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भारत से समझौते पर अमरीका में बहस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत अमरीका परमाणु समझौते पर अमरीकी संसद में बहस जारी है. और अब भी बहुत से रिपब्लिकन औऱ डेमोक्रेट सांसद इस बात पर अड़े हुए हैं कि इस समझौते को मंज़ूर करने के लिए बुश प्रशासन को कुछ शर्तें माननी पड़ सकती हैं. उधर अपने अमरीका दौरे पर आए भारतीय विदेश सचिव श्याम सरन अमरीकी सांसदों से मिल रहे हैं और उनकी शंकाओं को दूर करने की कोशिश में लगे हैं. गुरूवार को वाशिंगटन में हेरिटेज फाउंडेशन में एक सभा में श्याम सरन ने इस बात पर ज़ोर दिया कि अमरीका द्वारा भारत को जो असैन्य परमाणु तकनीक दी जानी है उससे भारत में परमाणु हथियार के भंडार नहीं बनाए जाएँगे बल्कि उसे असैन्य परमाणु संस्थानों में ही इस्तेमाल किया जाएगा. श्याम सरन ने कहा,"अमरीका और भारत जिस समझौते पर पहुंचे हैं वह एक असैन्य परमाणु तकनीक के सहयोग के बारे में है. यह कोई परमाणु हथियारों के बारे में समझौता नहीं हुआ है." उन्होने इस बात का भी ज़ोरदार खंडन किया कि इस समझौते के कारण दक्षिण एशिया में परमाणु हथियारों की होड़ शुरू हो जाएगी. परमाणु हथियारों के मामले में श्याम सरन का कहना था कि परमाणु अप्रसार संधि यानी एनपीटी पर मतभेद के कारण हस्ताक्षर नहीं करने के बावजूद भारत ने हमेशा परमाणु अप्रसार के प्रति अपनी प्रतिबद्वता साबित की है. भारत का कहना है कि इस समझौते से अमरीका और भारत के बीच सामरिक रिश्तों में ज़्यादा मज़बूती आएगी और दोनों को ही इस समझौते के कारण लाभ होगा. इसी के साथ भारत को अपनी उर्जा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए परमाणु तकनीक से बहुत मदद भी मिलेगी. सांसदों का रूख़
अमरीका के कई सांसद अमरीका और भारत के बीच सामरिक साझेदारी को बढ़ावा देने के पक्ष में भी हैं. साउथ केरोलाईना प्रदेश से सांसद जो विल्सन लंबे अरसे से भारत के हिमायती रहे हैं. उनका कहना है," भारत औऱ अमरीका अगर परमाणु समझौते के तहत उर्जा की समस्या सुलझाते हैं तो दोनो दोशों को फायदा होगा. इससे अमरीका में भी नौकरियाँ बढ़ेंगी औ व्यापार बढेगा. और रही बात परमाणु अप्रसार की तो भारत का रिकॉर्ड इस मामले में बहुत बेहतरीन है." लेकिन अमरीकी संसद के दोनो सदनों में रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों ही पार्टी के कई ऐसे सांसद भी हैं जो भारत को परमाणु तकनीक यह कह कर न दिए जाने पर ज़ोर दे रहे हैं कि इससे परमाणु अप्रसार की मुहिम को नुक़सान होगा. इनमें सबसे महत्वपूर्ण हैं मैसाचुसेट्स से सांसद एड मार्की, जो प्रतिनिधि सभा के वरिष्ठ सदस्य हैं. उनका कहना है,"भारत ने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर करने से साफ़ इंकार किया है. उसने अपने सारे परमाणु संस्थानों को निरीक्षण के लिए खोलने से इंकार किया है. और परमाणु हथियारों का बड़ा भंडार बनाने में लगा हुआ है." और इन्हीं ख़तरों का ज़िक्र करते हुए अमरीकी प्रतिनिधि सभा के विदेश मामलों की समिति के अध्यक्ष हेनरी हाईड ने यह कहा है कि इस समझौते को कुछ शर्तों के साथ ही मंज़ूरी दी जा सकेगी. चेतावनी लेकिन भारत सरकार और बुश प्रशासन ने साफ तौर पर कह दिया है कि अगर इस