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परमाणु सहमति के पक्ष में मुहिम तेज़ | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत और अमरीका के बीच हुई परमाणु सहमति को अमरीकी कांग्रेस में मंज़ूरी दिलाने के लिए बुश प्रशासन के साथ-साथ वहाँ रह रहे भारतीय मूल के लोग भी एड़ी चोटी का ज़ोर लगा रहे हैं. भारतीय मूल के ज़्यादातर लोग इस परमाणु सहमति के पक्ष में हैं और उनका मानना है कि इससे अमरीका और भारत दोनों को ही फ़ायदा होगा. दोनों देशों के बीच हुई इस परमाणु सहमति को लागू कराने में सबसे बड़ी बाधा अब अमरीकी संसद की मंज़ूरी ही है. तीन महीने की चर्चा और बहस के बाद भी अमरीकी सांसदों में इस सहमति को लेकर एक राय नहीं बन पाई है. अमरीकी विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राइस सीनेट और प्रतिनिधि सभा की विदेश मामलों की समितियों के सामने इस समझौते की अहमियत जता चुकी हैं लेकिन कई सांसद अब भी इस समझौते का विरोध कर रहे हैं. दबाव इस सबके बीच अमरीका में रहने वाले भारतीय मूल के लोग अपने-अपने इलाक़े के सांसदों पर इस सहमति के समर्थन में वोट डालने का दबाव बना रहे हैं. इस सहमति के पक्ष में जारी मुहिम में ‘इंडियन अमेरिकन फोरम फॉर पोलिटिकल एजुकेशन’ काफ़ी सक्रिय है. इस संस्था के अध्यक्ष नीलेश मेहता कहते हैं, “सारा भारतीय समुदाय भारत की ख़ुशहाली चाहता है. अगर दोनों देशों में यह समझौता हो जाता है तो भारत की प्रगति में बहुत मदद मिलेगी.” अमरीकी चुनावों में भारतीय मूल के धनी लोग रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक दोनो पार्टियों के बहुत से सांसदों को भारी चुनावी चंदा देते हैं और अन्य लोगों से भी लाखों डालर का चंदा जमा करने में मदद करते हैं. नीलेश मेहता कहते हैं कि अब इन सांसदों से हिसाब लेने का समय आ गया है, “हमने पिछले 40 सालों से इन सांसदों की मदद की है. खुद चंदा दिया है और करोड़ों डॉलर उनके चुनाव के लिए इकठ्ठा करने में मदद की है. अब समय आ गया है कि हम उनसे कुछ वापस मांगें. हम चाहते हैं कि वे इस सहमति का समर्थन करें.”
टैक्सास, न्यूयॉर्क, कैलिफोर्निया, जॉर्जिया, मिशिगन, मिन्नेसोटा हर जगह भारतीय मूल के लोग हरकत में आ गए हैं और अपने अपने सांसदों पर दबाव बढ़ाने लगे हैं. बँटे सांसद प्रतिनिधि सभा में क़रीब 18 सांसद ऐसे हैं जिन्होंने इस परमाणु सहमति के ख़िलाफ़ सदन में एक विधेयक भी पेश किया है. उनका विरोध इस बात पर है कि भारत के साथ इस परमाणु सहमति से परमाणु अप्रसार की मुहिम को नुक़सान होगा. रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों पार्टियों के कई सांसदों ने, जिनमें जो बाईडन और जॉन कैरी जैसे प्रमुख सांसद शामिल हैं, इस सहमति को समर्थन देने के संकेत दिए हैं. कुछ सांसद समर्थन में आगे तो आए हैं लेकिन वे सहमति के मसौदे में फेरबदल कराना चाहते हैं. इनमें सबसे अहम हैं प्रतिनिधि सभा की विदेश मामलों की समिति के अध्यक्ष रिपब्लिकन पार्टी के हैनरी हाईड जिन्होंने ज़ोर देकर कहा है कि इस समझौते में कुछ फेरबदल करनी होगी. दूसरी ओर बुश प्रशासन और भारत सरकार दोनों स्पष्ट कर चुके हैं कि अगर अमरीकी संसद इस सहमति में कोई फेरबदल करने की कोशिश करती है तो यह सहमति ख़त्म ही मानी जाएगी. ज़्यादा से ज़्यादा सांसदों को समझौते के समर्थन में लाने के लिए भारतीय मूल के डॉक्टर, इंजीनियर, व्यापारी, व्यावसायी, होटल मालिक, बैंकर सभी तरह के लोग मिलजुल कर काम कर रहे हैं. अमरीका भारत बिज़नेस काउंसिल भी ज़ोर-शोर से इस मुहिम में भारतीय मूल के लोगों के साथ शामिल है. पक्ष में तर्क पिछले दिनों सांसदों और भारतीय मूल के लोगों को संबोधित करते हुए अमरीकी उप विदेश मंत्री निकोलस बर्न्स ने कहा, “मुझे इतने सारे भारतीय मूल के लोगों के इस सहमति के लिए समर्थन जुटाने के प्रयास को देखकर बहुत ख़ुशी हो रही है. हमें उम्मीद है कि हम अपने मक़सद में कामयाब हो जाएंगे.”
