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'परमाणु करार की कोई ख़ास ज़रूरत नहीं' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
अगर नपे तुले शब्दों में कहा जाए तो भारत को अमरीका के साथ परमाणु सहयोग समझौता करने की कोई ख़ास ज़रूरत है ही नहीं, क्योंकि देश का अपना परमाणु कार्यक्रम है जो अच्छी तरह से चल रहा है. अमरीका के साथ परमाणु सहयोग सहमति से जो झलक रहा है वो ये है कि भारत को किसी तरह परमाणु अप्रसार संधि वाले देशों में शामिल करने की कोशिश की जाए. इस संदर्भ में न्यूक्लियर स्पलायर्स ग्रुप यानी परमाणु ईंधन, सामग्री और उपकरण बेचने वाले देशों का गुट और उसमें शामिल होने की पूरी प्रक्रिया सिर्फ़ एक दिखावा है. परमाणु सहयोग के लिए सहमति बनाकर भारत को ख़ुद के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम चलाने में बिना किसी शर्तों के मदद मिलनी चाहिए. परमाणु ऊर्जा कंपनियों का कारोबार इस समय किया जा रहा परमाणु करार यदि भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम में मदद नहीं करता तो कम से कम उसकी क्षमता को नुक़सान तो न पहुँचाए. इस परमाणु समझौते से तो ऐसा झलकता है कि पश्चिमी देशों की ऐसी परमाणु ऊर्जा कंपनियों के लिए एक बाज़ार की तलाश की जाए जिनका कारोबार अच्छा नहीं चल रहा है. और ऐसे बाज़ार इस समय तो भारत और चीन ही नज़र आ रहे हैं. इसके अलावा भारत में भी कुछ कारोबारी हित काम कर रहे हैं जो राजनीतिक नेताओं पर इस सहयोग सहमति को वास्तविक रूप देने का दबाव बनाते रहे हैं. हालांकि ये कहा जा रहा है कि इस परमाणु समझौते की वजह से भारत की साख़ बढ़ेगी लेकिन मुख्य मुद्दा परमाणु उद्योग जगत के धन का है. इतना कहा जा सकता है कि कारोबार मिलने में कोई हर्ज नहीं है लेकिन इसके लिए जो शर्तें मानी जाएँ वो समानता के सिद्धांत पर होनी चाहिए. बीबीसी संवाददाता महबूब ख़ान के साथ बातचीत पर आधारित |
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