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शनिवार, 16 फ़रवरी, 2008 को 16:10 GMT तक के समाचार
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पाकिस्तान में चुनावी धांधली का इतिहास

पाकिस्तान सुरक्षाकर्मी
पाकिस्तान में चुनाव के दौरान धांधली का इल्ज़ाम हमेशा से लगाया जाता रहा है
पाकिस्तान में चुनावी धांधली तब से हो रही है जब से देश में संसदीय चुनाव हो रहे हैं. 1970 में हुए पहले आम चुनाव से लेकर 2002 तक कोई चुनाव ऐसा नहीं हुआ जिस पर जनता की राय को बिल्कुल रद्द करने या उसमें फेरबदल करने का इल्ज़ाम न लगाया गया हो.

पाकिस्तान में चुनावी धांधली मतदान के दिन से काफ़ी पहले शुरू हो जाती है. इस का तरीक़ा यह है कि कार्यवाहक सरकार में पक्षपात करने वाले लोगों को जगह दी जाए, चुनाव आयोग और उच्च न्यायालायों में अपनी मर्ज़ी के न्यायधीश बहाल किए जाएं, चुनावी कर्मचारियों में किसी ख़ास पार्टी के समर्थक भर्ती किए जाएँ, मीडिया पर पाबंदी हो, सरकारी मशीनरी, पदों और धन का किसी एक गुट के समर्थन या दूसरे के विरुद्ध इस्तेमाल किया जाए.

1970 और 1977 तक चुनाव में जब सरकारी अधिकारी अभी धांधली करने का तरीक़ा सीख ही रहे थे तब चुनाव से पहले वाली प्रक्रिया पर ज़्यादा ज़ोर नहीं था और परिणाम को बदलने के लिए चुनाव के दौरान जाली वोट और बाद में ज़ोर ज़बर्दस्ती से काम लिया जाता रहा. फिर भी 1985 से लेकर 2008 की चुनावी मुहिम तक चुनाव से पहले की धांधली का ग्राफ़ लगातार बढ़ता रहा है.

इस हवाले से जनरल मुशर्रफ़ की निगरानी में करवाए गए 2002 के चुनाव को टीकाकार सबसे ज़्यादा अन्यायपूर्ण मानते हैं. गैलप पाकिस्तान के अध्यक्ष और चुनावी प्रक्रिया पर शोध करने वाले डॉक्टर ऐजाज़ शफ़ी गीलानी बताते हैं कि 2002 के चुनाव में चुनाव से पहले की जाने वाली धांधली का रूप अलग था.

चुनाव को साफ़ सुथरा बनाने के सरकारी दावे में हक़ीक़त का रंग भरने के लिए चुनाव आयोग ने जो आदेश जारी किए उनमें सरकारी संपत्ति को चुनावी प्रक्रिया में इस्तेमाल करने की मनाही और चुनावी प्रक्रिया के पूरा होने तक सरकारी अफ़सरों के तबादले पर पाबंदियाँ शामिल हैं. लेकिन इन आदेशों पर कार्रवाई तो क्या होती जब उनका उल्लंघन करने के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज की गई तो भी चुनाव आयोग उल्लंघन करने वालों के ख़िलाफ़ कोई क़दम उठाने में असमर्थ रहा.

धांधली की आशंका

मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वाच ने अपने ताज़ा ब्यान में पाकिस्तानी चुनाव आयोग को पक्षपात करने वाला क़रार दिया है और आशंका जताई है कि आयोग चुनाव साफ़-सुथरे ढंग से कराने की क्षमता नहीं रखता है.

विपक्ष के उम्मीदवारों की ओर से ढ़ेड़ हज़ार से अधिक शिकायतें निर्वाचन आयोग तक पहुँचाइ गई हैं. उनमें कार्यवाहक सरकार की ओर से मुस्लिम लीग (क़ाफ़) के उम्मीदवारों की मदद और विपक्ष के उम्मीदवारों का विरोध शामिल हैं. लेकिन चुनाव आयोग ने उनकी शिकायतों को दूर करने के लिए कोई विशेष क़दम नहीं उठाया है जिससे आयोग की निष्पक्षता पर सवालिया निशान लग गया है.

ह्यूमन राइट्स वाच ने तो सिर्फ़ प्रश्न ही उठाया है, कुछ विदेशी चुनावी टीकाकारों ने तो यह कहते हुए चुनाव का निरीक्षण करने से ही मना कर दिया कि धांधली तो हो भी चुकी, हम आकर क्या करेंगे? इनमें अमरीकी संगठन आईआरआई, एनडीआई, और कार्टर सेंटर शामिल हैं.

अमरीका की ही एक सांसद और विदेशी ऑपरेशन की उप कमेटी की अध्यक्ष नीता लूई ने अपनी सरकार से मांग की है कि वह 18 फ़रवरी के चुनाव की निगरानी के लिए ठोस क़दम उठाए क्योंकि उन्हें जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ की सरकार से जनतांत्रिक मूल्यों का पालन करने की आशा कम ही है.

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