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शनिवार, 22 मार्च, 2008 को 21:59 GMT तक के समाचार
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पार्टी के वफ़ादार सिपाही हैं गीलानी

यूसुफ़ रज़ा गीलानी
बेनज़ीर भुट्टो के क़रीबी थे गीलानी
पाकिस्तान में प्रधानमंत्री पद के लिए पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की ओर से चुने गए यूसुफ़ रज़ा गीलानी की बात मानें तो परवेज़ मुशर्रफ़ के शासनकाल के दौरान वे सरकार की आँखों में चुभते रहे.

मुशर्रफ़ के शासनकाल के दौरान उन पर काफ़ी दबाव पड़ा कि वे पीपीपी से अलग हुए धड़े के साथ जुड़ जाएँ. लेकिन गीलानी ने मुशर्रफ़ के साथ कोई भी समझौता करने से इनकार कर दिया.

इस कारण पार्टी के अंदर उनकी निष्ठा की काफ़ी सराहना होती रही है. ग़ैर क़ानूनी सरकारी नियुक्तियों के मामले में उन्हें पाँच साल की सज़ा सुनाई गई और उन्हें वर्ष 2001 में जेल भी भेजा गया.

उन पर आरोप था कि वर्ष 1993-96 के दौरान उन्होंने सरकारी नियुक्तियों में धाँधली की, जब वे संसद के स्पीकर थे. राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने राजनीति को भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के लिए एक भ्रष्टाचार निरोधक अदालत का गठन कराया था.

इसी अदालत ने गीलानी को दोषी ठहराया. मुशर्रफ़ के विरोधियों का कहना है कि उन्होंने ऐसे तरीक़े अपनाकर पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के सदस्यों को डराने और तोड़ने की कोशिश की.

दबाव

गीलानी के समर्थकों का कहना है कि इन सब दबावों के बावजूद गीलानी ने पार्टी से अलग होने की बातों पर ध्यान ही नहीं दिया. गीलानी काफ़ी मृदुभाषी हैं और अपने समर्थकों में वे हमेशा सही काम करने के लिए जाने जाते हैं.

पार्टी समर्थकों ने इस ख़बर का स्वागत किया

वर्ष 1995 में गीलानी ने उन सांसदों को रिहा करने के निर्देश जारी किए जिनकों पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सरकार ने ही बंदी बनाया था. जब गृह मंत्रालय ने ऐसा करने से इनकार कर दिया, तो उन्होंने यह मामला रिकॉर्ड में दर्ज किया, जैसा पाकिस्तान में पहले कभी नहीं हुआ.

जब वर्ष 2001 में उन्हें जेल भेजा गया, उस समय भी वे स्पष्टवादी बने रहे. उन्होंने डॉन अख़बार से बातचीत में कहा- मेरे ख़िलाफ़ आरोप गढ़े गए हैं ताकि मुझ पर पीपुल्स पार्टी छोड़ने के लिए दबाव बनाया जा सके. चूँकि मैंने उनकी बात मानने से इनकार कर दिया, इसलिए मुझे सज़ा दी गई. ताकि अन्य नेताओं के लिए यह मिसाल बन सके.

उनके कड़े रुख़ और साफ़-साफ़ बोलने की आदत के कारण उनकी लोकप्रियता बढ़ी और सरकार में भी कई लोग उनके चाहने वाले थे.

सरकार विरोधी राजनीति और इसका अगुआ बनना ऐसी चीज़ थी, जो उन्हें विरासत में मिली थी. नौ जून 1952 को कराची में जन्मे गीलानी का परिवार पंजाब का रहने वाला था.

ज़मींदार परिवार

पंजाब प्रांत के दक्षिणी इलाक़े में रहने वाले गीलानी बड़े ज़मींदार परिवार से आते हैं और इस परिवार के लोग धार्मिक नेता भी रहे हैं. उनका गृहनगर मुल्तान है. परिवार के क़द के कारण राजनीति में भी उनका दख़ल बढ़ा.

ज़रदारी और बिलावल ने भी उनमें आस्था दिखाई है

उनके दादा और कई रिश्तेदार ऑल इंडिया मुस्लिम लीग से जुड़े और 1940 के पाकिस्तान प्रस्ताव पर उनके हस्ताक्षर भी थे. यह वही घोषणापत्र था, जिसके आधार पर आख़िरकार भारत का बँटवारा हुआ.