भारतीय मूल की संस्थाएं अमरीकी सांसदों को यह बात समझाने में लगी हैं कि भारत के परमाणु अप्रसार संबंधी अच्छे रिकॉर्ड और अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के साथ भारत के सहयोग को देखते हुए परमाणु अप्रसार पर भारत की प्रतिबद्धता जगज़ाहिर हो चुकी है. इंडियन अमेरिकन फोरम फॉर पोलिटिकल एजुकेशन के उपाध्यक्ष राम सिंह कहते हैं, “हम लोग अपने अपने सीनेटरों और कांग्रेस के सदस्यों पर हर तरह से दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि वो इस समझौते का संसद में समर्थन करें.” हाल ही में कुछ अमरीकी सांसदों के गुटों ने, जैसे अश्वेत सांसदों के ब्लैक कॉकस के सदस्यों ने, समर्थन दिखाने के लिए अमरीका में स्थित भारतीय दूतावास में भारतीय राजदूत रोनेन सेन से भी मुलाक़ात की है. भारतीय मूल के समर्थकों ने समझौते के प्रचार प्रसार के लिए अमरीका की लॉबिंग कंपनियों को लाखों डॉलर के ठेके दिए हैं और अख़बारों में इश्तेहार भी छपवाए जा रहे हैं. आशंका अगर जुलाई तक संसद से इस परमाणु सहमति को मंज़ूरी नहीं मिली तो जुलाई में सासंद गर्मी की छुट्टियां मनाने चले जाएंगे और फिर जब वापस आएंगे तो उनके दिमाग़ पर 7 नवंबर को होने वाले संसदीय चुनावों की तैयारी ही हावी रहेगी और यह समझौता अगली संसद तक के लिए टल जाएगा. मौजूदा प्रतिनिधि सभा में 31 सांसदों ने इसके समर्थन में अपना नाम दिया है जिनमें 21 सांसद रिपब्लिकन पार्टी के हैं जबकि सीनेट में 100 में से अब तक कुल 10 सीनेटरों ने समर्थन किया है और सभी रिपब्लिकन हैं. कुछ भारतीय इस बात से नाराज़ हैं कि राष्ट्रपति बुश ख़ुद इस समझौते को पारित कराने में ज़्यादा जोश नहीं दिखा रहे हैं. नीलेश मेहता कहते हैं कि सांसदों से मिलकर राष्ट्रपति बुश को इस समझौते के लिए ख़ुद भी समर्थन मांगना चाहिए. उनका कहना हैं, “बुश प्रशासन को भी यह दिखाना चाहिए कि वह इस समझौते के लिए जी जान लगाए हुए है. हेनरी हाईड जैसे बहुत से अहम सांसद अब भी खिलाफ़ हैं. इसलिए राष्ट्रपति बुश को चाहिए कि वो ख़ुद ऐसे सांसदों से मिलकर उनपर समर्थन के लिए ज़ोर डालें. हम लोग तो बस एक हद तक ही समर्थन जुटा सकते हैं.” यूएस इंडिया फ़्रेंडशिप काउंसिल के संस्थापक स्वदेश चौधरी का कहना है कि मेहनत करनी पड़ेगी लेकिन अंत में अमरीकी संसद में इस बिल को मंज़ूरी मिल जाएगी. चौधरी कहते हैं, “यह कोई आसान काम तो नहीं है, लेकिन हमने काफ़ी हद तक सफलता पाई है. अब हम यह चाहते हैं कि किसी तरह संसदीय समितियों से निकलकर यह बिल सदन में बहस के लिए पहुँच जाए.” कुछ भारतीय समर्थकों का कहना है कि अगर यह समझौता संसद में पारित न हुआ तो दोनों देशों के बीच रिश्तों में दरार पड़ सकती है. | इससे जुड़ी ख़बरें भारत-अमरीका में परमाणु सहमति02 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस आईएईए ने समझौते का स्वागत किया02 मार्च, 2006 | पहला पन्ना श्याम सरन ने रुख़ कड़ा किया01 अप्रैल, 2006 | भारत और पड़ोस 'भारत को परमाणु तकनीक देना उचित'22 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस परमाणु चिंताओं को खारिज किया22 फ़रवरी, 2006 | भारत और पड़ोस इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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