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शुक्रवार, 29 फ़रवरी, 2008 को 00:05 GMT तक के समाचार
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'फिर न परमाणु ईंधन मिलेगा न तकनीक'

निकोलस बर्न्स
निकोलस बर्न्स
अमरीका ने कहा है कि अगर किसी कारण से भारत-अमरीका असैनिक परमाणु समझौता नहीं हो पाता है तो भारत के लिए कहीं और से परमाणु ईंधन या तकनीक खरीदना असंभव हो जाएगा.

अमरीकी विदेश विभाग के वरिष्ठ अधिकारी निकोलस बर्न्स का कहना है कि भारत पिछले पैंतीस सालों से परमाणु ईंधन या तकनीक के व्यापार से बाहर रहा है और अमरीका पिछले तीन सालों से इस कोशिश में जुटा है कि भारत को इसमें शामिल होने का मौका मिल सके.

लेकिन अगर भारत अमरीका परमाणु समझौता नहीं हो पाता है तो भारत के लिए कहीं और से परमाणु इंधन खरीदना असंभव हो जाएगा.

बृहस्पतिवार को पत्रकारों से बात करते हुए एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि अमरीका परमाणु आपूर्ति संगठन या न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप के अहम देशों में से है और बिना उसकी सहमति के कोई भी व्यापार नहीं हो सकता.

निकोलस बर्न्स ने ये भी कहा है कि भारत सरकार की ओर से इस तरह की बात नहीं हुई है लेकिन अगर बात यहाँ तक पहुँच भी जाती है , तो ये नामुमकिन होगा क्योंकि न्यूक्लियर सप्लाय़र्स ग्रुप या एनएसजी का कोई भी फ़ैसला सर्वसम्मति से होता है.

समय कम

उनका कहना है कि भारत सरकार इस समझौते के लिए पूरी तरह से उत्साहित है लेकिन उनकी भी अपनी अंदरूनी राजनीतिक समस्याएँ हैं.

लेकिन साथ ही उन्होंने ये भी दोहराया कि समय अब बहुत कम रह गया है.

उनका कहना है कि अमरीकी कांग्रेस में इसे पास करवाने के लिए इस पूरे समझौते को मई या जून तक पेश कर देना होगा, उसके पहले अभी हफ़्ते दो हफ्ते के अंदर अंतरराष्ट्रीय परमाणु उर्जा एजेंसी की मंज़ूरी ले लेनी होगी और मार्च तक एनएसजी की मंज़ूरी भी ले लेनी होगी.

उधर भारत सरकार विएना में अंतरराष्ट्रीय परमाणु उर्जा एजेंसी के साथ बातचीत में लगी हुई है और गुरुवार को बातचीत का पाँचवाँ दौर खत्म हो गया लेकिन फ़िलहाल किसी तरह की घोषणा नहीं हुई है.

बुश प्रशासन पिछले कुछ महीनों में भारत पर लगातार दबाव डाल रहा है कि वो जल्द से जल्द इस समझौते को अपने मुकाम तक पहुंचाने के लिए क़दम उठाए.

अमरीका ने इस समझौते को न केवल भारत और अमरीका के बीच गर्माते रिश्तों की धुरी की तरह पेश किया है बल्कि पर्यावरणीय संकट के हल के तौर पर भी.

भारत सरकार और ज़्यादातर भारतीय वैज्ञानिक इस समझौते के हक में हैं लेकिन सरकार को बाहर से समर्थन दे रहीं वामपंथी पार्टियाँ इस समझौते के सख़्त ख़िलाफ़ हैं.

देखना ये होगा कि निकोलस बर्न्स का ये बयान भारत सरकार की परेशानियों को कम करता है या फिर और बढ़ाता है.

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