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शनिवार, 01 अप्रैल, 2006 को 03:25 GMT तक के समाचार
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श्याम सरन ने रुख़ कड़ा किया

श्याम सरन
सरन ने कहा कि समझौते पर बहस हो लेकिन अगर नामंज़ूर हुआ तो प्रतिकूल असर पड़ेगा
अमरीका में कुछ सांसदों के भारत – अमरीका परमाणु समझौते के विरोध के बीच भारतीय विदेश सचिव श्याम सरन ने इस मुददे पर कड़ा रुख़ अपनाते हुए कहा है कि अगर यह समझौता अमरीकी संसद में मंज़ूर नहीं हुआ तो दोंनो देशों के रिश्तों पर इसका प्रतिकूल असर पड़ सकता है.

तीन दिन के अमरीका दौरे के आख़िरी दिन शुक्रवार को एक संवाददाता सम्मेलन में श्याम सरन ने यह बात दोहराई कि इस परमाणु समझौते को अमरीका और भारत के बीच बेहतर होते सामरिक रिश्तों से जोड़कर ही देखा जाना चाहिए.

श्याम सरन ने कहा, “अगर यह समझौता मंज़ूर नहीं होता है तो यह तो नहीं होगा कि बाकी सारे मामले ख़त्म हो जाएंगे लेकिन यह याद रखने की बात है कि इस समझौते पर अब यह बात भी निर्भर करती है कि भारत-अमरीका के बीच नए स्वरूप के सामरिक रिश्तों का क्या किया जाएगा."

"इसलिए अगर यह समझौता मंज़ूर नहीं होता है तो मायूसी के तौर पर रिश्तों को झटका लगेगा.”

अमरीका में कई सांसद इस समझौते के सख़्त खिलाफ़ हैं जिनमें कुछ तो संसद में इंडियन कॉकस या भारत के हिमायती गुट के सांसद भी हैं.

इनमें से ही कुछ उन अठारह सासंदों में भी शामिल हैं जिन्होंने प्रतिनिधि सभा में इस परमाणु समझौता के विरोध में एक प्रस्ताव भी पेश किया है.

लेकिन भारतीय विदेश सचिव ने कई सांसदों जैसे जो बाईडन, टॉम लेंटोस, बराक ओबामा, हेनरी हाईड से अपनी मुलाक़ातों का ज़िक्र करते हुए कहा कि रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों पार्टियों के सांसदों ने भारत और अमरीका के बीच नए सामरिक रिश्तों के प्रति समर्थन दिखाया है.

हिमायत चाहिए

श्याम सरन का कहना था, “गुरूवार को मैंने पूरा दिन कैपिटल हिल पर ही गुज़ारा और कई सांसदों से मुलाक़ात की. मुझे लगा कि दोनों ही पार्टियों के सांसदों में भारत-अमरीका सामरिक रिश्तों के लिए बहुत हिमायत है. अब यही हिमायत हमें परमाणु समझौते के लिए भी चाहिए.”

भारत के फ़ैसले!
 भारत के सामरिक मामलों पर सिर्फ़ एक देश ही फैसला ले सकता है और वह है भारत. भारत विश्व स्तर पर स्थिति का आकलन करके अपने हित के हिसाब से फ़ैसले लेगा.
श्याम सरन

उनका कहना था कि इस समझौते के बारे में कुछ सांसदों ने आशंकाएं जताई हैं कि इससे परमाणु अप्रसार को धक्का लगेगा.

उसके जवाब में सरन का कहना था कि भारत ने कभी भी परमाणु अप्रसार नहीं किया और अब इस समझौते के बाद भारत में भी अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण के साथ परमाणु अप्रसार की मुहिम को और मज़बूती ही मिलेगी.

विदेश सचिव का कहना था कि उन्होंने इन सांसदों से कहा है कि अगर आप इस समझौते पर बहस करना चाहते हैं तो ज़रूर करें लेकिन इसे मंज़ूरी देने के लिए कोई शर्त लगाई जाएगी तो यह खटाई में पड़ सकता है.

श्याम सरन ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि इस समझौते का यह मतलब क़तई नहीं होगा कि अमरीका सामरिक मामलों में भारत के फ़ैसलों पर असर डालेगा.

सरन बोले, “भारत के सामरिक मामलों पर सिर्फ़ एक देश ही फैसला ले सकता है और वह है भारत. भारत विश्व स्तर पर स्थिति का आकलन करके अपने हित के हिसाब से फ़ैसले लेगा.”

उन्होंने कहा कि अमरीकी विदेश मंत्री कोंडोलीज़ा राईस और निकोलस बर्न्स से मुलाकात कर उन्होंने इस समझौते पर आगे बातचीत की है.

कोंडोलीज़ा राईस अगले सप्ताह सीनेट की विदेश मामलों की अहम समिति के सामने पेश होंगी जहाँ भारत के साथ समझौते पर गहरी छानबीन के साथ बहस होने की संभावना है.

विदेश सचिव शुक्रवार को ही भारत के लिए रवाना हो गए लेकिन उन्होंने कहा कि अगर उन्हें सांसदों की शंकाओं को दूर करने के लिए फिर अमरीका का दौरा करना पड़ा तो वह करेंगे.

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