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गुरुवार, 27 सितंबर, 2007 को 17:50 GMT तक के समाचार
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'बातचीत के दरवाज़े खुले रखने चाहिए'
बेनज़ीर भुट्टो
बेनज़ीर भुट्टो जल्दी ही पाकिस्तान लौटने वाली हैं
पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो इन दिनों अमरीका में हैं और 18 अक्तूबर को पाकिस्तान लौटने वाली हैं.

अमरीका में उन्होंने कई सीनेटरों और वरिष्ठ नेताओं से मुलाक़ात की है. एक सेमिनार में उन्होंने भाषण भी दिया जिसमें उन्होंने परमाणु जानकारी लीक होने का मामला भी उठाया.

बीबीसी के वाशिंगटन स्थित स्टूडियो में हमारे संवाददाता ब्रजेश उपाध्याय ने विशेष बातचीत की.

ब्रजेश-आप अमरीका में हैं, कहा जा रहा है कि आप वही बातें कर रही हैं जो अमरीकी प्रशासन को पसंद हैं, मीडिया का भी कहना है कि आप अमरीका की पसंदीदा उम्मीदवार हैं. पाकिस्तान में इस अमरीका विरोधी भावनाएँ चरम पर हैं, क्या पाकिस्तान को अमरीकी समर्थन वाला उम्मीदवार वहाँ कबूल किया जाएगा?

बेनज़ीर-मैं अख़बारों में पढ़ती हूँ कि अमरीकी प्रशासन चाहता है कि मोहतरमा आएं, लेकिन मुझसे किसी अमरीकी अधिकारी ने आज तक नहीं कहा कि आप सत्ता में आएँ. न ही मैंने किसी अमरीकी अधिकारी से कहा कि मुझे उम्मीदवार बनवाएँ. अगर आज कोई सीनेटर या अधिकारी मुझसे मिलते हैं तो इसलिए कि पाकिस्तान की ग़रीब और मज़लूम जनता मेरे साथ है. मुझे भुट्टो साहब ने सिखाया है कि ताक़त का स्रोत जनता है. मैं अवाम की कैंडिडेट हूँ, पाकिस्तानियों की कैंडिडेट हूँ.

ब्रजेश-वाशिंगटन पोस्ट में आपका जो लेख छपा है उसमें आपने कहा है कि आप नहीं जानती कि निजी तौर पर और सियासी तौर पर पाकिस्तान में किस तरह के हालात आपका इंतज़ार कर रहे हैं, आप पाकिस्तान जा रही हैं, थोड़ी-बहुत घबराहट है, बहुत समय के बाद मुल्क लौट रही हैं?

बेनज़ीर-मैं घबराहट में यक़ीन नहीं करती. मुझे बचपन से सिखाया गया है कि जब कोई मुश्किल हो तो हाय-हाय करने के बदले उसे पार करने का रास्ता निकालना चाहिए. मैं जानती हूँ कि लोग पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के ख़िलाफ़ हैं, जिन्होंने ज़िया के ज़माने में मुज़ाहिदीन का गुट बनाकर पीपीपी से लड़ाइयाँ लड़ी हैं, वह तबक़ा मेरे वापस आने से ज़ाहिर है ख़ुश नहीं होगा. वे चाहते हैं कि भुट्टो ख़ानदान, पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी तबाह हो जाए, वे नहीं चाहते हैं कि यह ऐसा मुल्क बने जिसके मालिक मेहनतकश लोग और किसान हों. ज़ाहिर है, वे साज़िश करेंगे, मुझे मालूम नहीं है कि एयरपोर्ट पर उतरने के बाद मेरे साथ क्या सुलूक होगा लेकिन मुझे अपने देश से प्यार है, अपने देशवासियों से प्यार है, उन्हें मेरी ज़रूरत है. मैं अपने देश वापस जा रही हूँ, उसे बचाने, लोकतंत्र को बचाने के लिए.

ब्रजेश-आपकी ट्रेनिंग एक सियासतदाँ की है और जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ की सोच एक कमांडो की तरह है. पहले तो वे बात करते हैं लेकिन बात नहीं बनने पर धावा बोल देते हैं. अगर कोई समझौता हो जाता है तो आप उनके साथ तालमेल कैसे बिठाएँगी?

बेनज़ीर भुट्टो
बेनज़ीर ने राष्ट्रपति मुशर्रफ़ से समझौता करने की कोशिश की है

बेनज़ीर-मेरा समझौते में यक़ीन नहीं है लेकिन मैं मानती हूँ कि सियासत में बातचीत के दरवाज़े खुले रखने चाहिए. बातचीत और समझौता, दो अलग-अलग चीज़ें हैं. समझौते की आलोचना तो की जा सकती है लेकिन बातचीत की नहीं. समझौते को कहा जा सकता है कि अच्छा है या बुरा है, लेकिन बातचीत को नहीं कहा जा सकता. मेरी बातचीत अभी लोकतंत्र की बहाली के सिलसिले में हो रही है लेकिन कोई समझौता नहीं हुआ है. देखिए, अभी तो कुछ दिन बाक़ी रह गए हैं, छह अक्तूबर को चुनाव है, हमारी पार्टी की बैठक उसके दो दिन पहले है. हम देखेंगे कि इस चुनाव से पहले क्या हुकूमत कुछ ऐसे क़दम उठाती है जिससे पाकिस्तान की जनता और हमारी पार्टी को लगे कि लोकतंत्र की बहाली हो रही है तो हमारा रास्ता कुछ और होगा. अगर ऐसा नहीं लगता तो कुछ और.

