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'परमाणु मसले पर जल्दी फ़ैसला ले भारत' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीका के विदेश उपमंत्री निकोलस बर्न्स ने चेतावनी देते हुए कहा है कि परमाणु समझौते पर भारत को जल्दी ही फ़ैसला लेना होगा और अगर भारत परमाणु समझौते के ख़िलाफ़ फ़ैसला लेता है तो इससे दोनों देशों के रिश्तों को क्षति पहुंचेगी. बर्न्स ने काउंसिल ऑन फ़ॉरेन रिलेशन्स में भारत और अमरीका के सामरिक रिश्तों पर होने वाली एक बैठक के दौरान यह चेतावनी दी. उन्होंने कहा कि अमरीका के पास ज़्यादा समय नहीं है और इस समझौते को लागू करने के मामले में भारत सरकार जल्दी फ़ैसला करे. उनका कहना था कि वह भारत के आंतरिक राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप तो नहीं करना चाहते लेकिन वो भारत सरकार को ये याद दिलाना ज़रुर चाहेंगे कि समझौते को लागू करने का समय तेज़ी से निकल रहा है. निकोलस बर्न्स ने कहा, “अमरीका भारत के राजनीतिक मामलों में दखल नहीं देगा. लेकिन हम यह ज़रूर कहना चाहेंगे कि अब समय आ गया है कि इस समझौते के बारे में गंभीरता से सोचें. यही समय है कि समझौते को आगे बढ़ाया जाए. क्योंकि हमारे पास अनिश्चितकाल तक समय नहीं है.” उन्होंने अमरीका में 2008 में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव का भी हवाला दिया और कहा कि बुश प्रशासन चाहता है कि चुनाव की भागमभाग शुरू होने से पहले ही इस समझौते से निपट लिया जाए. उनका कहना था कि अमरीका चाहता है कि इस साल के अंत तक अमरीकी संसद के सामने इस समझौते को मंज़ूरी के लिए पेश कर दिया जाए. अमरीकी विदेश उपमंत्री ने यह भी चेतावनी दी है कि अगर भारत इस समझौते को सिरे से ही खत्म कर देता है, तो इसके गंभीर नतीजे होंगे और अमरीका और भारत के बीच रिश्तों पर भी इसका बुरा असर पड़ेगा. अमरीकी विदेश उपमंत्री का कहना था, "यह समझौता अमरीका, भारत और विश्व समुदाय के लिए महत्व रखता है और अगर इसको लागू किया जाता है तो इससे सामरिक, आर्थिक और पर्यावरण के लिहाज़ से फ़ायदा भी होगा. लेकिन अगर इस समझौते को खत्म कर दिया जाता है तो इसका नुकसान भी होगा." निकोलस बर्न्स का कहना था कि भारत और अमरीका के बढ़ते हुए सामरिक रिशतों पर भी इसका बुरा असर पड़ेगा क्योंकि यह समझौता दोनो देशों के रिश्तों का बेहद अहम पहलू है. हालांकि उन्होंने उम्मीद जताते हुए कहा "हम 26 मील की दौड़ में 24 मील का रास्ता तय कर चुके हैं और अब मंज़िल हमारे सामने ही है." भारत सरकार अमरीका के साथ असैन्य परमाणु समझौते के सिलसिले में वामपंथी पार्टियों का सख्त विरोध झेल रही है औऱ सरकार और वामपंथियों के बीच होने वाली अब तक की बातचीत से कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका है. इस बीच भारत सरकार ने इतना ज़रूर कह दिया है कि जब तक वार्ता से वामपंथी संतुष्ट नहीं हो जाते इस समझौते पर अंतर्राष्ट्रीय परमाणु उर्जा एजेंसी या आईएईए से बातचीत नहीं की जाएगी. इस समझौते के तहत भारत को असैनिक कार्यों के लिए परमाणु तकनीक मिल सकेगी. लेकिन समझौते के तहत भारत के कुछ परमाणु ठिकाने अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों के लिए खुल जाएँगे. इस समझौते को अभी अंतरराष्ट्रीय परमाणु सुरक्षा मापदंड़ों के तहत अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) की मंज़ूरी भी लेनी होगी. इसके अलावा इस समझौते को परमाणु ईंधन सप्लाई करने वाले 45 देशों के ग्रुप का भी समर्थन लेना होगा. फिर उसके बाद अमरीकी संसद इसे दोबारा पास करेगी. अमरीकी विदेश उपमंत्री ने भारत को आने वाले दिनों में विश्व का ताकतवर मुल्क बताते हुए कहा कि अमरीका के लिए यह बेहतरीन मौका है कि वह भारत को अपना साथी बनाए औऱ विश्व के अहम मामलों में भारत को सही स्थान हासिल हो. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थाई सीट के लिए अमरीका द्वारा भारत का समर्थन न करने के सवाल पर बर्न्स का कहना था कि भारत अब जल्द ही विश्व स्तर पर अहम भूमिका निभाने लगेगा. | इससे जुड़ी ख़बरें समझौते को अमरीकी संसद की मंज़ूरी09 दिसंबर, 2006 | पहला पन्ना भारत-परमाणु समझौता अख़बारों में छाया09 दिसंबर, 2006 | पहला पन्ना परमाणु सहमति : अमरीकी सांसद चिंतित03 मई, 2007 | पहला पन्ना 'परमाणु परीक्षण किए तो समझौता रद्द'15 अगस्त, 2007 | पहला पन्ना 'मनमोहन की कमज़ोरी ही उनकी ताकत'18 अक्तूबर, 2007 | पहला पन्ना परमाणु हथियारों में लापरवाही की 'सज़ा'20 अक्तूबर, 2007 | पहला पन्ना | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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