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परमाणु सहमति भारत के हित में? | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पिछले हफ़्ते राज्यसभा में स्पष्ट तौर पर कहा है कि भारत अमरीका के दबाव में आकर अपने परमाणु हथियारों के कार्यक्रम में कोई बदलाव नहीं करेगा. इससे ठीक पहले भारत के वरिष्ठ वैज्ञानिकों ने प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखकर इस विषय पर चिंता जताई थी. तो क्या ये समझौता वाकई भारत के हित में है? प्रधानमंत्री को पत्र लिखने वाले वैज्ञानिकों में से एक थे भारत के आवणिक ऊर्जा नियामक बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष ए गोपालकृष्णन. वे कहते हैं, “समस्या ये है कि भारत एक बात कह रहा है और अमरीकी संसद इस समझौते को उससे कहीं अलग दिशा देने की कोशिश कर रही है. इससे हम चिंतित हैं. हमें अपने प्रधानमंत्री पर पूरा विश्वास है पर अमरीकी सीनेट पर नहीं है क्योंकि वो अमरीकी हितों को साध रही है जो भारत के हितों से अलग हो सकते हैं.” जानकार कहते हैं कि 18 जुलाई को हुए बुश-मनमोहन समझौते में कई बातें थीं जिसे अमरीकी सीनेट बदलने की कोशिश करती लग रही है. वैज्ञानिकों की चिंताएँ भारतीय वैज्ञानिकों से लगातार संपर्क रख रहे वरिष्ठ पत्रकार पल्लव बागला का इस बारे में कहना है, “ भारत चाहता है कि परमाणु परीक्षण की उसे आगे ज़रूरत महसूस हो तो वो आगे भी कर सके और अंतरराष्ट्रीय मानकों पर आईएईए जैसे संगठन उन्हीं चीज़ों का निरीक्षण करें जो वो पाँच परमाणु संपन्न शक्तियों में देख पाते हैं.” जानकारों का कहना हैं कि ये आख़िरी मुद्दा एक ऐसी बात है जिसे साफ़ साफ़ कहने से लोग कतराते हैं. वो ये कि अमरीका ये नहीं चाहता कि भारत आने वाले समय में थोरियम से ऊर्जा बनाकर – ऊर्जा के मामले में पूरी तरह सक्षम हो जाए. पत्रकार पल्लव बागला के मुताबिक, "भारत थोरियम से बिजली बनाने के ब्लूप्रिंट बना चुका है. अगर भारत इस तरह बिजली बना पाता है तो बहुत बड़ी बात होगी. लगभग आधे दशक पहले ये सपना भारत के लिए होमी जहाँगीर भाभा ने देखा था - ये सोचकर कि भारत में यूरेनियम नहीं है और थोरियम बड़ी मात्रा में उपलब्ध है. और थोरियम तकनीक के पितामह माने जाते हैं डॉक्टर अनिल काकोडकर - जिन्होंने पहले प्रधानमंत्री के सामने समझौते को लेकर सवाल उठाए थे. ” थोरियम से ऊर्जा
थोरियम के शोधकार्य में भारत दुनिया में सबसे आगे है. भारत अभी थोरियम से बिजली नहीं बना पाया है लेकिन भारतीय वैज्ञानिकों को विश्वास है कि वो आने वाले 15 से 20 साल में ऐसा कर पाएगा. और वाकई अगर भारत थोरियम से बिजली बनाता है तो वो बहुत बड़ी बात होगी क्योंकि दुनिया में थोरियम का दूसरा सबसे बड़े रिज़र्व भारत में हैं. वर्ल्ड न्यूक्लियर एसोसिएशन का कहना है कि भारत में दो लाख 90 हज़ार टन थोरियम हो सकता है. इससे ज़्यादा तीन लाख हज़ार टन थोरियम सिर्फ़ ऑस्ट्रेलिया के पास है. अंतरराष्ट्रीय संगठन वर्ल्ड न्यूक्लियर एसोसिएशन के अनुसार पृथ्वी में जितना यूरेनियम है उससे तीन गुना ज़्यादा थोरियम है. दूसरे देशों में या तो यूरेनियम मिलता है या फिर उन्हें किसी देश से यूरेनियम मिल जाता है. तो वैज्ञानिकों की एक बड़ी चिंता इस बात पर है कि अमरीका किसी न किसी तरह परमाणु समझौते में कोई ऐसी बात न डाल दे जोकि भारत में थोरियम पर होने वाली रिसर्च पर नकेल कस दे. 