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गुरुवार, 02 मार्च, 2006 को 16:25 GMT तक के समाचार
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महत्वपूर्ण होगा अमरीकी संसद का रुख़

बुश के साथ मनमोहन सिंह
महत्वपूर्ण है कि अमरीकी संसद में इसे कैसे पेश किया जाएगा
अभी मैं अमरीकी कांग्रेस के टॉम लॉन्टस का बयान पढ़ रहा था जिसमें कहा गया था कि भारत-अमरीका के बीच जो समझौते हो रहे हैं, वह अच्छी बात है पर इसका फिर से पुनर्मूल्यांकन किया जाएगा.

मेरी समझ में एक सवाल तो यह है कि भारत के पास पहले से ही परमाणु बम बनाने के लिए जो असुरक्षित सामग्री है, उसका क्या होगा क्योंकि इस सामग्री की मदद से तो भारत प्रतिवर्ष 200-300 परमाणु बम बना सकता है.

अमरीकी संसद के सामने अगर यह मसौदा जाता है तो पहला सवाल यही होगा कि क्या भारत की यह स्थिति इस समझौते को प्रभावित करती है.

बुश के लिए यह एक बड़ी समस्या होगी और बुश के ही कार्यकाल में इस सहमति को अगर एक समझौते का रूप नहीं दिया गया तो हो सकता है कि यह खटाई में पड़ जाए.

बुश प्रशासन की जो राजनीतिक ताकत है, वही इसे पारित करा सकती है.

वह भी कुछ महीनों में करना होगा क्योंकि उसके कुछ महीनों बाद ही अमरीका में कांग्रेस के चुनाव आ जाएंगे जिसमें रिपब्लिकन पहले से ही खटाई में पड़े हुए हैं.

इन चुनावों के बाद कुछ नहीं हो पाएगा इसलिए अगर अगले कुछ दिनों में ही यह स्थापित कर ले जाएं कि यह जो भारत-अमरीका सहमति है, इसके दूरगामी लाभ होंगे तो शायद यह समझौते को मंज़ूरी दिला सके.

सवाल ऊर्जा का

बुश अमरीकी संसद को समझाने की कोशिश करेंगे कि अगर आणविक ईधन का इस्तेमाल भारत करता है तो वह दुनियाभर के लिए कितना अच्छा होगा क्योंकि जिस तरह से तेल की कीमतें बढ़ रही हैं और भारत की ज़रूरतें ऐसे ही बढ़ती गईं तो वह आने वाले समय में अमरीका के लिए भी मुसीबत बन सकती हैं.

 बुश अमरीकी संसद को समझाने की कोशिश करेंगे कि अगर आणविक ईधन का इस्तेमाल भारत करता है तो वह दुनियाभर के लिए कितना अच्छा होगा क्योंकि जिस तरह से तेल की कीमतें बढ़ रही हैं और भारत की ज़रूरतें ऐसे ही बढ़ती गईं तो वह आने वाले समय में अमरीका के लिए भी मुसीबत बन सकती हैं

इसके अलावा वह ये बातें भी समझाने का प्रयास करेंगे कि भारत आने वाले समय में तेजी से आगे बढ़ेगा. ऐसे में उससे संबंधों में सुधार रणनीतिक रूप से अच्छा रहेगा.

पर इन दलीलों पर अमरीकी संसद अपने फ़ायदे का आकलन करेगी क्योंकि अमरीकी संसद के कई सदस्य परमाणु अप्रसार पर विश्वास करते हैं.

इसके साथ यह भी ध्यान देने योग्य पहलू है कि ऊर्जा की बचत आजकल अमरीकी संसद में एक बड़ा सवाल है और इसलिए बुश इसको उसी तरह से समझाने की कोशिश करेंगे.

आख़िरकार संसद यही देखेगी कि इन दलीलों में कितना दम है और भारत की आणविक क्षमता का प्रभाव क्या है.

इसके अलावा ईरान और उत्तरी कोरिया की जो समस्याएं है, उसपर क्या होगा.

इन तमाम पहलुओं के आधार पर ही यह तय होगा कि यह सहमति को समझौते के रूप में स्वीकार किया जाएगा या नहीं.

बुश किसमें ख़ुश

जॉर्ज बुश इसको लेकर थोड़ा विचारशील हैं कि अमरीका के राष्ट्रपति के रूप में अपना दूसरा और अंतिम कार्यकाल, जो कि अगले दो-तीन वर्षों में पूरा होने वाला है, के ख़त्म होने के बाद उन्हें किस तरह से और किस काम के लिए याद किया जाएगा.

 ऐसा होता भी रहा है कि अमरीका में जो भी राष्ट्रपति अपने दूसरे कार्यकाल में पहुँचता है, वह विदेश नीति पर ज़्यादा ज़ोर देता है क्योंकि राष्ट्रीय स्तर की राजनीति पर उसकी पकड़ कमज़ोर होने लगती है.

ऐसा होता भी रहा है कि अमरीका में जो भी राष्ट्रपति अपने दूसरे कार्यकाल में पहुँचता है, वह विदेश नीति पर ज़्यादा ज़ोर देता है क्योंकि राष्ट्रीय स्तर की राजनीति पर उसकी पकड़ कमज़ोर होने लगती है.

बुश भी चाहते हैं कि जैसे निक्सन को चीन से अमरीकी संबंधों को सुधारने के लिए याद किया जाता है, वैसे ही उन्हें भी भारत से संबंधों को नया विस्तार देने के लिए याद किया जाए.

यह सहमति भारत के लिए तो बहुत अच्छी है पर अमरीका में इसका क्या होगा, यह देखना पड़ेगा.

(रेनू अगाल से बातचीत पर आधारित)

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