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भारत समझौते को मंज़ूर करे नहीं तो.. | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अमरीका ने कहा है कि असैनिक परमाणु सहयोग समझौते को मंज़ूर करने के लिए भारत के पास आख़िरी अवसर है नहीं तो समझौता रद्द होने का ख़तरा है. अमरीकी विदेश उपमंत्री निकोलस बर्न्स ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स से कहा कि परमाणु समझौते पर समय बर्बाद हो रहा है क्योंकि अमरीका में यह वर्ष राष्ट्रपति चुनावों का है. दूसरी ओर भारत में अमरीका के राजदूत डेविड मलफ़ोर्ड का कहना है कि अगर मौजूदा अमरीकी संसद से समझौते को अंतिम मंज़ूरी नहीं मिली तो इस बात की संभावना कम ही है कि दोबारा भारत को इस तरह का अवसर मिले. इस विवादास्पद समझौते के लागू होने पर अमरीका और परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) के देशों से भारतीय परमाणु संयंत्रों को इंधन की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित की जा सकेगी. ऐसा पहली बार हुआ है कि परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर दस्तख़त नहीं करने के बावजूद इस तरह की रियायत की पेशकश भारत को की गई है. दोनों देशों के बीच 18 जुलाई 2005 को इस ऐतिहासिक समझौते पर सहमति बनी थी जब भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अमरीका के दौरे पर गए थे.
इसके अगले साल अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के भारत दौरे पर समझौते को आगे बढ़ाने की दिशा में अहम प्रगति हुई जब भारत ने अपने सैनिक और असैनिक परमाणु संयंत्रों को अलग-अलग करने पर हामी भर दी. लेकिन इसके बाद भारत में वामपंथी दलों ने समझौते के ख़िलाफ़ कड़े तेवर अख़्तियार कर लिए और इस मुद्दे पर सरकार से समर्थन वापस लेने की धमकी तक दे डाली. उधर मुख्य विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने भी आरोप लगाया कि मौजूदा स्वरूप में समझौता होने पर भारत की संप्रभुता ख़तरे में पड़ जाएगी. अंत में भारत सरकार को वामपंथी दलों के दबाव के आगे झुकना पड़ा और इस समझौते पर एक समिति गठित की गई जिसकी अनुमति के बिना आगे बातचीत नहीं की जा सकती. भारत के लिए फ़ायदेमंद अमरीकी राजदूत डेविड मलफ़ोर्ड ने एक निजी समाचार चैनल से कहा कि यह समझौता भारत के हित में है और इससे वह दुनिया में असैनिक परमाणु उद्योग के केंद्र में होगा.
उन्होंने कहा, "अगर इसे मौजूदा अमरीकी कॉंग्रेस से अंतिम मंज़ूरी नहीं मिली तो इसकी संभावना कम है कि भारत को इस समझौते की पेशकश दोबारा की जाएगी. तब निश्चित रूप से समझौते को वर्ष 2010 तक पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता चाहे सत्ता में डेमोक्रैटिक या रिपब्लिकन पार्टी आए." मलफ़ोर्ड का कहना है कि समझौता दोबारा तैयार करने पर इसे फिर से कॉंग्रेस की समिति से होकर गुजरना होगा और तब परमाणु अप्रसार के लिए काम करने वाले संगठन रियायतों के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलंद कर सकते हैं. वो कहते हैं, "मैं समझता हूँ कि माहौल बदल रहा है और इसलिए मेरा मानना है कि अमरीका में डेमोक्रैट और रिपब्लिकन दोनों मानते हैं कि समझौते को अभी पूरा कर लिया जाए." |
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