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विदेश नीति पर मनमोहन की सफ़ाई | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि अमरीका के साथ भारत के बढ़ते संबध भारत की विदेश नीति की स्वतंत्रता को प्रभावित नहीं कर रहे हैं. प्रधानमंत्री ने कहा कि विदेश नीति उर्जा सुरक्षा और घरेलू नीतियों से जुड़ी हुई है. उन्होंने कहा कि ऊर्जा ज़रुरतों को पूरा करने के लिए विभिन्न देशों से संबंध बनाने होंगे चाहे वह अमरीका हो या कोई अन्य और देश हो. बहस के दौरान जहां बीजेपी और वाम दल एक साथ दिखे वहीं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बड़े ही विश्वास के साथ यूपीए सरकार की विदेश नीति की सफलताएं गिनाई. प्रधानमंत्री का कहना था कि सभी को ये बात समझनी चाहिए कि अमरीका एक महाशक्ति है. उनका कहना था कि भारत को अपने हितों को ध्यान में रखना होगा और अमरीका से संबंध इसी को ध्यान में रखते हुए बढ़ाए जा रहे हैं. उन्होंने कहा “ मैं सदन से सिर्फ इतना कहना चाहूंगा कि हमारी नीतियों को संपूर्णता में देखा जाए. सिर्फ एक देश के साथ संबंधों के आधार पर आलोचना न हो. अमरीका के साथ हमारे संबंधों में जो भी बदलाव हुए हैं उसके लिए मैं माफी नहीं मांगने वाला. इनका स्वागत होना चाहिए क्योंकि इससे हमारे लिए विकल्प बढ़े हैं. ऐसा न सोचा जाए कि अमरीका के साथ समझौते हमारी स्वतंत्र राय को प्रभावित करते हैं. ऐसा सोचना गलत होगा.” उन्होंने कहा कि अमरीका के साथ संबंध बढ़ाने को ये न समझा जाए कि भारत अमरीका का पिछलग्गू है. इससे पहले बहस की शुरुआत करते हुए पूर्व विदेश मंत्रि जसवंत सिंह ने भी अमरीका की आलोचना की और कहा कि वो अपनी शक्ति की सीमाएं भूल रहा है. उनका कहना था “ये कहना सही होगा कि अमरीका की शक्तियां बहुत बढ़ी हुई हैं और वह इसका खुलकर प्रदर्शन करता है. या कहें कि इसके मज़े लूट रहा है. ये कहना कि अमरीका को इसमें कोई शक भी है सही नहीं होगा. ” जसवंत सिंह की इस टिप्पणी का वामपंथी नेता सीताराम येचुरी ने स्वागत किया और कहा कि देर से सही लेकिन अगर किसी के विचार बदल रहे हैं तो अच्छा है लेकिन ये विचार ऐसे ही रहने चाहिए. येचुरी ने भी अमरीका की आलोचना की और कहा कि भारत को अमरीका से संबंध बढ़ाने से पहले दबाव का भी ध्यान रखना चाहिए. उन्होंने कहा “जहां तक सुरक्षा परिषद में शामिल होने का सवाल है या फिर बहुधुव्रीय विश्व का या फिर कोई और मसला हो. भारतीय विदेश नीति एक विशेष देश की तरफ झुकी दिखाई देती है. हमें अमरीका से बढ़ते संबंधों पर आपत्ति नहीं है लेकिन हम ये जानते हैं कि इस बढ़ते संबंध के साथ ही दबाव भी बढ़ता है जिसका सरकार को ख़्याल रखना होगा.” येचुरी ने यह भी कहा कि विदेश नीति के दस्तावेज में सभी देशों के परमाणु शस्त्रों को समाप्त करने की प्रतिबद्धता का ज़िक्र नहीं किया गया है. इस प्रश्न का विशेष उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत एकमात्र परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र है जो चाहता है कि सभी देश अपने सभी परमाणु शस्त्र समाप्त करे. प्रधानमंत्री ने फ्रांस, चीन, जापान, बर्मा और बांग्लादेश के साथ बेहतर होते संबंधों का ज़िक्र किया और कहा कि नेपाल और बांग्लादेश ऐसे पड़ोसी हैं जहां की घरेलू गतिविधियों से भारत प्रभावित होता है. उन्होंने इसी संदर्भ में बर्मा का भी ज़िक्र किया. पाकिस्तान के बारे में प्रधानमंत्री का कहना था कि विवादों का निपटारा बातचीत से होना चाहिए और राष्ट्रपति मुशर्रफ़ को पाकिस्तान की भूमि पर चल रहे आतंकवादी शिविरों को बंद करना चाहिए. होली की पूर्व संध्या पर इस गंभीर बहस के दौरान एक समय ऐसा भी आया जब सदन में सिर्फ पाँच छह लोग थे और सदस्यों ने बहस बंद कर देने की भी मांग की. भाजपा ने विदेश नीति पर बहस की मांग की थी और लंच के बाद भाजपा का कोई भी ,सदस्य सदन में नहीं था. हालांकि शाम को कई सांसद सदन में थे जिन्होंने प्रधानमंत्री का भाषण सुना. | इससे जुड़ी ख़बरें ऑस्ट्रेलिया भारत पर प्रतिबंध जारी रखेगा13 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस 'सामरिक कार्यक्रम पर कोई अंकुश नहीं'07 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस परमाणु सौदे की प्रशंसा से पटे अख़बार03 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस भारत-अमरीका में परमाणु सहमति02 मार्च, 2006 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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