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सभी जजों की रिहाई होगी: गीलानी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान की संसद ने सोमवार को देश का अगला प्रधानमंत्री चुन लिया है. संसद ने पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के यूसुफ़ रज़ा गीलानी के नाम पर मुहर लगाई. प्रधानमंत्री चुने जाने के साथ ही उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के आदेश पर आपातकाल के दौरान जिन जजों को हिरासत में लिया गया था वे उन्हें रिहा करने का आदेश देंगे. पुलिस ने पाकिस्तान के पूर्व मुख्य न्यायाधीश इफ़्तिखार चौधरी के घर के बाहर कटीली तार हटा दी है और उन्होंने बाहर आकर लोगों का अभिनंदन स्वीकार किया है. इसके अलावा गीलानी ने कहा है कि वे एक प्रस्ताव लाएँगे कि पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो की हत्या की संयुक्त राष्ट्र से जाँच करवाई जाए. उन्होंने कहा, "संसद में मेरा पिछला अनुभव बताता है कि अगर आप चाहते हैं कि ये देश काम करे तो संसद को सर्वोच्च और संविधान को पाक होना चाहिए और क़ानून का पालन होना चाहिए." प्रधानमंत्री पद की दौड़ में गीलानी के ख़िलाफ़ राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के समर्थक चौधरी परवेज़ इलाही ने भी पर्चा भरा था. परवेज़ इलाही को 42 वोट मिले जबकि गीलानी के खाते में 264 वोट गए. पाकिस्तान में फ़रवरी में आम चुनाव हुए थे और पीपीपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. अब एक महीने से भी ज़्यादा समय के बाद प्रधानमंत्री का चुनाव हो पाया है. चुनाव में किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के कारण बेनज़ीर भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी और नवाज़ शरीफ़ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) ने कुछ अन्य छोटे दलों के साथ मिलकर गठबंधन सरकार बनाने का फ़ैसला किया था. गठबंधन का सबसे बड़ा दल होने के नाते प्रधानमंत्री का पद पीपीपी को मिला है और उसने इस पद के लिए यूसुफ़ रज़ा गीलानी को मैदान में उतारा. प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार चुनने में पीपीपी ने काफ़ी समय लगाया और तमाम नामों पर विचार के बाद यूसुफ़ रज़ा गीलानी के नाम की घोषणा की गई. बेनज़ीर भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को क़रीब 12 साल बाद सरकार में आने का मौक़ा मिला है. पीपीपी एक ऐसे गठबंधन सरकार की अगुवाई करेगी जिसके पास नेशनल असेंबली में स्पष्ट बहुमत है. गीलानी का परिचय गीलानी पीपीपी के वफ़ादार और पार्टी के सह अध्यक्ष आसिफ़ अली ज़रदारी के क़रीबी माने जाते हैं. मुशर्रफ़ के शासनकाल के दौरान उन पर काफ़ी दबाव पड़ा कि वे पीपीपी से अलग हुए धड़े के साथ जुड़ जाएँ. लेकिन गीलानी ने मुशर्रफ़ से समझौता करने से इनकार कर दिया. इस कारण पार्टी के अंदर उनकी निष्ठा की काफ़ी सराहना होती रही है. ग़ैर क़ानूनी सरकारी नियुक्तियों के मामले में उन्हें पाँच साल की सज़ा सुनाई गई थी और उन्हें वर्ष 2001 में जेल भी भेजा गया था. गीलानी पर आरोप था कि संसद का स्पीकर रहते उन्होंने वर्ष 1993-96 के दौरान सरकारी नियुक्तियों में धाँधली की. मुशर्रफ़ ने एक भ्रष्टाचार निरोधक अदालत का गठन कराया था और गीलानी को इसी अदालत ने दोषी ठहराया था. मुशर्रफ़ के विरोधियों का कहना है कि उन्होंने ऐसे तरीक़े अपनाकर पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के सदस्यों को डराने और तोड़ने की कोशिश की. |
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