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अब क्या करेंगे परवेज़ मुशर्रफ़! | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
जब साल 2007 शुरू हुआ तो पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ का एक ही उद्देश्य था, ख़ुद को अगले पाँच सालों के लिए फिर से राष्ट्रपति के रूप में स्थापित करवाना. साल के ख़त्म होने के साथ उन्होंने अपना लक्ष्य हासिल कर लिया लेकिन इस प्रक्रिया के दौरान उन्हें कुछ गंभीर झटके भी लगे जो उनकी योजनाओं में नहीं थे. परवेज़ मुशर्रफ़ को अपने दो कड़े राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों बेनज़ीर भुट्टो और नवाज़ शरीफ़ को देश में होने वाले आम चुनाव में हिस्सा लेने के लिए आने देना पड़ा. उन्हें देश की लोकाधिकारवादी न्यायपालिका को कुचलने के लिए देश के प्रमुख न्यायाधीशों में से आधों को या तो हटाना पड़ा या गिरफ़्तार करना पड़ा. मजबूरी सबसे ज़्यादा बुरा यह हुआ कि देश और देश के बाहर ज़ोर पकड़ रही आलोचनाओं को झेलते हुए उन्हें अपने सेना प्रमुख के शक्तिशाली पद से हटना पड़ा. संविधान में जोड़तोड़ करके जनरल मुशर्रफ़ अपने लिए अपनी पुराने प्रकार की शक्तियाँ बनाए रखने में कामयाब हो गए जिन्हें पाकिस्तान के कुछ ही असैनिक राष्ट्रपति भोग पाते हैं.
मुशर्रफ़ चुनी गई सरकारों तक को हटा सकते हैं और संसद को भंग कर सकते हैं. वह सेना प्रमुखों को नियुक्त कर सकते हैं और ख़ुद अपनी खोज और पूर्ण शक्ति संपन्न नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के प्रमुख भी होंगे. लेकिन इन सभी विशेष शक्तियों के बावजूद, राष्ट्रपति मुशर्रफ़ को वहाँ के नागरिक व्यवस्था के नियम-क़ायदों की पेचीदगियों से टकराना होगा. यहाँ तक कि वह पाकिस्तान के मानकों के अनुसार भी चलें तो भी सत्ता के अलग-अलग खिलाड़ियों की आपसी टकराहट की वजह से अगले कुछ साल उनके लिए और भी पेचीदा होने वाले हैं. यहाँ हम ऐसे कुछ प्रमुख बिंदुओं के बारे में बता रहे हैं जो पाकिस्तान के भविष्य को आकार देंगे. चुनाव:लड़ा जाए या नहीं परवेज़ मुशर्रफ़ ने इस तथ्य पर जुआ खेला कि पाकिस्तानी लोग चुनाव को पसंद करते हैं और मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियां इस प्रक्रिया का बायकॉट नहीं कर सकतीं. तब भी जब कि वे इसके खरे होने पर सवाल भी उठा रही हों. सत्ता के कुछ खिलाड़ियों जैसे बेनज़ीर भुट्टो की पीपुल्स पार्टी और मौलाना फ़ज़लुर्रहमान की पार्टियाँ पहले ही संकेत दे चुकी हैं कि वे चुनाव ज़रूर लड़ेंगी.
नवाज़ शरीफ़ की मुस्लिम लीग़ और उनके घटक दल कह रहे हैं कि अगर जनरल मुशर्रफ़ ने न्यायपालिका को बहाल नहीं किया तो वे चुनाव का बहिष्कार करेंगे. चुनाव की विश्वसनीयता के लिए जनरल मुशर्रफ़ चाहेंगे कि दो बड़े विरोधी दलों में से कम से कम एक तो चुनाव में हिस्सा ले और वे अपनी नीयत में सफल भी हो गए हैं. पाकिस्तान की राजनीतिक पार्टियों को पहले ही चुनाव का बहिष्कार करने का कड़वा अनुभव है जब उनके बहुत से उम्मीदवारों ने बहिष्कार की अनदेखी कर चुनाव में हिस्सा लिया था और चुन लिए गए थे. जनरल मुशर्रफ़ की सबसे बड़ी उम्मीद विभाजित संसद का गठन है जहाँ वह शक्तियों को तोड़ने का काम कर सकें, लेकिन यदि किसी तरह वह ऐसा करवाने में सफल भी हो जाएँ तो भी वैसी सत्ता नहीं पा सकेंगे जिसे वह पिछले पाँच सालों से भोग रहे हैं. झटके जनरल मुशर्रफ की सरकार की तरह ही विपक्षी दल भी मुशर्रफ़ की मार्च 2007 में मुख्य न्यायधीश इफ़्तिखार चौधरी के प्रति की गई कार्रवाई के विरोध में व्याप्त जनाक्रोश पर आश्चर्यचकित रह गए. वकीलों के नेतृत्व में चलाया गया जनांदोलन मुख्य न्यायधीश के पक्ष में एक छोटी अवधि की जीत साबित हुआ. मुशर्रफ़ ने दोबारा न्यायपालिका के विरुद्ध कार्रवाई के दौरान सभी स्वतंत्र सूचना स्रोतों पर प्रतिबंध लगा दिया और आंदोलनकारी वकील नेताओं को गिरफ़्तार कर लिया. पाकिस्तान के इतिहास में पहली बार पचास से ज़्यादा वरिष्ठ जजों ने देश में आपातकाल के दौरान शपथ ग्रहण से इनकार किया.