समझौते में किसी प्रकार की फेरबदल की गई तो समझौता नाकाम हो सकता है. श्याम सरन का कहना था,"अमरीका और भारत जिस समझौते पर पहुँचे हैं वह बहुत ही पेचीदा और तकलीफ़देह बातचीत के दौर का नतीजा है. इसलिए जो भी शर्तें रखी जाएँ वह उसी आपसी समझौते की सीमा में रह कर ही रखी जाएं." भारतीय विदेश सचिव श्याम सरन की अमरीकी सेनेटर रिचर्ड लूगर और जोसफ बाईडन से मुलाकात करने की उम्मीद है. इस बीच गुरूवार को ही श्याम सरन ने एक अहम अमरीकी सांसद टॉम लेंटोस से मुलाक़ात की. टॉम लेंटोस ने सरन को चेताया कि भारत के ईरान के साथ रिश्तों के लेकर भी कई सांसदों में रोष है. और इस कारण भी इस समझौते पर सहमति देने से पहले इस मुददे पर भी बहस होगी. लेकिन अमरीका के दबाव के बावजूद भारत कहता रहा है कि ईरान के साथ उसके बहुत पुराने संबंध हैं और वह उन्हें बरक़रार रखेगा. विरोध इन सांसदों के अलावा कई परमाणु विशेषज्ञ और अमरीकी राजनीतिज्ञ भी इस समझौते के खिलाफ आवाज़ उठा रहे हैं. इनमे सबसे अहम हैं पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर, संयुक्त राष्ट्र के पूर्व परमाणु हथियार निरीक्षक डेविड अलब्राईट और पूर्व सेनेटर सेम नन. जिमी कार्टर ने वाशिंगटन पोस्ट समाचार पत्र में एक लेख लिखा जिसमें उन्होने कहा कि भारत के साथ बुश प्रशासन ने यह समझौता करके परमाणु अप्रसार को ताक पर रख दिया है. कार्टर कहते हैं कि भारत को परमाणु तकनीक सिर्फ तभी दी जानी चाहिए जब वह एनपीटी पर हस्ताक्षर कर दे. कार्टर का कहना है,"तीन दशकों से ज़्यादा से भारत के राजनेताओं की परमाणु महत्वकांक्षाओं को जानते हुए, मैंने और अन्य अमरीकी राष्ट्रपतियों ने भारत के प्रति एक रही रवैया अपनाया था और वह था कि जो भी देश परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं करता तो उसे असैन्य मामलों के लिए परमाणु तकनीक या ईंधन नहीं बेचा जाएगा." अमरीका में इस साल नवंबर में संसदीय चुनाव होने हैं और राष्ट्रपति जॉर्ज बुश की हिमायत भी लोगों में बहुत कम हो गई है इसलिए उनकी पार्टी के सांसद भी उनसे दूरी बनाने में लगे हैं. और इसलिए यह कहा जा रहा है कि ज़रूरी नहीं है कि रिपब्लिकन पार्टी के सांसद भी बुश प्रशासन की नीति को अपनाते हुए इस समझौते को पारित करने में मदद करें. | इससे जुड़ी ख़बरें अमरीका को आश्वस्त करने की कोशिश30 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस 'भारत को परमाणु तकनीक देना उचित'22 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस पाक ने की परमाणु सहमति की आलोचना 18 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस रूस भारत को यूरेनियम बेचेगा14 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस 'सामरिक कार्यक्रम पर कोई अंकुश नहीं'07 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस भारत-अमरीका में परमाणु सहमति02 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस महत्वपूर्ण होगा अमरीकी संसद का रुख़02 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस इंटरनेट लिंक्स बीबीसी बाहरी वेबसाइट की विषय सामग्री के लिए ज़िम्मेदार नहीं है. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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