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शुक्रवार, 28 दिसंबर, 2007 को 08:25 GMT तक के समाचार
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भुट्टो के बाद पाकिस्तान का भविष्य

विरोध करती जनता(फ़ाइल फ़ोटो)
पाकिस्तान में मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन ज़ोर पकड़ रहें है.
पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो की हत्या ने पाकिस्तान के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगा दिए हैं. लोगों के सामने सबसे बड़ा सवाल अगले महीने होने वाले आम चुनाव को लेकर है.

विपक्ष की नेता की हत्या के बाद जनवरी में होने वाले चुनाव क्या अपनी तय तारीख़ को ही होंगे?

बेनज़ीर की हत्या से राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के काम करने के तरीक़े पर भी उंगलियां उठ रही हैं. इस बात को लेकर संशय बना हुआ है कि क्या मुशर्रफ़ पाकिस्तान को इन मुश्किलों से निकाल पाएंगे.

बेनज़ीर की हत्या के बाद पाकिस्तान के कई शहरों में भड़के दंगों के बाद हालात और ख़राब हो गए हैं. बेनज़ीर के समर्थकों और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के कार्यकर्ताओं ने सरकार के ख़िलाफ़ हमले शुरू कर दिए हैं.

इस हिंसा और विरोध प्रदर्शनों से मुशर्रफ़ विरोधियों को ही बल मिलेगा. वैसे भी वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल रखा है. इनका मानना है कि मुशर्रफ के हटने के बाद ही पाकिस्तान में लोकतंत्र की बहाली हो सकेगी.

विकल्प

बेनज़ीर की हत्या के बाद राष्ट्रपति मुशर्रफ़ पूरी तरह से अलग-थलग नज़र आ रहे हैं.

मुशर्रफ के सामने एक विकल्प ये है कि वो आठ जनवरी को चुनाव कराएं और एक लोकतांत्रिक सरकार को सत्ता सौंप दें.

फ़िलहाल, मुशर्रफ़ की सबसे बड़ी मुश्किल पाकिस्तान के अलग-अलग शहरों में फैली हिंसा है. जितनी ये आग फैलेगी मुशर्रफ की मुश्किलें उतनी ही बढ़ती जाएंगी.

वैसे भी रावलपिंडी में बेनज़ीर भुट्टो और नवाज़ शरीफ़ पर एक ही दिन हुए हमलों का जवाब मुशर्रफ़ नहीं दे पा रहे हैं. ख़ास बात ये है कि ये दोनों हमले उस शहर में हुए हैं जहां पाकिस्तानी सेना का मुख्यालय है.

सुरक्षा के लिहाज़ से जिसे बेहद सुरक्षित माना जाता है.

इस हत्या ने राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ की साख पर भी बट्टा लगाया है. आम चुनाव से ठीक पहले देश की सबसे बड़ी पार्टी के मुखिया की हत्या ने पाकिस्तान की राजनीति में शून्यता की स्थिति पैदा कर दी है.

मुशर्रफ़ के सामने वक़्त पर चुनाव कराने के अलावा एक विकल्प ये भी है कि वो दोबारा देश में इमरजेंसी लगा दें. लेकिन ऐसा करने पर उनके विरोधियों के सुर ही मुखर होंगे.

फिर सवाल ये भी है कि अगर मुशर्रफ़ दोबारा इमरजेंसी लगातें है तो इस फ़ैसले में उन्हें पाकिस्तान सेना का किस हद तक साथ मिलेगा.

मुश्किलें बढ़ीं

बहरहाल, मुशर्रफ़ के लिए आने वाले दिन काफी मुश्किलों भरे हो सकते हैं.

चरमपंथी खुद मुशर्रफ़ पर हमले कर चुके हैं जिसमें वो बाल-बाल बचे थे. मुशर्रफ़ पर चरमपंथियों को बढ़ावा देने के आरोप भी लगते रहे हैं.

माना ये भी जाता है कि मुशर्रफ़ प्रशासन के ही कुछ अधिकारी चरमपंथियों को सहयोग देते रहे हैं.

बेनज़ीर की हत्या और नवाज़ शरीफ़ के काफ़िले पर हमले के बाद बहस का मुद्दा ये है कि क्या राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ शासन करने के हक़दार हैं और क्या पाकिस्तान में राजनीतिक गतिविधियों को आगे बढ़ाने में सेना पूरी तरह सक्षम है.

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