फिलहाल पाकिस्तान के राजनीतिक दलों में इस बाबत अलग-अलग राय है कि देश में आगामी चुनाव प्रचार के दौरान न्यायिक प्रक्रिया की पुनर्स्थापना की मांग की जाए या नहीं. बेनज़ीर भुट्टों के चुनावों पर ध्यान केंद्रित करने के साथ ही ऐसा नहीं लगता है कि मुशर्रफ़ बर्खा़स्त न्यायधीशों को बहाल करेंगे लेकिन वकीलों के समुदाय ने नागरिक समाज में अपने सहयोगियों के साथ वापसी के लिए लोगों को एकजुट किया है. अगर उन्हें विरोधी शक्तियों से समर्थन मिलता है तो आंदोलन के दोबारा जागृत होने और मुशर्रफ़ और बेनज़ीर के बीच हुए किसी भी सत्ता समझौते को चुनौती देने की संभावनाएं बढ़ जाएँगी. तालेबान की तेज़ी पाकिस्तान में पिछले चार सालों से स्थानीय तालेबान लड़ाकों की संख्या में तेज़ी से बढ़ोतरी हुई है. अब यह केवल अफ़ग़ान सीमा की समस्या नहीं रही है और न ही केवल पाकिस्तान के जनजातीय इलाकों तक सीमित रह गई है.
सिर्फ़ साल 2007 में तालेबान ने स्वात घाटी के विभिन्न हिस्सों में नागरिक प्रशासन को अपने हाथों में ले लिया और पाकिस्तानी सैनिकों के अपहरण की प्रक्रिया भी जारी रखी. साल 2007 में ही पूरे पाकिस्तान में आत्मघाती विस्फोटकों की लहर भी देखने को मिली. छावनी क्षेत्रों में सैनिकों पर हमले हुए. पाकिस्तान में सत्ता में आनेवाली किसी भी सरकार को देश में इस प्रकार से बढ़ती हिंसा की लहर का सामना करना पड़ेगा. सैन्य भूमिका देश में आतंकवाद के खिलाफ़ ये अंतहीन लड़ाई पाकिस्तान के नवनियुक्त सेना प्रमुख जनरल अशफाक़ कियानी के नेतृत्व में जारी रहेगी. जब तक अमरीका के सैन्य शासन के साथ प्रत्यक्ष संबंध सुविधाजनक रहेंगें तब तक वह भविष्य के किसी भी तरह के राजनीतिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहेगा. हो सकता है कि अपने आप में अपूर्व शक्तियों से लैस राष्ट्रपति मुशर्रफ़ देश में विभाजित विपक्ष के बीच जनवरी में होने वाले आम चुनावों के बाद एक कमज़ोर सरकार बनाएँ. लेकिन वो सरकार लंबे समय तक नहीं चल पाएगी, जब तक कि राष्ट्रपति मुशर्रफ़ अपनी शक्तियों की उन सीमाओं को निर्धारित नहीं करेंगे जो असैनिक शासकों के लिए ज़रूरी मानी जाती हैं. | इससे जुड़ी ख़बरें 'मुशर्रफ़ से बातचीत जारी रखेगा भारत'15 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'आम चुनाव निष्पक्ष तरीके से होंगे'15 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस हमारा इरादा और मज़बूत हुआ है- नवाज़ 03 दिसंबर, 2007 | भारत और पड़ोस बेनज़ीर का चुनाव घोषणा पत्र जारी30 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस अब मुशर्रफ़ असैनिक राष्ट्रपति29 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस मुशर्रफ़ ने सेना की कमान छोड़ी28 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस मुशर्रफ़ वर्दी उतारकर लेंगे शपथ26 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस 'मुल्क़ से तानाशाही ख़त्म करने आया हूँ'25 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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