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पाकिस्तानी लोकतंत्र में कट्टरपंथी पार्टियाँ | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
धार्मिक पार्टियाँ हमेशा से पाकिस्तानी राजनीति का वह ग़ुब्बारा रही हैं जिनमें जब भी हवा भरी जाती है तो वह विशाल नज़र आती हैं, लेकिन हवा निकल जाए तो इनका आकार सिकुड़ कर रह जाता है. अगर कोई विदेशी पाकिस्तान आए तो धार्मिक झंडों, दाढ़ी वाले युवकों, मस्जिदों से निकलने वाली भीड़ और दीवारों पर लिखे नारे देख कर लगता है जैसे सारे देश पर मौलवीयों का क़ब्ज़ा है. लेकिन जब उन्हें बताया जाता है कि जनता को जब भी वोट देने का अवसर मिला तो उन्होंने धर्म और राजनीति को हमेशा अलग-अलग रख कर वोट दिया तो बाहर से आने वाला बहुत हैरान होता है. वोटर ने धर्म को अलग रखा धार्मिक पार्टियों की ज़ोरशोर से चलाई जाने वाली राजनीति के बावजूद पाकिस्तान के पूरे इतिहास में कोई भी धार्मिक पार्टी अपने तौर पर सीटें भी नहीं जीत पाई है. हाँ, ये बात अलग है कि दूसरी राजनीतिक पार्टीयों के मुक़ाबले धार्मिक पार्टियाँ अधिक व्यवस्थित रहीं हैं और उनका कार्यकर्ता अधिक पुरजोश है. इसलिए वह शहरों में जलसे-जलूस करके हमेशा अपनी मांग मनवाने और ख़बरें छपवाने की स्थिति में रही हैं और ज़रूरत पड़ने पर उनकी इस शक्ति का इस्तेमाल सत्ता में मौजूद लोगों ने किया है. मिसाल के तौर पर यह जमाते-इस्लामी ही थी जिसने 1949 में पाकिस्तान की पहली असेंबली से प्रस्ताव पारित करवाया था कि जिन्ना की 'सेकूलर' यानी धर्मनिरपेक्ष सोच के विपरीत पाकिस्तान मुसलमानों के लिए नहीं, बल्कि इस्लामी निज़ाम (व्यवस्था) के लिए बना है और कोई क़ानून ऐसा नहीं बनाया जाएगा जो इस्लाम से टकराता हो. इसके बदले फ़ौजी और अफ़सरशाही व्यवस्था ने जमाते-इस्लामी को 1953 में प्रधानमंत्री ख़्वाजा नाज़िमुद्दीन को बरख़ास्त करवाने के लिए अहमदियों के विरुद्ध लाहौर आंदोलन के लिए इस्तेमाल किया. लाहौर में मार्शल लॉ लगाया गया और उसके बाद नाज़िमुद्दीन की सरकार को जनरल ग़ुलाम मोहम्मद ने बर्ख़ास्त कर दिया. अय्यूब ख़ान ने जब सत्ता संभाली तो उन्होंने धार्मिक पार्टियों समेत सभी राजनीतिक पार्टियों पर पाबंदी लगा दी और 1962 के संविधान के तहत 'इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ पाकिस्तान' की जगह देश का नाम 'डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ़ पाकिस्तान' रखा. इसलिए अय्यूब ख़ान के ख़िलाफ़ जब 1968 में आंदोलन चला तो जहाँ उसमें भुट्टो, वली ख़ान और शेख़ मुजीबुर्रहमान की पार्टियाँ शामिल थीं वहीं उनमें धार्मिक पार्टियों ने भी भाग लिया. अय्यूब ख़ान के बाद जब यहया ख़ान आए तो उनकी सरकार ने धार्मिक पार्टियों को पश्चिमी पाकिस्तान में भुट्टो के समाजवादी नारे और पूर्वी पाकिस्तान में मुजीबुर्रहमान के बंगाली राष्ट्रवाद के तोड़ के लिए काफ़ी रास्ता दिया. जमाते इस्लामी की बुरी हार इसका अंदाज़ा इससे लगाया जा सकता है कि 1970 के चुनाव में अवामी लीग के बाद जिस पार्टी ने सबसे ज़्यादा उम्मीदवार खड़े किए वह पीपुल्स पार्टी नहीं बल्कि जमाते-इस्लामी थी जिसने 300 में से 155 सीटों पर चुनाव लड़ा जबकि पीपुल्स पार्टी ने 120 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए. इसके बावजूद पीपुल्स पार्टी को 81 और जमाते-इस्लामी को सिर्फ़ चार सीटें मिलीं. लेकिन मुजीबुर्रहमान को 300 में 160 सीटें जीतने के बाद सत्ता नहीं सौंपी गई और बंगलादेश की आज़ादी का आंदोलन शुरू हो गया. व्यवस्था ने बंगाली राष्ट्रवाद को दबाने के लिए फ़ौजी ऑप्रेशन के साथ-साथ जमाते-इस्लामी की दो नागरिक सेनाओं अलबद्र और अश्शम्स को भी इस्तेमाल किया. लेकिन इसके बावजूद पाकिस्तान का विभाजन हो गया. नए पाकिस्तान में जब भुट्टो की समाजवादी सरकार सत्ता में आई तो तीन धार्मिक पार्टियों - जमाते-इस्लामी, जमीअते-उलेमाए-इस्लाम और जमीअते-उलेमाए-पाकिस्तान ने 1973 के संविधान पर हस्ताक्षर करने की शर्त रखी. शर्त ये थी कि संविधान में लिखा जाए कि सारे क़ानूनों को 10 साल के अंदर शरीयत के मुताबिक़ बना दिया जाएगा. इस संविधान के तहत देश का नाम एक बार फिर 'इस्लामी जम्हूरिया पाकिस्तान' कर दिया गया.
