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पाकिस्तान चुनावः कुछ अहम सवालों के जवाब
पाकिस्तान की राष्ट्रीय असेंबली
चार प्रांत और आठ क़बायली जिलों के करीब आठ करोड़ लोग इन चुनावों में हिस्सा ले सकेंगे
पाकिस्तान में 18 फ़रवरी को होने वाले आम चुनाव में देश की संसद के निचले सदन राष्ट्रीय असेंबली और प्रांतीय असेंबलियों के लिए मतदान हो रहा है.

पाकिस्तान के चार प्रांतों और आठ क़बायली जिलों के क़रीब आठ करोड़ लोग इन चुनावों में मतदान ले सकते हैं.

चुनाव से जुड़े कुछ अहम मसलों पर मुद्दों पर सवाल-जवाब...

ये चुनाव इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं?

पर्यवेक्षकों का कहना है कि ये चुनाव राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के भविष्य के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं क्योंकि अपने ऊपर महाभियोग को रोकने के लिए उन्हें संसद में अपने समर्थकों के मज़बूत बहुमत की ज़रूरत होगी.

टीकाकार मानते हैं कि परमाणु शक्ति संपन्न पाकिस्तान में इस्लामी चरमपंथ अंतरराष्ट्रीय शांति के लिए ख़तरा है और परमाणु हथियारों को ग़लत हाथों से बचाने और चरमपंथियों से मुक़ाबला की रणनीति तय करने में भी संसद की अहम भूमिका होगी.

कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भविष्य की दिक्कतों को टालने के लिए ये चुनाव सबसे बेहतर उपाय साबित हो सकते हैं.

उन्हें भरोसा है कि स्वच्छ चुनाव और आसानी से सत्ता का हस्तांतरण अंदर से बिखरे हुए देश को एकजुट रखने में मदद करेगा और इससे चरमपंथियों को मुख्यधारा से अलग करने में भी सहायता मिलेगी.

देश में क्या माहौल है?

चुनाव में हिस्सा ले रही प्रमुख पार्टियाँ..
बेनज़ीर भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी)
नवाज़ शरीफ़ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज़ (पीएमएल-एन)
सत्तारूढ़ पाकिस्तान मुस्लिम लीग क़ायद-ए-आज़म (पीएमएल-क्यू)
मौलाना फ़ज़लुर रहमान की जमायत उलेमा-ई-इस्लाम (जेयूआई-एफ़)
कराची आधारित मुत्ताहिदा क़ौमी मूवमेंट (एमक्यूएम)
पश्चिमोत्तरी सीमांत प्रांत के पख़्तूनों का संगठन अवामी नेशनल पार्टी

चुनावी तैयारियों के दौरान कई तरह के विवाद सामने आए हैं. इसमें सुप्रीम कोर्ट के आधे से ज़्यादा न्यायाधीशों की राष्ट्रपति मुशर्रफ के हाथों बर्ख़ास्तगी सबसे अहम है.

विश्लेषकों का कहना है कि मुशर्रफ़ ने दोबारा अपने चुनाव को पक्का करने के लिए ऐसा किया.

चुनावी प्रक्रिया को गहरा झटका तब लगा जब 27 दिसंबर को रावलपिंडी में गोलियों और बमों के हमले में पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो की मौत हो गई.

इसके बाद भड़की हिंसा का हवाला देते हुए सरकार ने पहले से निर्धारित आठ जनवरी के चुनावों को स्थगित कर दिया. चुनाव के क़रीब आते ही
एक तरफ़ लोकतंत्र और एकजुटता के समर्थक हैं तो दूसरी तरफ़ हिंसा और झगड़ों में शामिल लोग हैं.

देश का पश्चिमोत्तर इलाक़ा इस्लामी चरमपंथियों के प्रभाव में जाता दिख रहा है.

भूमि और संसाधन के लिहाज़ से सबसे बड़े प्रांत बलूचिस्तान के राष्ट्रवादी विद्रोहियों से शांति को एक अन्य ख़तरा है.

देश में तनाव का महौल है. उम्मीदवारों की कड़ी सुरक्षा के बीच कुछ ही बड़ी रैलियाँ हो सकी हैं जिसके कारण आम लोगों में भी चुनाव को लेकर उत्सुकता बढ़ गई है.

