँ भारी मात्रा में विस्फोटक पहुँच गए थे.

नवभारत टाइम्स का कहना है कि मुंबई हमले में पाकिस्तान का लिंक साफ़ नज़र आ रहा है. इसका कारण है एक मोबाइल फ़ोन जो एक चरमपंथी के हैंडग्रेनेड फेंकते हुए गिर गया था.

जनसत्ता लिखता है कि पिछले 24 घंटों में मुंबई का चेहरा इतना लहूलुहान हुआ है कि शायद 1993 के बम धमाकों और सांप्रदायिक दंगों में भी नहीं हुआ था.

मुंबई में खौफ़ का आलम ये है कि सड़कें सुनसान हैं, नरीमन प्वाइंट के बैंक बंद हैं और दलाल स्ट्रीट में मंदी और चढ़ाव का शोर थम गया है.

अंग्रेज़ी दैनिक हिंदुस्तान टाइम्स लिखता है कि इन हमलों के लश्कर का हाथ माना जा रहा है.

इंडियन एक्सप्रेस ने पहले पेज पर संपादकीय छापा है और कहा कि ये एक दुस्वप्न की तरह है और हमारे लिए जाग जाने का वक्त है.

निशाने नक्शे पर देखें
मुंबई हमले के निशानों को नक्शे पर देखने के लिए क्लिक करें.
मुंबई हमलों के बाद का मंज़रविशेषज्ञों की राय
मुंबई हमले चरमपंथियों की रणनीति में बदलाव या इसे विदेशियों ने अंजाम दिए हैं.
मुंबईवासीलोग नाराज़ और हताश
मुंबई में हुए हमलों से वहाँ के लोगों में ग़ुस्सा है, हताशा है और बेबसी भी.
जमाल अलबक्श जमाल कहते हैं...
'...इराक़ में भी इतना डर नहीं लगा जितना मुंबई में लग रहा है.'
एमिलीदहशत में सैलानी
कोलाबा इलाक़े में हुए हमले से विदेशी पर्यटक ख़ासे विचलित हैं.
संदिग्ध चरमपंथी'जीन्स, टी-शर्ट में थे'
ताज से बच निकले एक प्रत्यक्षदर्शी ने चरमपंथियों का हुलिया बयान किया.
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