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भारत-अमरीका में परमाणु सहमति | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत और अमरीका के बीच असैनिक परमाणु सहयोग को लेकर ऐतिहासिक सहमति हो गई है. दिल्ली में अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और भारत के प्रधानममंत्री मनमोहन सिंह के बीच हैदराबाद में हुई चर्चा के बाद संयुक्त पत्रकारवार्ता में इसकी घोषणा की गई. इससे पहले दोनों देशों के बीच असैनिक परमाणु कार्यक्रम को लेकर कुछ असहमतियाँ थीं लेकिन दोनों देशों के अधिकारियों के बीच कई दौरों की बातचीत के बाद ये सहमति बनी है. परमाणु कार्यक्रम पर सहमति के बाद इसे अमरीकी संसद की मंज़ूरी के लिए रखा जाएगा इसके बाद दोनों देशों के बीच औपचारिक समझौता होगा. उल्लेखनीय है कि जॉर्ज बुश तीन दिन के भारत दौरे पर हैं और परमाणु कार्यक्रम पर सहमति को इस दौरे का मुख्य एजेंडा माना जा रहा था. राष्ट्रपति बुश के साथ उनका बड़ा प्रतिनिधि मंडल आया है जिसमें विदेश मंत्री कोंडालिसा राइस, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और व्यापार प्रतिनिधि शामिल हैं. समझौता साझा संवाददाता सम्मेलन में परमाणु सहयोग पर सहमति की घोषणा करते हुए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा, "भारत और अमरीका असैनिक परमाणु सहयोग पर अमल करने को सहमत हो गए हैं."
उन्होंने कहा कि इसके बाद राष्ट्रपति बुश इसे अमरीकी संसद के सामने रखेंगे ताकि अमरीकी क़ानूनों में बदलाव किया जा सके और इसे न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (परमाणु आपूर्तिकर्ता 45 देशों का समूह) के सामने भी रखा जाएगा ताकि दिशा निर्देशों में परिवर्तन किया जा सके. पिछले साल जुलाई में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अमरीका दौरे के समय इस पर आरंभिक सहमति बनी थी लेकिन इसे लेकर कुछ असहमतियाँ थीं. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यह भी स्पष्ट किया कि अमरीका की माँग के अनुरुप भारत ने अपने असैनिक परमाणु संयंत्रों की पहचान कर ली है. उन्होंने कहा है कि दोनों देशों के बीच इस बात पर भी सहमति हो गई है कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) भारत के लिए अलग दिशा निर्देश तैयार करे. इसकी ज़रुरत इसलिए भी होगा क्योंकि भारत ने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं. प्रधानमंत्री ने कहा कि वे इस सहमति को लेकर और अधिक विवरण इसलिए नहीं दे रहे हैं क्योंकि संसद का सत्र चल रहा है. 'आसान नहीं था' अमरीकी राष्ट्रपति बुश ने परमाणु सहमति को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा, "मैं समझता हूँ कि यह सहमति भारत के प्रधानमंत्री के लिए आसान नहीं था और यह अमरीकी राष्ट्रपति के लिए भी आसान नहीं था लेकिन ये समझौता ज़रूरी था." उन्होंने कहा कि यदि एक बार ये हो गया तो इसका लाभ दोनों देशों की जनता को होगा. राष्ट्रपति बुश ने विश्वास जताया कि वे इस समझौते पर अमरीकी संसद को राज़ी कर पाएँगे जिससे दशकों पुराने क़ानून को बदला जा सके.
अमरीकी राष्ट्रपति ने स्पष्ट कर दिया कि वे परमाणु तकनीक पर नए कार्यक्रम पर अपने देश में भी काम करना चाहते हैं ताकि आने वाले दिनों में तेल पर निर्भरता कम की जा सके और इसके लिए भारत और अमरीका दोनों मिलकर काम कर सकते हैं. अमरीकी संसद में इस समझौते को मंज़ूर करवाने के सवाल पर उन्होंने कहा, "अमरीकी संसद को समझना होगा कि ये समझौता अमरीका के हित में भी है क्योंकि भारत के पास असैनिक परमाणु ऊर्जा संयंत्र हैं जो ऊर्जा की बढ़ती माँग का पूरा कर सकते हैं." उन्होंने कहा कि अमरीका, भारत और चीन में जिस तरह से ऊर्जा की माँग बढ़ रही है उसके चलते ज़रुरी है कि ऊर्जा के नए स्रोत विकसित किए जाएँ और ये अमरीकी उपभोक्ता के हित में भी होगा. इस सवाल पर कि 1998 में परमाणु परीक्षण करने के बाद भी परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर न करने वाले भारत के साथ समझौता करने से क्या ग़लत संकेत नहीं जाएँगे, राष्ट्रपति बुश ने कहा कि समय और नेतृत्व बदल गया है और परिस्थितियाँ बदल गई हैं. उन्होंने दोहराया कि इस समझौते को संसद को समझाना न भारतीय प्रधानमंत्री के लिए आसान होगा और न अमरीकी राष्ट्रपति के लिए लेकिन ये जनता के हित में है. व्यस्त कार्यक्रम इससे पहले राष्ट्रपति जॉर्ज बुश का राष्ट्रपति भवन में औपचारिक रूप से स्वागत हुआ और इसके बाद उन्होंने राजघाट जाकर महात्मा गाँधी की समाधि पर श्रद्धांजलि अर्पित की. इसके बाद उन्होंने यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गाँधी और नेता प्रतिपक्ष लालकृष्ण आडवाणी से औपचारिक मुलाक़ात हुआ. दोपहर का भोजन जॉर्ज बुश प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ कर रहे हैं. शाम को राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के साथ मुलाक़ात के बाद रात्रिभोज राष्ट्रपति भवन में ही करेंगे. तीन मार्च को राष्ट्रपति बुश हैदराबाद के लिए रवाना होंगे और वे वहाँ दो कार्यक्रमों में हिस्सा लेंगे. शाम को वे दिल्ली लौटेंगे और शाम को दिल्ली के पुराना किला में भाषण देंगे. चार मार्च की सुबह राष्ट्रपति बुश पाकिस्तान के लिए रवाना हो जाएँगे. |
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