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'परमाणु सहमति में फेरबदल से मुश्किलें' | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत ने कहा है कि भारत-अमरीका परमाणु सहमति में अगर कोई फेरबदल किया गया तो उससे मुश्किलें पैदा हो सकती हैं. भारतीय विदेश सचिव श्याम सरन ने हालाँकि गुरूवार को लंदन में पत्रकारों से बात करते हुए यह बताने से इनकार कर दिया कि किस तरह की मुश्किलें आ सकती हैं. उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा कि सहमति को अमरीकी संसद से पारित कराने की दिशा में काम चल रहा है. श्याम सरन ने कहा, "अठारह जुलाई 2005 को अमरीकी राष्ट्रपति और भारतीय प्रधानमंत्री के बीच बहुत सोच-विचार के बाद एक समझौता हुआ था और उसमें बदलाव करने की ज़रूरत नहीं है." भारतीय विदेश सचिव ने बताया कि निकोलस बर्न्स ने उन्हें बुश प्रशासन के प्रयासों से अवगत कराया है और वे उनकी कोशिशों से संतुष्ट हैं. अमरीकी सहायक विदेश मंत्री निकोलस बर्न्स से लंदन में मुलाक़ात के बाद भारतीय विदेश सचिव ने कहा, "अभी काम किया जाना बाक़ी है लेकिन गाड़ी पटरी पर है और संकेत सकारात्मक हैं." जब उनसे पूछा गया कि क्या काम किए जाने बाक़ी हैं तो उन्होंने कूटनीतिक चतुराई दिखाते हुए इतना ही कहा, "जब तक समझौते को अमरीकी कांग्रेस की मंज़ूरी नहीं मिल जाती तब तक काम होते ही रहेंगे." अड़चनें भारतीय विदेश सचिव ने माना कि कुछ अड़चनें हैं जिन्हें दूर करने के प्रयास चल रहे हैं और भारत-अमरीका दोनों महसूस करते हैं कि इस सहमति में दोनों का हित है.
जब उनसे पूछा गया कि क्या भारत पर परमाणु परीक्षण रोकने का वादा करने का दबाव है तो उन्होंने कहा, "भारत पर किसी तरह का दबाव नहीं है और जहाँ तक परमाणु परीक्षणों की बात है तो भारत ने पहले ही इस पर रोक लगा दी है." श्याम सरन का कहना था कि भारत ने अपनी तरफ़ से वे सारे काम कर दिए हैं जो अमरीकी संसद की मंज़ूरी के लिए ज़रूरी थे और अब अमरीकी प्रशासन का दायित्व है कि वह इसे संसद से मंज़ूर कराए. उन्होंने कहा, "भारत को जो कुछ करना था वह तो हो चुका है जैसे कि सैनिक और असैनिक परमाणु संयंत्रों को अलग करना और असैनिक परमाणु संयंत्रों को अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के दायरे में लाना." भारतीय विदेश सचिव से जब पूछा गया कि उन्हें कब तक इस सहमति को मंज़ूरी मिल जाने की उम्मीद है तो उन्होंने कोई समयसीमा देने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा कि भारत अपनी तेज़ी से बढ़ती ऊर्जा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए परमाणु ईंधन का उपयोग अधिक से अधिक करना चाहता है ताकि विकास की गति को बनाए रखा जा सके. | इससे जुड़ी ख़बरें भारत से समझौते पर अमरीका में बहस31 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस अमरीका को आश्वस्त करने की कोशिश30 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस 'भारत को परमाणु तकनीक देना उचित'22 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस परमाणु सहमति की आलोचना 18 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस 'भारत कोई नियम नहीं तोड़ रहा है'15 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस रूस भारत को यूरेनियम बेचेगा14 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस विदेश नीति पर मनमोहन की सफ़ाई14 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस 'सामरिक कार्यक्रम पर कोई अंकुश नहीं'07 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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