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बुधवार, 01 मार्च, 2006 को 20:14 GMT तक के समाचार
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'स्वतंत्र विदेश नीति से समझौता न करें'
बुश-मनमोहन
सँभल-सँभल कर आगे बढ़ने की सलाह
भारत-अमरीका संबंधों पर अंग्रेज़ी दैनिक 'हिंदू' के वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन के विचार-

सवाल- हर व्यक्ति जॉर्ज बुश की इस यात्रा को एक लैंडमार्क यात्रा के तौर पर, और जो परमाणु समझौता होगा उससे जोड़कर देख रहा है. आप इसे किस रूप में देखते हैं?

जवाब- इसमें कोई शक नहीं कि जो परमाणु सवाल है वह जॉर्ज बुश की यात्रा का सबसे अहम हिस्सा होगा. इसलिए नहीं कि परमाणु समझौते में कोई नई बात होगी, क्योंकि पिछले साल जिस समझौते पर भारत के प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह और अमरीका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने हस्ताक्षर किए वह तो तय कर चुका है कि भारत और अमरीका परमाणु क्षेत्र में एक दूसरे को सहयोग करेंगे. लेकिन अभी तक दोनों देशों के बीच कोई रज़ामंदी नहीं बन पाई है. उम्मीद है कि इस बार सहमति कुछ हद तक बन जाएगी.

पिछले साल जो फ्रेमवर्क तैयार किया, जो बना उसे ठोस रूप इस यात्रा में दिया जाएगा. इसके अलावा भी कई तरह के सवाल हैं. सियासी नज़रिए से देखा जाए तो अमरीका भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी को बनाना चाह रहा है. भारत अमरीका से कुछ हथियार और लड़ाकू जहाज़ भी खरीदे, तो इन तमाम चीज़ों पर बातचीत होगी.

सवाल- परमाणु संधि के ज़रिए अमरीका और भारत के रिश्ते एक नए आयाम को छू रहे हैं. क्या इसका महत्व बढ़ा है एक दूसरे के लिए?

जवाब- पिछले वर्ष जुलाई में जब इस समझौते पर हस्ताक्षर हुए तब विशेषज्ञों की राय की थी कि यह बहुत बड़ा कदम है, जिसे भारत और अमरीका अकेले उठा रहे हैं. अमरीका पिछले 50 साल के परमाणु अप्रसार की नीति से पीछे हटते हुए भारत को एक नया दर्जा देने की कोशिश कर रहा है, ऐसा पिछले वर्ष कहा गया था. तब से लेकर आज तक उस समझौते की बारीकी में दोनों पक्ष जा रहे हैं.

तब ऐसा लग रहा है कि कहीं उस समझौते में भारत को परमाणु ताक़त का दर्जा दिया जा रहा है, पूरी तरह से बराबरी का दर्जा दिया जा रहा है. अब लगता है कि अमरीका पूरी तरह से राज़ी नहीं है कि उस किस्म का दर्जा भारत को दिया जाए. लेकिन जिस दिशा में समझौता जा रहा है उससे लगता है कि भारत को 1974 से परमाणु क्षेत्र में जो अलगाव झेलना पड़ा, लगता है कि अलगाव का वक़्त खत्म हो जाए. यह दोनों देशों के लिए वाकई में बहुत बड़ा क़दम होगा.

सवाल- इस तरह के आरोप लग रहें हैं कि विदेश नीति के स्तर पर भारत का झुकाव अमरीका की तरफ़ बढ़ता जा रहा है. पिछली सरकार पर भी इस तरह के आरोप थे, इस सरकार पर भी हैं. लेकिन जॉर्ज बुश की यात्रा के साथ-साथ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. तो क्या सरकार और जनता की आवाज़ में कुछ मतभेद हैं?

जवाब- मतभेद तो हैं. न केवल जनता और सरकार के बीच बल्कि सरकार के अंदर और यूपीए के बीच भी ऐसी आवाज़ें सुनने को मिल रही हैं.

पिछले सात-आठ महीनों में जिस तरह से कुछ गिने-चुने सवालों पर भारत के ऊपर अमरीका का दबाव पड़ा है. ईरान के मसले पर अमरीका ने भारत को दो-तीन बार जिस प्रकार चेतावनी दी कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की बैठक में आप ईरान के ख़िलाफ़ वोट डालेंगे और नहीं डालेंगे तो परमाणु क्षेत्र में जो समझौता हुआ है वह ख़तरे में पड़ सकता है. दूसरी बात अमरीका कह रहा है कि भारत ईरान से गैस और तेल सौदे न करे. और जो खासतौर से पाईपलाइन की बात भारत, पाकिस्तान और ईरान चला रहे हैं, अमरीका इन चीज़ों पर विरोध कर रहा है.

भारत के जो राजनीतिक दल हैं और यहाँ की जो जनता है उसको निश्चित रूप से लगा है कि इस दोस्ती के आगे बढ़ते हुए कहीं भारत कॉमप्रमाइज कर रहा हो.

जहाँ तक ईरान का सवाल है, भारत सरकार ने जो अपने बचाव में तर्क दिया है, मैं नहीं मानता कि ये तर्क सही हैं. ईरान के ख़िलाफ़ अमरीका जैसे आरोप लगा रहा है, जो प्रतिबंध की बात करता है, सैनिक कार्रवाई की बात करता है, तो मुझे नहीं लगता है कि भारत के हित में है कि किसी भी तरह के आगे बढ़ाने में सहमति दे या सहायता दे.

मेरा मानना है कि अमरीका के साथ आप दोस्ती के रिश्ते भी आगे बढ़ाएँ लेकिन साथ-साथ भारत एक बहुत बड़ा देश है, इकॉनॉमी मजबूत है, दुनिया में एक प्रोफाइल है, इसके मद्देनजर भारत को स्वतंत्र और स्वतंत्र विदेश नीति से समझौता नहीं करना चाहिए.

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