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परमाणु सहयोग की मंज़ूरी का स्वागत | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत सरकार ने असैनिक परमाणु सहयोग सहमति को अमरीकी संसद के निचले सदन से मंज़ूरी मिलने का स्वागत किया है. हालाँकि भाजपा और वामपंथी दलों ने इसे ख़तरनाक बताते हुए आशंका जताई है कि 'समझौते से भारतीय विदेश नीति विदेशी हाथों में गिरवी हो जाएगी.' असैनिक क्षेत्र में परमाणु सहयोग होने से भारत में ऊर्जा ज़रुरतों को पूरा करने में मदद मिलेगी. केंद्र सरकार की योजना के मुताबिक 2050 में कुल बिजली उत्पादन में परमाणु ऊर्जा की हिस्सेदारी एक चौथाई होगी. लेकिन इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए परमाणु तकनीक और सामग्रियों की आवश्यकता है. ये समझौता हो जाने से परमाणु आपूर्तिकर्ता देश भारत को असैनिक क्षेत्र के लिए ज़रुरी परमाणु ईंधन और अन्य तकनीक देना शुरु कर देंगे. आलोचना जिस तरह अमरीकी संसद में परमाणु अप्रसार के कुछ समर्थक सांसदों ने समझौते का विरोध किया है, उसी तरह भारत में भी विपक्षी पार्टियों के अलावा गठबंधन सरकार के कुछ घटल दल अलग अलग पहलुओं पर इसका विरोध कर रहे हैं. ये विरोध गुरुवार को संसद के ऊपरी सदन राज्यसभा में दिखा और कुछ सांसदों ने प्रस्तावित समझौते का विरोध किया. विरोध के पीछे तर्क है कि अमरीकी संसद में मूल सहमति के बिंदुओं में संशोधन किया जा रहा है जिससे भारत का परमाणु हथियार कार्यक्रम प्रभावित होगा. दूसरी ओर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का कहना है कि उन्होंने अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश से इस बात का आश्वासन माँगा है कि सीनेट की मंज़ूरी मिलने से पहले मूल सहमति के मसौदे में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया जाएगा. | इससे जुड़ी ख़बरें परमाणु सहमति प्रतिनिधि सभा में मंज़ूर27 जुलाई, 2006 | पहला पन्ना अमरीकी उपराष्ट्रपति को मंज़ूरी की उम्मीद23 जून, 2006 | पहला पन्ना परमाणु सहमति के पक्ष में मुहिम तेज़14 जून, 2006 | पहला पन्ना 'परमाणु सहमति में फेरबदल से मुश्किलें'25 मई, 2006 | पहला पन्ना भारत-अमरीका के बीच अहम समझौता03 अक्तूबर, 2005 | पहला पन्ना | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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