कौन हिस्सा ले रहा है, कौन बहिष्कार कर रहा है?

बलूचिस्तान के राष्ट्रवादी गुटों को छोड़कर ठोस जनाधार वाले सभी राजनीतिक दल चुनावों में हिस्सा ले रहे हैं.

चुनाव में हिस्सा ले रही पार्टियों में मुख्य हैं -

बेनज़ीर भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी)
नवाज़ शरीफ़ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग नवाज़ (पीएमएल-एन)
सत्तारूढ़ पाकिस्तान मुस्लिम लीग क़ायद-ए-आज़म (पीएमएल-क्यू)
मौलाना फ़ज़लुर रहमान की जमायत उलेमा-ई-इस्लाम (जेयूआई-एफ़)
कराची आधारित मुत्ताहिदा क़ौमी मूवमेंट (एमक्यूएम)
पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत के पख़्तूनों का संगठन अवामी नेशनल पार्टी

देश की कई विपक्षी पार्टियों के गठबंधन ऑल पार्टी डेमोक्रेटिक अलायंस ने इन चुनावों का बहिष्कार करने का फ़ैसला किया है.

कौन राष्ट्रपति मुशर्रफ़ के साथ है और कौन ख़िलाफ़?

परवेज़ मुशर्रफ़, पाकिस्तानी राष्ट्रपति
मुशर्रफ़ के समर्थकों के पास संसद का बहुमत न हुआ तो उन पर महाभियोग का ख़तरा है

राष्ट्रपति मुशर्रफ़ की सहयोगी पार्टियों में पीएमएल (क्यू) और एमक्यूएम प्रमुख हैं.

पीएमएल (एन) मुशर्रफ़ की मुखर विरोधी है. मुशर्रफ़ ने अक्तूबर, 1999 में इसकी सरकार का तख़्तापलट कर दिया था.

पीपीपी भी मुशर्रफ़ सरकार की आलोचक रही है और उसका आरोप है कि सरकार चरमपंथ पर नियंत्रण पाने में विफल रही है.

लेकिन पीपीपी इस बात की वकालत करती है कि राष्ट्रपति मुशर्रफ़ को तुरंत हटाने के बदले चरणबद्ध तरीक़े से राजनीतिक पदों से सेना के लोगों को हटाया जाए.

पीपीपी का कहना है कि अगर चुनाव स्वच्छ और निष्पक्ष तरीक़े से कराए जाते हैं तो वह अब भी मुशर्रफ़ के साथ सहयोग के लिए तैयार है.

मुशर्रफ़ और सेनाध्यक्ष के मुक़ाबले प्रधानमंत्री कितने ताक़तवर होंगे?

राष्ट्रपति मुशर्रफ़ ने संविधान में जो संशोधन किए उनसे देश की ज़्यादातर पार्टियाँ उनके ख़िलाफ़ हैं.

इनके ज़रिए उन्हें सरकारों और असेंबलियों को बर्ख़ास्त करने का विशेषाधिकार हासिल है. उनके पास सेना और प्रशासन के अध्यक्षों को बर्ख़ास्त करने और नियुक्त करने का आधिकार भी है.

हालाँकि पाकिस्तान एक लोकतांत्रिक देश है जिसमें राष्ट्रपति का अप्रत्यक्ष चुनाव संसद से होता है लेकिन कुछ लोगों की आशंका है कि अगर सरकार ने सेना के साथ छेड़छाड़ की तो मुशर्रफ़ सरकार के ख़िलाफ़ कार्रवाई कर सकते हैं.

1988-97 के बीच इसी तरह के अधिकारों से लैस और सेना का समर्थन रखने वाले राष्ट्रपतियों ने वहाँ की चार-चार निर्वाचित सरकारों को बर्ख़ास्त कर दिया.

क्या चुनाव प्रचार स्वतंत्र और निष्पक्ष हैं?

पाकिस्तानी चुनाव प्रचार के पोस्टर
राजनीतिक नेताओं ने सुरक्षा कारणों से ज़्यादा रैलियाँ या सभाएँ नहीं की हैं

सुरक्षा कारणों से ज़्यादातर राजनीतिक नेता घरों में बैठे हैं. इसके कारण रैलियों और सभाओं की संभावनाएँ न्यूनतम हो गई हैं.

