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शुक्रवार, 11 जुलाई, 2008 को 09:32 GMT तक के समाचार
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'क़रार में भारत को काफ़ी रियायतें...'

अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी
भारत अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के साथ सुरक्षा उपाय का समझौता करने की प्रक्रिया में है
भारत-अमरीका परमाणु समझौते के तहत भारत और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के बीच अनिवार्य समझौते के मसौदे को पढ़कर मुझे ऐसा लगता है कि ये 'स्टैंडर्ड सेफ़गार्ड एग्रीमेंट' है यानी सामान्य समझौते का मसौदा है.

जब भी कोई देश अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से परमाणु सुविधा, परमाणु रिएक्टर वग़ैरह शुरू करना चाहते हैं तो उसे इस तरह का समझौता करना पड़ता है.

दूसरी बात ये है कि भारत की स्थिति दूसरों से थोड़ी अलग है क्योंकि भारत परमाणु हथियार का परीक्षण कर चुके हैं लेकिन हम परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) के दायरे में नहीं हैं.

एनपीटी का अनुमोदन 1968 में हुआ था और भारत उससे अलग है. एनपीटी पर हस्ताक्षर करने वाले देशों को जो सुविधाएं मिलती हैं, भारत को नहीं मिलेंगी और ना ही उसे चाहिए.

इस आईएईए एग्रीमेंट में दूसरी बात ये है कि भारत पर अपनी परमाणु सुविधाओं को आईएईए की निगरानी में रखने का कोई दबाव नहीं होगा. ऐसा नहीं होगा कि इसे रखो और उसे भी रखो.

भारत ख़ुद तय करेगा कि किस संयंत्र और सुविधा को एजेंसी की निगरानी में रखना है और किसे नहीं. इसमें भारत के साथ कोई ज़ोर-ज़बर्दस्ती नहीं हो सकती. ये नहीं है कि बाहर से दबाव होगा. भारत को अपने ढंग से काम करने की आज़ादी होगी.

'समझौता भारत के हित में'

मनमोहन सिंह और जार्ज डब्ल्यू बुश
जुलाई 2005 में भारत-अमरीका परमाणु करार पर सैद्धांतिक रूप से सहमति बनी थी

मेरे ख़्याल से ये समझौता भारत के हित में है.

परमाणु रिएक्टर हमें चाहिए क्योंकि बिजली की भारी कमी है. स्थिति गंभीर है. ऐसी स्थिति में परमाणु ऊर्जा की आवश्यकता है.

हज़ार मेगावाट बिजली पैदा करने में सक्षम रिएक्टर अभी हमारे सामर्थ्य में नहीं है. परमाणु ऊर्जा पैदा करने के लिए जिस मात्रा में ईंधन यानी यूरेनियम की ज़रूरत है, उसकी भी हमारे पास कमी है.

आईएईए के समझौते से पहले बुश-मनमोहन की संयुक्त घोषणा को देखें तो उसमें साफ़-साफ़ लिखा है कि हम रणनीतिक रूप से एक, दो या तीन साल के लिए ईंधन भंडार बना कर रखेगें.

ऐसा इसलिए किया गया है ताकि अगर हमें ईंधन की आपूर्ति में भविष्य में कोई भी बाधा पैदा होती है तो भी दो-तीन साल तक परमाणु रिएक्टर काम कर सकें. इस दौरान हम दूसरा वैकल्पिक उपाय कर सकेंगे.

मसौदे में जो 'दोषनिवारक तरीक़ा' लिखा गया है, वो इसके लिए ही है. इसका मतलब यह है कि अगर हम एक देश से ईंधन लेते हैं और वो किसी कारण से आपूर्ति रोक देता है तो हम ईंधन लेने के लिए किसी दूसरे या तीसरे देश के पास जा सकते हैं.

'परमाणु संप्रभुता पर असर नहीं'

प्रकाश करात
वामदलों ने परमाणु करार के मसले पर यूपीए सरकार से अपना समर्थन वापस लिया

इस समझौते पर विपक्षी दलों की आपत्तियों की ख़बरें मैंने देखी है और उनका विश्लेषण भी किया है. मुझे लगता है कि ये तकनीकी रूप से मज़बूत आपत्ति नहीं हैं. तार्किक रूप से देखें तो विरोध थोड़ा ढीला है.

भारत के लेहाज़ से देखें तो उसे और परमाणु रिएक्टर चाहिए. अगर भारत को परमाणु रिएक्टर चाहिए तो इसके लिए इस तरह का समझौता उसके राष्ट्रहित में है.

ये किसी भी तरह से हमारी परमाणु संपन्नता या हमारे परमाणु हथियारों पर असर नहीं डालता है.

आईएईए में मुझे नहीं लगता है कि किसी भी तरह की कोई परेशानी होगी. अगर परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) की बैठक होती है तो उसमें भी कोई तकलीफ़ नहीं होगी.

बस एक बात ये है कि अमरीका में राष्ट्रपति पद के चुनाव होने वाले हैं तो इसकी वजह से इस समझौते पर चर्चा और अनुमोदन की प्रक्रिया कुछ टल सकती है. लेकिन एनएसजी से मंज़ूरी मिल जाने के बाद हमारे लिए रास्ता एकदम खुला हुआ है. अगर हमें रूस या फ़्रांस से रिएक्टर चाहिए तो उसमें भी कोई दिक्कत नहीं होगी.

अगर करना पड़े परीक्षण...?

परमाणु संयंत्र
भारत को ही तय करना है कि वो किस संयंत्र को आईएईए की निगरानी में रखेगा

बुश-मनमोहन वार्ता में लिखा है कि अगर भारत को लगता है कि देश का सुरक्षा वातावरण बदल चुका हो, उसका असर देश की सुरक्षा पर पड़ रहा हो और अगर लगता हो कि परमाणु परीक्षण करना है तो दोनों देश उस पर बात करेंगे. उसके बाद जो भी निर्णय होगा वह अमरीका के लिए कोई चौंकाने वाली बात नहीं होगी.

आईएईए और बुश-मनमोहन समझौते में अंतर है. आईएईए संयुक्त राष्ट्र की इकाई है, वह कोई देश नहीं है.

आईएईए का सेफ़गार्ड समझौता दो तरह का है. एक सेफ़गार्ड एनपीटी पर दस्तख़त कर चुके देशों के लिए है और दूसरा सेफ़गार्ड इससे बाहर के देशों को सुविधा प्रदान करने के लिए है.

इसका अनुभव भारत को है क्योंकि पहला रिएकटर जब तारापुर में बनाया गया था तो वो रिएक्टर आईएईए के सेफ़गार्ड के तहत थे. उसके बाद जो रिएकटर देश में ख़ुद डिज़ाईन करके बने वो सेफ़गार्ड के बाहर हैं.

परमाणु हथियार क्षमता के लिए जितना प्लूटोनियम चाहिए वो भारत को आईएईए की निगरानी से बाहर रखे गए रिएक्टरों से मिलता है और आगे भी ये मिलता रहेगा. उसमें कोई दिक्कत नहीं है.

(बीबीसी संवदादाता रेणू अगाल के साथ बातचीत पर आधारित)

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