ब्रजेश-क्या आप जनरल मुशर्रफ़ पर भरोसा करती हैं?

बेनज़ीर-भरोसा किस पर किया जाए? कई बार बहुत करीबी दोस्त आपका भरोसा तोड़ देते हैं, सादिक़ अली पर हम भरोसा करते थे वे अलग हो गए, फ़ारुक़ लेग़ारी पर हम भरोसा करते थे, वे अलग हो गए. अब हम दिल के अंदर तो नहीं देख सकते. कोई अगर ज़ाहिर तौर पर अपने इरादे सामने रखता है कि हमारी पॉलिसी उदारवाद की है, हम लोकतंत्र चाहते हैं, तो हमें विश्वास करना चाहिए और बात आगे बढ़ानी चाहिए, फिर हम एक प्रॉसेस के तौर पर देखेंगे कि भरोसा क़ायम रहता है या नहीं.

ब्रजेश-अमरीका में जिन नेताओं से आपकी बातचीत हुई है उससे क्या लगता है, अमरीकी प्रशासन किसे अधिक चाहेगा, एक फौजी राष्ट्रपति या एक सिविलियन नेता?

बेनज़ीर-वो एक संतुलन चाहते हैं. वे जनरल मुशर्रफ़ पर भरोसा करते हैं, वे मुशर्रफ़ के साथ काम कर चुके हैं, उन्हें जानते हैं, वे परिचित से अपरिचित की तरफ़ नहीं जाना चाहते. वे मुशर्रफ़ को अपना साझीदार समझते हैं लेकिन साथ-साथ वे ये भी जानते हैं कि वे दुनिया भर में लोकतंत्र की बात कर रहे हैं ऐसे में पाकिस्तान में भी लोकतंत्र की बात करना उनके लिए ज़रूरी है. उनके जितने भी बयान आए हैं सब बहुत अच्छे हैं, राष्ट्रपति बुश ने भी कहा है कि वे पाकिस्तान में लोकतंत्र की बहाली चाहते हैं. उनके जितने भी अधिकारी पाकिस्तान गए हैं उन्होंने सभी पार्टियों के नेताओं से मुलाक़ात की है, ये जम्हूरी रवैया है. उन्होंने एमएमए (मुत्तहिदा मजलिसे अमल) के नेताओं से मुलाक़ात की है, उन्हें वीज़ा दिया है, वे कोई फर्क़ नहीं कर रहे हैं कि हम किसे पसंद करते हैं, या किसे नहीं करते. वे पाकिस्तान की मदद कर रहे हैं, पैसे दे रहे हैं, टेक्नॉलॉजी दे रहे हैं, हमें पूरी तस्वीर देखनी चाहिए.

ब्रजेश-भारत में काफ़ी लोग हैं जो आपको पसंद करते हैं, भारत के साथ जो आपके ताल्लुक़ात हैं उनके बारे में आप क्या समझती हैं, पाकिस्तान के मौजूदा हालत के संदर्भ में आप क्या कहेंगी?

बेनज़ीर-जहाँ तक भारत के मामले में मेरी पॉलिसी का सवाल है मैं चाहती हूँ कि दोनों देशों के बीच जंग न हो. हाँ, हमारे मतभेद हैं, कश्मीर का मतभेद है. लेकिन हमें दूसरे देशों से सीखना चाहिए, उनके बीच भी मतभेद होते हैं लेकिन उसका मतलब यह नहीं होता कि जंग होने वाली है. कश्मीर या कोई भी विवाद हो, उसको हल करने का पुरअमन तरीक़ा निकालना चाहिए. मेरा मानना है कि भारत को इग्नोर नहीं करना चाहिए. अभी दुनिया में एक ही सुपरपावर है, जो अकेले हैं उनकी बात नहीं सुनी जाएगी. हमें यूरोपीय संघ की तरह एक शक्तिशाली ब्लॉक बनाने की ज़रूरत है ताकि हमारी बात सुनी जाए, भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और सार्क के दूसरे मुल्कों को एक साथ मिलकर एक आवाज़ में बात करना चाहिए. जलवायु परिवर्तन, ग़रीबी उन्मूलन और वर्ल्ड ट्रेड के मामलों में हमें एकजुट होना होगा नहीं तो हमारी आवाज़ नहीं सुनी जाएगी.

ब्रजेश-आने वाले दिनों में अगर पाकिस्तान में एक नया राष्ट्रपति बनता है, एक नया प्रधानमंत्री चुना जाता है तो दुनिया पाकिस्तान को किन नज़रों से देखेगी?

बेनज़ीर-देखिए, अभी तो यह अटकल ही है लेकिन मज़ा आएगा अगर मख़दूम अमीन फ़हीम (पीपीपी के उम्मीदवार) राष्ट्रपति बन जाएँ और मैं प्रधानमंत्री.

ब्रजेश-तो क्या आप यक़ीन से कह सकती हैं कि बीबीसी ने पाकिस्तान की अगली प्रधानमंत्री से बात की है?

बेनज़ीर-इसका फ़ैसला तो जनता करेगी. मैं तो अपने आप को प्रधानमंत्री नहीं बल्कि एक आम पाकिस्तानी समझती हूँ. हाँ, अगर पाकिस्तान के भाई-बहन मुझे यह इज़्ज़त बख्शेंगे तो मुझे ख़ुशी होगी. मैं उनकी पूरी ख़िदमत करूँगी.

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