देश में चुनाव होने वाला है इसका इशारा सड़कों पर लगे होर्डिंग और पोस्टर-बैनरों से ही मिल पाता है.

बेनज़ीर हत्याकांड के बाद भड़की हिंसा के मामलों को लेकर सिंध और पंजाब प्रांत में पुलिस विपक्षी पार्टियों के कार्यकर्ताओं की तलाशी कर रही है.

इस बीच देश के चुनाव आयोग पर पिछले साल जारी अपने दिशा-निर्देशों के पालन में रियायत देने के आरोप लग रहे हैं. उदाहरण ये है कि शहरों में जो होर्डिंग नज़र आ रहे हैं, वे चुनाव आयोग से मंज़ूर आकार से बड़े हैं.

ज़िला प्रशासनों के द्वारा भी चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप की शिकायतें हैं.

चुनावों की निगरानी कौन करेगा?

पाकिस्तान के चुनावों में दुनिया के कई देशों की दिलचस्पी है. इनमें से कई देशों और संस्थाओं का मानना है कि मतदान की प्रक्रिया पर नज़र रखी जाए.

देश में पर्यवेक्षकों के कई दल पहुँच चुके हैं. इनमें यूरोपीय संघ के पर्यवेक्षकों की टीम भी है.

कई ग़ैर-सरकारी संगठन चुनाव के पहले के हालात की निगरानी कर रहे हैं.

इनमें कई ग़ैर-सरकारी संगठनों का संबंध यूरोप या अमरीका से है जहाँ से उन्हें आर्थिक मदद मिलती है.

क्या सेना तटस्थ है?

जनरल अशफ़ाक परवेज़ क़यानी
सेना खुलकर किसी पार्टी के साथ नहीं है लेकिन उसके ज़्यादातर लोग मुशर्रफ़ को पसंद करते हैं

जनरल अशफ़ाक परवेज़ क़यानी के नेतृत्व में सेना अपनी पुरानी छवि बहाल करने की कोशिश करती दिख रही है.

सेना प्रमुख रहते राजनीति में मुशर्रफ़ के विवादास्पद क़दमों की आँच सेना की साख पर भी पड़ी थी.

नागरिक प्रशासन, व्यापार, उद्योग और बैंकिंग में सेना के लोगों के होने के कारण उसकी आलोचना होती रही है.

क़यानी ने देश के सामान्य मामलों में सेना का हस्तक्षेप घटाने का इशारा करते हुए पिछले महीने कहा था कि वे नागरिक प्रशासन के पदों पर बैठे सेना के अधिकारियों को वापस करेंगे.

वैसे इस समय सेना किसी भी राजनीतिक दल को खुलकर समर्थन देना नहीं चाहेंगी.

लेकिन पर्दे के पीछे से सेना का बड़ा तबका मुशर्रफ़ को पसंद करता है. सेना के इस हिस्से को लगता है कि मुशर्रफ़ देश को स्थिर रख पा रहे हैं.

इस्लामी पार्टियाँ कितनी ताक़तवर हैं?

धार्मिक दलों के लिए चुनावी माहौल 2002 के चुनावों से बिल्कुल अलग है.

उस समय छह धार्मिक दलों के प्रतिनिधियों ने मिलकर एक गठबंधन मुत्तहिदा मजलिसे अमल (एमएमए) बनाया था.

यह गठबंधन अफ़गानिस्तान पर अमरीकी हमले के समय के दौरान बना था और उस समय देश में अमरीका विरोधी लहर चरम पर थी.

देश की दो प्रमुख पार्टियों पीपीपी और पीएमएल (एन) में प्रभावशाली नेताओं की कमी थी क्योंकि बेनज़ीर और नवाज़ दोनों ही देश से बाहर थे.

इस बार दोनों पार्टियाँ चुनाव मैदान में हैं.

पीएमएल (एन) के चुनाव प्रचार की कमान नवाज़ शरीफ़ ने सँभाल रखी है तो पीपीपी को बेनज़ीर की हत्या से उपजे सहानुभूति वोटों का भरोसा है.

जहाँ तक एमएमए का सवाल है व्यवहारिक तौर पर अब वह ख़त्म हो चुका है.

धार्मिक दलों के इस गठबंधन के कुछ घटक चुनावों में हिस्सा ले रहे हैं तो कुछ ने इसका बहिष्कार कर रखा है.

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