1974 में धार्मिक पार्टियों ने हौसला कर अहमदी समुदाय के ख़िलाफ़ शहरों में आंदोलन किया और भुट्टो सरकार ने इस आंदोलन से निपटने के बजाए अहमदियों को अल्पसंख्यक घोषित करके धार्मिक पार्टियों के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए और जगह दे दी. धार्मिक पार्टियों का इस्तेमाल जब 1977 के चुनाव की घोषणा हुई तो भुट्टो विरोधी नौ पार्टियों ने पाकिस्तान क़ौमी इत्तेहाद के नाम से चुनावी गठबंधन बना लिया जिसमें पाँच धार्मिक पार्टियाँ शामिल थीं. उन्होंने चुनाव में धांधली के ख़िलाफ़ आंदोलन को इस्लामी निज़ाम लागू करने के हक़ में मोड़ दिया. ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने धार्मिक पार्टियों को ख़ुश करने के लिए शराब बेचने पर भी पाबंदी लगा दी और रविवार की जगह जुमे की छुट्टी कर दी. लेकिन कोई भी फ़ायदा नहीं हुआ. लाभ फ़ौज ने उठाया और भुट्टो सरकार को बरख़ास्त कर दिया. ज़िया-उल-हक़ ने पीएनए में शामिल धार्मिक पार्टियों का समर्थन पाने के लिए उन्हें मार्शल लॉ सरकार में मंत्री पद दिए, मगर भुट्टो की फांसी के बाद ये मंत्रालय वापस ले लिए गए. साठ साल में पहली बार 50 के पार लेकिन उस वक़्त तक अफ़ग़ानिस्तान में सोवियत फ़ौज के ख़िलाफ़ जिहाद के लिए अमरीका, सऊदी अरब और ज़िया सरकार को धार्मिक पार्टियों की ज़रूरत पड़ी ताकि मदरसों से जिहाद के लिए छात्रों को भर्ती किया जा सके. उसके बाद से ये धार्मिक पार्टियाँ जिहादी भर्ती एजेंट में तबदील हो गईं और उनका महत्व भी बढ़ता चला गया. ख़ुफ़िया एजेंसियों ने इन पार्टियों को और उन ख़ुफ़िया पार्टियों ने एजेंसियों को अपने मक़्सद के लिए इस्तेमाल किया और ये 'पार्टनरशिप' आज तक जारी है. इस दौरान कुछ लोग और गुट व्यवस्था के हाथों से निकल गए जिन्हें आज दुनिया तालेबान, सिपाहे-सहाबा और जैश मोहम्मद जैसे नामों से जानती है. वर्ष 2002 के चुनाव में धार्मिक पार्टियों के गठबंधन मुत्तहेदा मज्लिसे अमल ने 60 बरस में पहली बार 50 का आंकड़ा पार किया और नेशनल असेंबली की 59 सीटें जात लीं. सूबा सरहद की असेंबली में भी अमरीका विरोधी लहर के कारण मुत्तहेदा मज्लिसे अमल ने बहुमत हासिल कर लिया और सरकार बना ली. उसके अलावा बलूचिस्तान की साझा सरकार में एमएमए शामिल हो गई. कई लोग समझते हैं कि मुशर्रफ़ सरकार ने जान-बूझ कर धार्मिक पार्टियों को सफल होने का मौक़ा दिया ताकि अमरीका और पश्चिमी देशों के सामना ये साबित किया जा सके कि 'अगर मैं न रहा तो पाकिस्तान भी तालेबान बन सकता है.' मज़े की बात ये है कि केंद्र में एमएमए ने जिस पार्टी की सरकार के ख़िलाफ़ विपक्ष का किरदार निभाया है उसी पार्टी के साथ वह बलूचिस्तान की सरकार में शामिल भी रही यानी मुस्लिम लीग (क्यू) के साथ. एमएमए मुशर्रफ़ को अमरीकी पिठ्ठू भी कहती रही और संविधान में 17वें संशोधन के ज़रिए मुशर्रफ़ सरकार के सारे असैंविधानिक क़दम को भी संविधान का हिस्सा बनाने में मदद दी. जब पिछले साल परवेज़ मुशर्रफ़ ने वर्दी में राष्ट्रपति का चुनाव लड़ा तो एमएमए ने असेंबलियों से इस्तिफ़ा देने की जगह वोटिंग से अलग रह कर मुशर्रफ़ के कामयाब होने में मुख्य भूमिका निभाई. 18 फ़रवरी के चुनाव में एमएमए की कुछ पार्टियों ने जमाते-इस्लामी समेत चुनाव को बहिष्कार कर रखा है जबकि मौलाना फ़ज़लुर्रहमान की जमीअते-उलेमाए-इस्लाम चुनाव में भाग ले रही है. अनुमान यह है कि इस चुनाव में उन पार्टियों के साथ वही होगा जो 2002 के चुनाव से पहले होता था, यानी उन्हें ज़्यादा जनसमर्थन मिलने की संभावना नहीं है. लेकिन ये व्यवस्था और धार्मिक पार्टियां बहुत अच्छी तरह जानती हैं कि उनके संबंध पाकिस्तान में लोकतंत्र या तानाशाही से जुड़े हुए नहीं हैं. इसलिए चुनाव में सफलता या विफलता कोई ख़ास महत्व नहीं रखती है. |
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