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'समझौते को नहीं समझ रहे वामपंथी' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन ने कहा है कि वामपंथी दलों में कोई ऐसा नहीं है जो अमरीका के साथ हुए असैनिक परमाणु करार को समझता हो. नारायणन ने एक भारतीय समाचार चैनल 'टाइम्स नाउ' को दिए इंटरव्यू में वामपंथी दलों पर यह आरोप लगाया है जिनकी समर्थन वापसी के कारण 22 जुलाई को लोकसभा में सरकार के विश्वासमत पर मतदान होना है. परमाणु करार के बारे में समाजवादी पार्टी के नेताओं को बताने और समझाने का काम नारायणन को ही सौंपा गया था. वामपंथी दलों का आरोप है कि समझौता भारत की ऊर्जा ज़रूरतों की पूर्ति नहीं करता है. उसने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के साथ सुरक्षा समझौते के मसौदे को आधार बनाते हुए कहा है कि इसमें सरकार के दावे के उलट अबाध ईंधन आपूर्ति और ईंधन के रणनीतिक भंडारण की कोई गारंटी नहीं की गई है. प्रमुख वामपंथी दल मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) का मानना है, इस करार के जरिए "भारत अमरीका के साथ रणनीतिक साझेदारी कायम कर रहा है जो देश की स्वतंत्र विदेश नीति और रणनीतिक स्वायत्तता को नज़रअंदाज़ करता है." विरोधी वैज्ञानिक समाचार चैनल को दिए इंटरव्यू में नारायणन ने स्पष्ट किया है कि जापान में जी-8 सम्मेलन के दौरान अमरीकी राष्ट्रपति जार्ज डब्ल्यू बुश और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मुलाक़ात और आईएईए में पेश किए गए मसौदे में कोई संबंध नहीं है.
उन्होंने कहा कि भारत ने आईएईए को पत्र लिखकर यह कहा था कि वे मसौदे को अपने सदस्यों के बीच बाँट सकते हैं जिसके बाद उन्होंने ऐसा किया. नारायणन ने कहा कि सरकार 10 जुलाई को होने वाली यूपीए-वाम समिति के बैठक के निष्कर्षों को इंतज़ार कर रही थी. उन्होंने कहा, "प्रधानमंत्री के बयान के बहाने वामपंथी दलों ने जब 7 जुलाई को समर्थन वापसी का फ़ैसला कर लिया तो हमें 10 जुलाई की शाम तक इंतज़ार करने का कोई और कारण नहीं नज़र आया."
नारायणन के सामने वामदलों के इस आरोप को रखा गया कि भारत को परमाणु अप्रसार संधि के तहत परमाणु शक्ति संपन्न देशों की तरह आईएईए की निगरानी से अपने रिएक्टर को बाहर निकालने का अधिकार नहीं होगा, जो राष्ट्रहित में नहीं है. तो इसके जवाब में सुरक्षा सलाहकार ने कहा, "वामपंथी दल ख़ुद के दिमाग से सोचने की बजाय उन वैज्ञानिकों से बात कर रहे हैं जिनका अलग ही एजेंडा है." जब उनसे पूछा गया कि क्या इस मसले पर वामपंथी दल वैज्ञानिकों के कहने से चल रहे हैं तो नारायणन ने कहा, "मुझे नहीं लगता कि वामपंथी दलों में कोई भी समझता है कि वो क्या कह रहे हैं. परमाणु वैज्ञानिकों की बिरादरी में उन्होंने कई लोगों से बात की जो इस समझौते के विरोध में हैं." उन्होंने कहा, "मुझे नहीं लगता कि वामपंथी दलों में कोई भी ऐसा है जो इन तकनीकी बातों को समझता हो." नारायणन का ध्यान जब विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी के उस बयान की ओर दिलाया गया कि सरकार बहुमत साबित करने के बाद ही आईएईए जाने का क़दम बढ़ाएगी तो उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने आईएईए को मसौदा देने से पहले विदेश मंत्री से बात की थी. आपत्तियाँ सीपीएम का कहना है कि देश में तेल की ख़पत का 50 फ़ीसदी से ज़्यादा हिस्सा परिवहन में जाता है और बाक़ी का बड़ा हिस्सा पेट्रोकेमिकल और फ़र्टिलाइज़र में चला जाता है. वामपंथी दलों का कहना है कि तेल का बहुत कम हिस्सा बिजली के कारखानों में काम आता है इसलिए परमाणु ऊर्जा का तेल से कोई संबंध नहीं है क्योंकि ऊर्जा का यह रूप तेल के विकल्प के काम में नहीं आ सकता.
सीपीएम ने कहा है कि परमाणु बिजली का एक संयंत्र लगाने में जितना ख़र्च आता है उसमें कोयले वाले तीन प्लांट बन जाएँगे. उसका अनुमान है कि परमाणु बिजली संयंत्र से पैदा होने वाली बिजली की लागत 5 रुपए प्रति यूनिट से ज़्यादा होगी जो कोयला संयंत्र में इतनी ही बिजली पर आने वाली लागत से दोगुनी होगी. सीपीएम का आरोप है कि इस समझौते का भारत की ऊर्जा सुरक्षा से कोई लेना-देना नहीं है क्योंकि यह देश की ऊर्जा ज़रूरतों का मात्र आठ फ़ीसदी ही पूरा कर सकेगा. उसका कहना है कि अमरीका के मृतप्राय परमाणु रिएक्टर उद्योग के जिन संयंत्रों को कोई नहीं ख़रीद रहा है, उसे अरबों डॉलर में ख़रीदकर भारत कोई ऊर्जा सुरक्षा नहीं हासिल करने जा रहा. उसकी माँग है कि सरकार को परमाणु ऊर्जा के बजाय कोयला जैसे घरेलू ऊर्जा संसाधनों का उपयोग करना चाहिए और ईरान जैसे देशों से तेल-गैस की आपूर्ति सुनिश्च्ति करनी चाहिए. |
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