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परमाणु सहमति : अमरीकी सांसद चिंतित | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत और अमरीका के बीच निकट संबंधों के हिमायती कुछ कांग्रेस सांसदों ने प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर आगाह किया है कि ईरान के साथ भारत के अच्छे संबंधों से अमरीका के साथ परमाणु सहयोग सहमति पर असर पड़ सकता है. अमरीका के प्रतिष्ठित वाशिंगटन पोस्ट अख़बार में छपी ख़बरों के अनुसार इन सांसदों ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखे पत्र में कहा है, "ईरान के साथ भारत के संबंध उस परमाणु सहयोग सहमति को नुक़सान पहुँचाने की प्रबल क्षमता रखते हैं जो राष्ट्रपति बुश और उनके बीच जुलाई 2005 में हुई थी." यह पत्र इसलिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इस पर जिन सांसदों ने हस्तक्षर किए हैं उनमें डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन दोनों ही पार्टियों के सदस्य हैं और कई महत्वपूर्ण पैनलों के नेता भी हैं जो परमाणु सहयोग सहमति से संबंधित हैं. यह पत्र भारतीय प्रधानमंत्री को बुधवार को भेजा गया है और उससे एक दिन पहले ही भारतीय विदेश सचिव शिव शंकर मेनन ने सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया था कि ईरान के साथ भारत के कोई सैन्य सहयोग के संबंध नहीं हैं. भारतीय दूतावास में पत्रकारों ने शिवशंकर से पूछा था कि क्या भारत ईरान के साथ सैन्य संबंधों का दायरा बढ़ाने की कोशिश कर रहा है तो उनका कहना था, "मुझे इस बारे में जानकारी नहीं है कि इस तरह की ख़बरें कहाँ से आ रही हैं क्योंकि ईरान के साथ भारत के जो भी संबंध हैं उनसे किसी भी तरह से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों का उल्लंघन नहीं होता है. ईरान के साथ भारत के जो भी संबंध हैं वो वैसे ही हैं जैसे किन्हीं अन्य देशों के बीच सामान्य तौर पर होने चाहिए." भारतीय प्रधानमंत्री को लिखे इस पत्र में हाल के समय में भारतीय और ईरानी अधिकारियों के बीच हुई अनेक बैठकों का हवाला देते हुए कहा गया है कि इनसे दोनों देशों के बीच सैन्य और ऊर्जा क्षेत्रों में बढ़ते सहयोग का संकेत मिलता है. पत्र में कहा गया है, "हमें यह ज़ोर देकर कहना है कि जब इस परमाणु सहयोग सहमति की भाषा को अंतिम रूप देने के लिए कांग्रेस में मतदान होगा तो ईरान के साथ भारत की मज़बूत होती दोस्ती भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा होगा." बुश की कोशिश राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस भारत के साथ परमाणु सहयोग सहमति के समर्थन में काफ़ी प्रयास कर रहे हैं और इसे सफल बनाने के लिए वे कुछ अमरीकी क़ानूनों में फेरबदल की भी कोशिश कर रहे हैं. उनका कहना है कि इस सहमति से भारत के साथ अमरीका के संबंधों में एक नया दौर शुरू होगा.
लेकिन परमाणु अप्रसार के हिमायती विशेषज्ञों ने भारत के साथ परमाणु सहयोग समिति का पुरज़ोर विरोध किया है और आशंका जताई है कि इससे परमाणु अप्रसार सुनिश्चित करने वाले नियम और क़ानून कमज़ोर होंगे. उनका कहना है कि इस समझौते पर अमल से अमरीका एक ऐसे देश यानी भारत को परमाणु तकनीक देगा जिसने परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तख़त करने से इनकार कर दिया है. जब इस सहमति को शुरुआती मंज़ूरी देने के लिए कांग्रेस में विधेयक पर बहस हो रही थी तो कुछ सांसदों ने यह भी पेशकश की थी कि इसकी मंज़ूरी के लिए भारत के ईरान के साथ संबंधों का मुद्दा जोड़ दिया जाए लेकिन बुश प्रशासन के दबाव की वजह से उसे हटा दिया गया था. इस तरह की काफ़ी ख़बरें आ रही हैं कि कांग्रेस के अनेक सदस्यों में इस बात को लेकर ख़ासी नाराज़गी बढ़ रही है कि भारत और ईरान के संबंधों में साल 2007 में काफ़ी तेज़ी आई है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखे पत्र पर दस्तख़त करने वालों के नाम हैं - टॉम लैंटोस, इलीना रॉस लैथीनेन, हॉवर्ड एल बैरमैन, गैरी एल ऐकरमैन, माइक पेंस, ब्रैड शेरमैन और एड रॉयसी. वाशिंगटन में भारतीय दूतावास के अधिकारियों ने कहा है कि उन्होंने इस पत्र को नहीं देखा लेकिन अगर ऐसा कोई मुद्दा है तो विदेश सचिव शिव शंकर मेनन पहले ही इस मुद्दे पर सवालों के जवाब दे चुके हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें 'परमाणु समझौते पर उल्लेखनीय प्रगति'02 मई, 2007 | भारत और पड़ोस परमाणु सौदे पर भारत के तेवर कड़े18 मार्च, 2007 | भारत और पड़ोस 'परमाणु परीक्षणों पर रोक मंज़ूर नहीं'10 जनवरी, 2007 | भारत और पड़ोस परमाणु करार पर बुश-मनमोहन की चर्चा21 दिसंबर, 2006 | भारत और पड़ोस परमाणु सहमति भारत के हित में?22 अगस्त, 2006 | भारत और पड़ोस 'नई शर्तें स्वीकार नहीं करेगा भारत'26 जुलाई, 2006 | भारत और पड़ोस 'सामरिक कार्यक्रम पर कोई अंकुश नहीं'07 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस भारत-अमरीका सहमति ऐतिहासिक क्यों?02 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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