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मंगलवार, 18 जुलाई, 2006 को 08:11 GMT तक के समाचार
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परमाणु समझौते का एक साल पूरा
बुश-मनमोहन
परमाणु समझौते का विरोध अमरीका और भारत दोनों जगहों पर हो रहा है
भारत और अमरीका के बीच परमाणु समझौते पर सहमति का एक वर्ष पूरा हो चुका है. दोनों देशों को उम्मीद है कि इसे अमरीकी कांग्रेस की मंजूरी मिल जाएगी.

ग़ौरतलब है कि एक वर्ष पूर्व 18 जुलाई को अमरीका यात्रा के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने संयुक्त घोषणा पत्र जारी कर इस समझौते को सैद्धांतिक सहमति दी थी.

इसी वर्ष मार्च में बुश की भारत यात्रा के दौरान समझौते को अंतिम स्वरूप दिया गया.

इस समझौते के अमल में आने पर असैनिक इस्तेमाल के लिए बने भारतीय परमाणु रिएक्टरों को अमीरका से ईँधन की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित हो सकेगी.

भारत ने वर्ष 1974 में पहला परमाणु परीक्षण किया था जिसके बाद अमरीका ने परमाणु तकनीक की आपूर्ति पर रोक लगा दी थी. यह अभी भी कायम है.

राह नहीं आसान

परमाणु समझौते की घोषणा के बाद से ही इसे अमली जामा पहनाए जाने पर विवाद खड़े हो गए.

परमाणु अप्रसार संधि यानी एनपीटी से नहीं जुड़े होने के बावजूद भारत को विशेष दर्जा दे कर परमाणु तकनीक देने के मसले पर बुश को घरेलू स्तर पर विरोध का सामना करना पड़ रहा है.

आलोचकों के मुताबिक इस समझौते से ईरान जैसे देशों को गलत संदेश जाएगा जिनके परमाणु कार्यक्रमों पर अमरीका गंभीर चिंता जताता रहा है.

मनमोहन सिंह
प्रधानमंत्री ने पिछले वर्ष अमरीकी संसद को संबोधित किया था

हालाँकि बुश प्रशासन ने साफ कहा है कि भारत एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति है और इसकी तुलना उत्तर कोरिया या ईरान से नहीं की जा सकती.

समझौते के तहत भारत को अपने 14 असैनिक रिएक्टरों को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी यानी आईएईए की निगरानी में रखना होगा.

सफलता

विरोध के बावजूद बुश प्रशासन की कोशिशों से पिछले महीने अमरीकी प्रतिनिधि सभा और सीनेट की विदेश मामलों की समिति ने इस समझौते को हरी झंडी दिखा दी है.

हालाँकि मूल समझौते में कुछ बदलाव किए जाने के प्रस्ताव का भारत में विरोध हो रहा है.

रूस में धनी देशों के समूह जी-8 के सम्मेलन में बतौर पर्यवेक्षक हिस्सा लेने गए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इन चिंताओं से अमरीकी राष्ट्रपति को अवगत कराया है.

अमरीकी कांग्रेस में इसी माह के अंत तक समझौते पर विचार किए जाने की संभावना है.

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