'अलग-अलग सोच' पत्रकार पल्लव बागला कहते हैं कि ऊर्जा को लेकर भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की सोच अलग अलग है. उनके मुताबिक मनमोहन सिंह चाहते हैं 'एनर्जी सिक्युरिटी' यानी कि भारत अमरीका से तकनीक लेकर, यूरेनियम लेकर ऊर्जा बनाता रहे, लेकिन भारत के राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम बात करते हैं भारत को ऊर्जा के मामले में भी आज़ादी दिलाने की यानि "एनर्जी इंडिपेंडेंस" की. पल्लव बागला कहते हैं, “ राष्ट्रपति कलाम का सपना ये है कि भारत का अपना परमाणु ईंधन हो, भारत की अपनी तकनीक हो, और ये सपना साकार हो सकता है जब थोरियम से बिजली बनने लगे.” क्या भारत में थोरियम से बिजली बनने को लेकर अमरीका चिंतित है? इस तरह की चिंताओं को बारे में वरिष्ठ वैज्ञानिक ए गोपालकृष्णन का कहना है, “ भारत के वैज्ञानिक ये बात जानते हैं, समझते हैं. 1974 में हमने पोखरण में परमाणु धमाका किया – अमरीका और दूसरे देशों ने कोशिश की कि हम पर हर प्रकार के प्रतिबंध लगाकर वो हमें परमाणु तकनीक में आगे बढ़ने से रोक दें – लेकिन हम उठे, उठकर दौड़े, फिर गिरे और फिर उठे – आज हम परमाणु तकनीक से जुड़े कई मामलों में बड़े देशों के साथ खड़े हैं.” यूरेनियम के स्रोत भारत की बाक़ी चिंताएँ यूरेनियम से बिजली बनाने को लेकर हैं. यूरेनियम भारत में नहीं मिलता इसीलिए वो भारत को अमरीका से लेना होगा. आवणिक ऊर्जा नियामक बोर्ड के पूर्व प्रमुख ए गोपालकृष्णन सवाल उठाते हैं कि मान लीजिए अमरीका कल को भारत को यूरेनियम न दे तो क्या होगा? वे कहते हैं कि अगर भारत सिर्फ़ उन्हीं से यूरेनियम लेता रहा तो तब तक तो हम करोड़ों डॉलर ख़र्च करके रिएक्टर बना चुके होंगे – ये सोचते हुए कि अगर हमें अमरीका से यूरेनियम न मिला तो हम कहीं और से उसे ख़रीद लेंगे – और इसीलिए ये बात बुश-मनमोहन समझौते में भी है लेकिन लगता है कि सेनेट इसे बदलने की कोशिश कर रहा है.” भारत इस समय शांतिपूर्ण इस्तेमाल के लिए दस परमाणु संयंत्र बना रहा है जो दुनिया में सबसे ज़्यादा हैं. प्रधानमंत्री को लिखे पत्र पर दस्तखत करने वाले आठ सेवानिवृत्त वैज्ञानिकों में से एक और थे आणविक ऊर्जा आयोग के पूर्व अध्यक्ष एम आर श्रीनिवासन. वे कहते हैं कि बुश मनमोहन समझौते में कुछ और बदलाव किए जाने के संकेत मिल रहे हैं. उनका कहना है, “ हमें लगा था कि शांतिपूर्ण इस्तेमाल के लिए हमें रिएक्टरों और हेवी वॉटर तकनीक की और जानकारी दी जाएगी पर सीनेट से मंज़ूर प्रस्ताव में ये भी नहीं है.” वैज्ञानिक ये भी पूछ रहे हैं कि परमाणु मामले से जुड़े इस समझौते में ईरान के ख़िलाफ़ अमरीका का सहयोग करने जैसी शर्तें क्यों लगाने की कोशिश की जा रही है. वैज्ञानिक ए गोपालकृष्णन के मुताबिक, “ भारत का वैज्ञानिक समुदाय, भारत के लोग और कूटनीतिक समुदाय इस बात से बेहद नाराज़ है कि अमरीकी काँग्रेस ने इतनी जुर्रत की है कि वो भारत को बताएँ कि भारत ईरान के साथ कैसे रिश्ते रखे. ये मामले भारत में तय होंगे. काँग्रेस अगर ये सोच रही है कि भारत कोई पिद्दी सा देश है तो हमें भी उनकी कोई चिंता नहीं. भारत अपनी संप्रभुता यूरेनियम के चंद ग्राम के लिए खोने वाला नहीं है.” इस तरह ये वैज्ञानिक भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सचेत कर रहे हैं कि बुश मनमोहन समझौते से अलग कोई भी ऐसी बात न मानी जाए जिसके लिए भारत को सदियों के लिए पछताना पड़े. |
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