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बेनज़ीर के जीवन का सफ़र | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान के साथ एक समय पूरी दुनिया में आधुनिकता और लोकतंत्र की प्रतीक बनीं बेनज़ीर भुट्टो का जन्म 1953 में पाकिस्तान के सिंध प्रांत हुआ था. भारत के नेहरु गांधी परिवार की तरह भुट्टो परिवार पाकिस्तान का सबसे मशहूर राजनीतिक परिवार रहा है. बेनज़ीर के पिता ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो सत्तर के दशक में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे. बेनज़ीर अपने पिता की तरह देश की प्रधानमंत्री बनीं और वर्ष 1988-90 और वर्ष 1993-96 में देश की प्रधानमंत्री रहीं. शुरूआती जीवन बेनज़ीर अमरीका के हार्वर्ड और ब्रिटेन के ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालयों में पढ़ीं. बेनज़ीर को अपने पिता के कारण पहचान मिली और वह एक तरह से बेमन से ही राजनीति में चलीं आईं. वो दो बार, 1988 से 1990 और फिर 1993 से 1996 तक पाकिस्तान की प्रधानमंत्री रहीं. दोनों ही बार उन्हें भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण पद से हटाया गया. बेनज़ीर के राजनीतिक करियर में कई उतार चढ़ाव आए. उन्हें कई बार विभिन्न आरोपों का सामना करना पड़ा. लेकिन पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद वो पाकिस्तान ही नहीं दुनिया की सबसे प्रभावशाली महिलाओं में गिनी जाने लगीं थीं. 'ग्लैमर' से भरपूर युवा बेनज़ीर ने पाकिस्तान की पुरुष प्रधान राजनीति में एक नया अध्याय शुरु किया था. लेकिन दूसरी बार जब उन्हें प्रधानमंत्री पद से हटाया गया तब कुछ टीकाकारों के अनुसार उनका नाम भ्रष्टाचार और ख़राब प्रशासन का पूरक बन गया था. बेनज़ीर के पिता ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो का तख़्तापलट जनरल ज़िया उल हक़ ने 1977 में किया था और गिरफ़्तारी के दो साल बाद भुट्टो को फांसी दे दी गई थी. बेनज़ीर के दृढ़ निश्चय की झलक तब मिली जब उनके पिता को फांसी दिए जाने से कुछ समय पहले बेनज़ीर को गिरफ़्तार किया गया और उन्हें पांच साल जेल में बिताने पड़े थे.
चिकित्सा के लिए जेल से बाहर आने-जाने के दौरान उन्होंने लंदन में पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) का गठन किया और जनरल ज़िया के ख़िलाफ़ अभियान शुरु किया था. वो 1986 में पाकिस्तान वापस गई थीं जहाँ लोगों ने उन्हें हाथों हाथ लिया था. 1988 में एक विमान में हुए बम धमाके में ज़िया उल हक की मौत के बाद वो पाकिस्तान में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं. भ्रष्टाचार के आरोप लेकिन अपने राजनीतिक जीवन के अंतिम कुछ वर्षों में वे भ्रष्टाचार के मामलों का सामना कर रही थीं. बेनज़ीर के दोनों ही कार्यकालों के दौरान उनके पति आसिफ़ ज़रदारी विवादों में रहे थे. ज़रदारी की प्रशासन में अहम भूमिका रहती थी. उन पर सरकारी धन में गड़बड़ी के आरोप भी लगे थे. कई लोगों का मानना है कि ज़रदारी को लेकर इस तरह के विवादों के कारण लोगों का विश्वास बेनज़ीर से उठने लगा था. हालांकि ज़रदारी के ख़िलाफ लगे भ्रष्टाचार के 18 से अधिक आरोपों में से एक में भी उन्हें दोषी नहीं ठहराया गया था और न ही बेनज़री के ख़िलाफ़ लगे आरोप साबित हो पाए. दोनों बेनज़ीर और ज़रदारी बार-बार निर्दोष होने की बात कहते रहे थे. ज़रदारी को तो दस साल जेल में बिताने पड़े और बाद में सबूतों के अभाव में ज़रदारी को 2004 में ज़मानत पर रिहा कर दिया गया था. पाकिस्तान सरकार के साथ हुए हाल के समझौते के बाद बेनज़ीर को ऐसे पांचों मामलों में आममाफ़ी दे दी गई थी. निर्वासन 1999 में बेनज़ीर को एक मामले में दोषी तो ठहराया गया था लेकिन तुरंत सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया था. फिर बेनज़ीर 1999 में अपनी मर्ज़ी से पाकिस्तान छोड़कर विदेश चली गईं थीं. पाकिस्तान से बाहर रहने के दौरान बेनज़ीर दुबई में अपने तीन बच्चों और पति के साथ रही थीं. विशेषज्ञों का मानना है कि सैन्य प्रशासन बेनज़ीर को आधुनिक नेता के रुप में देखता था जिसके ज़रिए धार्मिक दलों का प्रभाव कम किया जा सकता था. 2002 में सैनिक शासन के तहत हुए चुनावों में बेनज़ीर की (पीपीपी) को सबसे अधिक मत मिले थे. उन्हें सरकार बनाने का न्योता दिया गया था जिसे उन्होंने ख़ारिज कर दिया. परिवार की विरासत बेनज़ीर अपने पिता की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने वाली इस परिवार की एक मात्र सदस्य थीं.
बेनज़ीर के एक भाई मुर्त़जा से उम्मीद थी कि वो पार्टी में एक बड़े नेता के रूप में उभर सकते हैं लेकिन पिता को फ़ांसी दिए जाने के बाद वह तत्कालीन अफ़गानिस्तान चले गए थे. वहाँ से वह कई मध्यपूर्व देशों में भी जाकर रहे. उन्होंने पाकिस्तान के सैन्य शासन के खिलाफ़ अल-ज़ुल्फ़िकार नाम का चरमपंथी संगठन बनाकर अपना अभियान चलाया. वो अपने निर्वासन के दौरान 1993 में पाकिस्तान के एक प्रांत की एसेंबली के लिए भी चुने गए थे. लेकिन इसके बाद वापस पाकिस्तान लौटने पर उनकी रहस्यमय परिस्थितियों में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. बेनज़ीर के दूसरे भाई शाहनवाज़ भी राजनीति में सक्रिय रहे. वह भी 1985 में ही फ्रेंच रिविएरा अपार्टमेंट में मृत पाए गए थे. पाकिस्तान वापसी बेनज़ीर भुट्टो लगभग आठ साल निर्वासन में रहकर इस साल 18 अक्तूबर को पाकिस्तान वापस आई थीं. लेकिन बेनज़ीर भुट्टो के स्वदेश लौटने के बाद कराची में उनके काफ़िले में दो बम धमाके हुए जिनमें 125 लोग मारे गए हैं और लगभग 300 लोग घायल हुए हैं. बेनज़ीर बाल-बाल बच गई थीं और ये समझा जा रहा था कि उनकी जान को ख़तरा है. |
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