उनके पिता अलमदार हुसैन गीलानी 1950 के दशक में पंजाब प्रांत में मंत्री रहे. यूसुफ़ रज़ा गीलानी ख़ुद 1978 में उस समय चर्चा में आए जब मुस्लिम लीग की केंद्रीय नेतृत्व में उन्हें जगह मिली.

इसके ठीक पहले उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एमए किया था. जनता के सेवक के रूप में उनकी पहली पारी उस समय शुरू हुई जब उन्होंने जनरल ज़िया के मनोनीत की तरह काम किया.

वर्ष 1983 में उन्हें मुल्तान यूनियन काउंसिल का चेयरमैन चुना गया. दो साल बाद संघीय संसद के लिए वे चुने गए. लेकिन सांसद के रूप में अपने पहले कार्यकाल के दौरान ही कुछ ऐसी परिस्थितियाँ बनीं कि उन्हें मुस्लिम लीग छोड़ना पड़ा.

मतभेद

मंत्री के रूप में काम करते समय उनका तत्कालीन प्रधानमंत्री मोहम्मद अली जुनेजो के साथ मतभेद हो गया. इसके बाद पहले तो वे मंत्री पद से हटाए गए और फिर पार्टी में भी उन्हें दरकिनार किया जाने लगा.

आरोप है कि मुशर्रफ़ ने उन पर काफ़ी दबाव डाला

जेल से लिखी अपनी किताब चाह-ए-यूसुफ़ की सदा में गीलानी उस समय अपनी मानसिक स्थिति का ज़िक्र करते हैं और बताते हैं- मैं उस समय काफ़ी ग़ुस्से में था, लेकिन असहाय भी था. मैं जानता था कि मैं पार्टी में बना नहीं रह सकता...फिर मैंने फ़ैसला कर लिया.

गीलानी के मुताबिक़ इसके बाद वे बेनज़ीर भुट्टो से मिलने कराची गए, जो उस समय राजनीतिक रूप से एकांतवास में जी रही थी. उस समय जनरल ज़िया सत्ता में थे और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का कोई भविष्य नज़र नहीं आ रहा था.

गीलानी ने उसी समय पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी में शामिल होने की पेशकश की. गीलानी के अनुसार, उनकी पेशकश पर बेनज़ीर भुट्टो ने कहा---मैं आपको अभी कुछ नहीं दे सकती, आप मेरे पास क्यों आए हैं.

गीलानी की मानें तो इस सवाल के जवाब ने ही भुट्टो परिवार और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के साथ उनके रिश्तों की बुनियाद रखी.

ईनाम

गीलानी के मुताबिक़ बेनज़ीर के सवाल पर उन्होंने कुछ यूँ जवाब दिया- इस दुनिया में तीन तरह के लोग होते हैं. सम्मान के प्रेमी, बुद्धि के प्रेमी और दौलत प्रेमी. मैं इसमें पहली तरह का इंसान हूँ और मैं आपसे यही चाहता हूँ.

बेनज़ीर भुट्टो से काफ़ी प्रभावित रहे हैं गीलानी

इसके तुरंत बाद जनरल ज़िया ने जुनेजो की सरकार को बर्ख़ास्त कर दिया. इसके बाद गीलानी ने पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी में शामिल होकर अपना राजनीतिक बनवास तोड़ा.

जानकारों का कहना है कि पार्टी के प्रति उनकी निष्ठा और राजनीतिक जोड़-तोड़ से उनकी दूरी के कारण ही अब उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए चुना गया है.

कई लोग ये भी मानते हैं कि अगर आसिफ़ अली ज़रदारी सांसद चुने जाते हैं और इसके बाद वे प्रधानमंत्री बनना चाहेंगे तो गीलानी चुपचाप उन्हें अपनी गद्दी सौंप देंगे.

पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के सूत्रों की मानें तो शायद गीलानी ही ऐसे व्यक्ति हैं जो ज़रदारी की राह में रोड़ा नहीं बन सकते और इसी वफ़ादारी के कारण उनके नाम को मंज़ूरी मिली है.

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