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गुरुवार, 27 नवंबर, 2008 को 12:26 GMT तक के समाचार
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'दो हमलावरों ने अंधाधुंध गोलियाँ चलाईं'

कैंटीन के मालिक एसएस मिश्र
छत्रपति शिवाजी टर्मिनल पर मौज़ूद लोगों के मुताबिक हमलावर विदेशी लग रहे थे
मुंबई के छत्रपति शिवाजी टर्मिनल पर कैंटीन चलाने वाले एसएस मिश्र का कहना है कि मात्र दो हमलावरों ने मिलकर पूरे स्टेशन को बंधक बना लिया था.

मिश्र की कैंटीन के सामने दो हमलावरों ने अंधाधुंध गोलियाँ चलाईं जिसमें कम से कम 20 से 30 लोग मारे गए और बड़ी संख्या में घायल हुए.

रात के क़रीब 10 बजे जब यह घटना हुई तो कैंटीन के मालिक मिश्र वहीं मौजूद थे.

बैग में बंदूक

उनका कहना था, "दो लोग थे. उनके पास बड़ा सा बैग था. वो आराम से आए और कैंटीन के पास खड़े हुए. बैग में से बड़ी सी बंदूक निकाली. उसमें मैगज़ीन भरा और फिर फायरिंग शुरू कर दी. एक मैगज़ीन ख़त्म हुई तो दूसरी मैगज़ीन और फिर तीसरी मैगज़ीन निकाल कर गोलियाँ बरसाईं और फिर आराम से निकल गए."

इस घटना में कैंटीन के बाहर कई लोगों की जानें गईं. मिश्र कहते हैं, "चारों तरफ़ खून ही खून था और लाशें बिखरी पड़ी थीं. कम से कम 30 लोगों ने तो वहीं दम तोड़ दिया. घायलों की संख्या 70 से कम नहीं होगी. हमारे होटल के भी एक स्टाफ को गोली लगी लेकिन वो अस्पताल में हैं."

 दो लोग थे. उनके पास बड़ा सा बैग था. वो आराम से आए और कैंटीन के पास खड़े हुए. बैग में से बड़ी सी बंदूक निकाली. उसमें मैगज़ीन भरा और फिर फायरिंग शुरू कर दी. एक मैगज़ीन ख़त्म हुई तो दूसरी मैगज़ीन और फिर तीसरी मैगज़ीन निकाल कर गोलियाँ बरसाईं और फिर आराम से निकल गए
एसएस मिश्र, कैंटीन के मालिक

मिश्र और उनके सहयोगी ये घटना बयान करते करते पहले भावुक हो जाते हैं और फिर नाराज़गी उबल पड़ती है उनकी आंखों में पुलिस के प्रति.

वो कहते हैं, "वे पहले एक नंबर प्लेटफॉर्म पर आए. गोलियाँ चलाईं फिर कैंटीन के पास आकर गोलियां चलाते रहे. लेकिन कोई पुलिसवाला नहीं आया. अब यहाँ पुलिसवालों की भीड़ लगी है. अब ये पुलिसवाले किस काम के. ऐसे में तो कोई भी आदमी मुंबई को अपने इशारे पर नचा देगा."

मिश्र अपनी कैंटीन के दूसरी मंज़िल पर थे और उनकी कैंटीन के शीशों पर कई स्थानों पर गोलियों के निशान देखे जा सकते हैं. उन्होंने हमलावरों को देखा और कहते हैं कि वो भारतीय तो नहीं दिखते थे.

एसएस मिश्र के सहयोगी प्रमोद गुप्त कहते हैं, "देखने से तो भारतीय नहीं लगते थे. ज्यादा लंबे नहीं थे. वो बड़े आराम से आए और गोलियाँ ऐसे चला रहे थे मानो खिलौना पिस्तौल से खेल रहे हों, उनके चेहरे पर कोई गुस्सा या पश्चाताप जैसा कुछ नहीं था कि वो इतना ख़तरनाक काम कर रहे हैं."

डरावना सपना

ऐसे ही एक युवक अनिल कुमार गोस्वामी भी रात में स्टेशन पर फंस गए थे. 23 साल के अनिल बताते हैं, "हम आए तो गोलियाँ चल रही थीं. हम तो ज़मीन पर लेट गए. एक था जो तड़ातड़ गोलियाँ चला रहा था लेकिन पता नहीं वो कहाँ भाग गए. उनके हाथ में बड़े हथियार थे. वो सभी लोगों पर गोलियाँ चला रहे थे. वो तो एक डरावना सपना था किसी तरह बचे हम."

अनिल जैसे कई लोगों ने इस मौत के इस भयानक नृत्य को देखा और दृश्य बयान करने के लिए रह गए.

और बाकी रह गई विषद यादें, गोलियों के छर्रे, खून से लथपथ लाशें और बुरी तरह से हिली हुई मुंबई.

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