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भुट्टो परिवार - एक अभिशप्त विरासत | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
भारत-पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में भुट्टो परिवार का नाम आता है तो आम तौर पर पहले ज़िक्र होता है ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो का,जो पाकिस्तान के दसवें प्रधानमंत्री और बेनज़ीर भुट्टो के पिता थे. मगर ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो के पिता – सर शाहनवाज़ भुट्टो - का नाम भी भारत-पाकिस्तान के इतिहास का एक अहम नाम है. सिंध प्रांत में स्थित लरकाना के ज़मींदार और दमदार राजनेता शाह नवाज़ ने इंग्लैंड में पढ़ाई की और वो जूनागढ़ के नवाब के दीवान बन गए. वहाँ उन्होंने अपने नाम के आगे भुट्टो लगाना शुरू किया. भुट्टो - ये उपाधिनाम उन्होंने अपने पिता ख़ुदा बख़्श के पुश्तैनी क़स्बे भट्टो कलाँ के नाम से लिया था. अब ये सबको पता है कि भारत-पाकिस्तान के बँटवारे के समय जूनागढ़, कश्मीर और हैदराबाद के अलावा तीसरी ऐसी रियासत थी जिसके विलय को लेकर अड़चन आई थी. और ये हुआ था इसलिए क्योंकि सर शाहनवाज़ भुट्टो ने जूनागढ़ के दीवान के तौर पर रियासत को पाकिस्तान में रखने की कोशिश की. लेकिन सरदार वल्लभ भाई पटेल ने ऐसा नहीं होने दिया. जूनागढ़ भारत में रहा. वो अब गुजरात में है. ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो
फिर बँटवारा हो गया. शाहनवाज़ भुट्टो लरकाना चले गए और उनके तीसरे बेटे ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो अमरीका. उन्होंने सदर्न कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय से राजनीतिशास्त्र की पढ़ाई की. इसके बाद उन्होंने ब्रिटेन के ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय से लॉ की भी डिग्री ली. पढ़ाई के बाद उन्होंने दूसरी शादी की बेगम नुसरत इस्पहानी से, जो कराची में बस चुके एक रईस कुर्द ईरानी परिवार की बेटी थीं. नुसरत और ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो की चार संतानें हुईं – सबसे बड़ी बेटी बेनज़ीर, फिर बेटा मुर्तज़ा, फिर दूसरी बेटी सनम और सबसे छोटा बेटा शाहनवाज़. भुट्टो की राजनीति ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने पहले कॉलेज में पढ़ाया, फिर वक़ालत की और इसके बाद राजनीति में गए. वे राष्ट्रपति मोहम्मद अयूब ख़ान की सरकार में मंत्री रहे, लेकिन 1967 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए ताशकंद समझौते को लेकर उनके अयूब ख़ान से मतभेद हुए और जिसके बाद अयूब ख़ान से नाता तोड़कर भुट्टो ने अपनी पार्टी बनाई – पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी. 1971 में चुनाव हुआ, उनकी पार्टी बुरी तरह हारी, अवामी लीग को जीत मिली. लेकिन इस्लामाबाद के भुट्टो को ये मंज़ूर नहीं था कि सत्ता ढाका के शेख़ मुजीबुर्रहमान के पास जाए. बात इतनी बढ़ी कि पाकिस्तान टूट गया, बांग्लादेश का जन्म हुआ. बदले हुए पाकिस्तान में 1973 में फिर चुनाव हुआ और इस बार भारी मतों से जीतकर भुट्टो प्रधानमंत्री बन गए. 1977 में तख़्तापलट हुआ, जेनरल ज़िया उल हक़ ने सत्ता सँभाली और दो साल बाद ज़ुल्फ़िक़ार अली भुट्टो को फाँसी पर चढ़ा दिया गया. विरासत
भुट्टो की राजनीतिक विरासत मिली बेनज़ीर भुट्टो को. उनसे पहले ये उम्मीद उनके भाई मुर्तज़ा भुट्टो से की जा रही थी लेकिन पिता को फाँसी मिलने के बाद मुर्तज़ा अफ़ग़ानिस्तान भाग गए जहाँ तब कम्युनिस्ट शासन था. मुर्तज़ा भुट्टो ने अफ़ग़ानिस्तान और मध्य पूर्व के कई और देशों में रहकर अल ज़ुल्फ़िक़ार नाम का एक चरमपंथी संगठन बनाया और पाकिस्तान की सैनिक सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया. 1993 में उन्होंने निर्वासन से ही प्रांतीय चुनाव लड़ा जिसमें जीतने के बाद वो देश लौटे. मगर 1996 में कराची में संदिग्ध परिस्थितियों में सुरक्षाबलों के साथ एक मुठभेड़ हुई, जिसमें मुर्तज़ा को गोलियों से भून दिया गया. उस वक़्त पाकिस्तान में सरकार उनकी दीदी बेनज़ीर भुट्टो की थी, जिनसे उनके मतभेद थे. सवाल
मुर्तज़ा की मौत से पहले भुट्टो परिवार के सबसे छोटे बेटे शाहनवाज़ भुट्टो ने भी राजनीति में क़दम रखा था, लेकिन 1985 में फ्रांस में अपने फ़्लैट पर वो भी संदिग्ध परिस्थिति में मृत पाए गए. बेनज़ीर भुट्टो के बाद चार भाई बहनों में केवल सनम भुट्टो बची हैं, लेकिन उनका राजनीति से कोई वास्ता नहीं है. वे लंदन में रहती हैं. बेनज़ीर की माँ नुसरत भुट्टो भी राजनीति में रही हैं, लेकिन अभी वो बेहद बीमार हैं. वे दुबई में रहती हैं. भुट्टो परिवार में ये उपाधि रखनेवाले और भी नाम हैं. जैसे मुर्तज़ा भुट्टो की पत्नी घिन्वा भुट्टो, मुर्तज़ा की पहली पत्नी की बेटी फ़ातिमा भुट्टो और बेटा ज़ुल्फ़िक़ार भुट्टो जूनियर. इसके अलावा बेनज़ीर भुट्टो की संतानें - बेटा बिलावल और दो बेटियाँ, बख़्तावर और आसिफ़ा भी हैं. लेकिन इनमें परिवार का अगला राजनीतिक वारिस कौन होगा - ये सवाल पेचीदा है. सबसे पहले तो ये कहना मुश्किल है कि नई पीढ़ी के भुट्टो में से कोई राजनीति में क़दम रखता भी है या नहीं. और दूसरी बात ये भी है कि मुर्तज़ा भुट्टो और बेनज़ीर के बीच के मतभेद ने ख़ुद भुट्टो परिवार में भी दरार पैदा कर दी है. |
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