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सियासत का माहिर जनरल
मुशर्रफ़
मुशर्रफ़ को सफल रणनीतिकार और सियासत का जानकार माना जाता है
पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने राष्ट्रपति पद से इस्तीफ़ा देने की घोषणा कर दी है.

क़रीब नौ साल पहले सैन्य तख्तापलट के बाद पाकिस्तान की बागडोर अपने हाथ मैं लेने वाले मुशर्रफ़ के कार्यकाल का अंत हो गया है.

संसद में उनके ख़िलाफ महाभियोग की तैयारी हो रही थी और उनके पास इस्तीफ़ा देने के अलावा संभवत कोई विकल्प नहीं बचा था.

सियासत के माहिर जाने वाले इस पूर्व सेनाध्यक्ष के बारे में कहा जाता है कि वो संघर्ष करने वालों में से हैं लेकिन इस्तीफ़े की घोषणा करने के दौरान उनकी आंखों में आंसू देखे गए.

पृष्ठभूमि

किसी को उम्मीद नहीं थी जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ कभी पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष बनेंगे.

परवेज़ मुशर्रफ़ कराची के उर्दूभाषी परिवार से आते हैं और उन्होंने 1964 में सेना की नौकरी शुरु की थी.

परवेज़ मुशर्रफ़ का जन्म 1943 में दिल्ली में हुआ था और बँटवारे के बाद उनका परिवार पाकिस्तान में बस गया था.

पाकिस्तान की सेना में आम तौर पर पंजाबी अफ़सरों का बोलबाला रहा है लेकिन इसके बावजूद उनकी तरक्की होती रही.

अपने शुरुआती वर्षों में जनरल मुशर्रफ़ ने तोपख़ाने में काम किया, बाद में उन्हें एक बेहतरीन कंमाडो के रूप में जाना जाने लगा.

उन्होंने ब्रिटेन में दो बार सैनिक प्रशिक्षण लिया. बेनज़ीर भुट्टो ने उन्हें पहली बार सैन्य समन्वय का महानिदेशक बनाया था और बाद में वे थल सेनाध्यक्ष बने.

शीर्ष पद

पाकिस्तान के शक्तिशाली समझे जाने सेनाध्यक्ष जनरल जहांगीर करामत ने 1998 में अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया तो जनरल मुशर्रफ़ को सेना के तीनों अंगों का प्रमुख बना दिया गया.

नवाज़ शरीफ़ को हटाकर सत्ता में आए मुशर्रफ़

जनरल जहांगीर करामत के इस्तीफ़े ने सबको चौंका दिया क्योंकि पहले सेनाध्यक्ष थे जिसने इस्तीफ़ा दिया था. इसे प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की बढ़ती ताक़त और मज़बूत होते लोकतंत्र का सबूत माना गया.

कई विश्लेषक मान रहे थे कि जनरल मुशर्रफ़ को सेना का शीर्ष पद इसीलिए दिया था क्योंकि वे पंजाबी अफ़सर बिरादरी के नहीं थे.

इन विश्लेषकों का मानना था कि नवाज़ शरीफ़ ने जनरल मुशर्रफ़ को सुरक्षित माना था क्योंकि उन्हें लगा था कि ग़ैर-पंजाबी होने के कारण वे अपना प्रभावशाली गुट नहीं बना पाएंगे.

कश्मीर संकट

कश्मीर के संघर्ष के दौरान 1998 में जनरल मुशर्रफ़ अक्सर सरकारी टेलीविज़न पर नज़र आए.

जनरल मुशर्रफ़ के बारे बताया जाता है कि वे प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की कूटनीतिक कोशिशों से नाराज़ थे.

नवाज़ शरीफ़ के इन कोशिशों से और उनके कुछ बयानों से इन अफ़वाहों को बल मिला कि पाकिस्तान की सेना को लोकतांत्रिक सत्ता का समर्थन हासिल नहीं है. बाद में नवाज़ शरीफ़ ने पाकिस्तानी सेना की वापसी का आदेश दे दिया.

जनरल मुशर्रफ़ पहले वरिष्ठ अधिकारी थे जिन्होंने माना कि पाकिस्तानी सैनिक लड़ाई के दौरान भारत के नियंत्रण वाले क्षेत्रों में दाखिल हुए थे. इससे पहले तक पाकिस्तान का यही कहना था इस लड़ाई में पाकिस्तान की सेना शामिल नहीं है.

बेनज़ीर भुट्टो
मुशर्रफ़ ने बेनज़ीर भुट्टो के साथ सत्ता में साझेदारी पर बात चल रही है

पाकिस्तानी सेना की वापसी के बाद जनरल मुशर्रफ़ ने बीबीसी से बात करते हुए कश्मीर संकट को 'भारी सफलता' बताया था.

दूसरी तरफ़, भारत ने भी करगिल में जीत की ख़ुशियां मनाईं और यह उसकी चुनावी सफलता का कारण भी बना.

जनरल मुशर्रफ़ को कश्मीर संकट के दौरान पाकिस्तान का सफलतम रणनीतिकार माना गया लेकिन उन्होंने ये भी कहा कि वे भारत के साथ तनाव कम करने की कोशिशों के विरोधी नहीं हैं.

जनरल मुशर्रफ़ के सत्ता में आने के बाद भारत-पाकिस्तान संबंध में सुधार की जो उम्मीदें बंधी थीं वे शुरुआती महीनों में ही निराशा में बदल गईं.

भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव तेज़ी से बढ़ा और दोनों पक्षों ने सख़्त रवैया अपना लिया.

इंडियन एअरलाइंस के एक विमान के अपहरण के बाद 1999 में दोनों देशों के संबंधों में काफ़ी तनाव आया क्योंकि भारत का मानना है कि इस अपहरण के पीछे पाकिस्तान समर्थित चरमपंथियों का हाथ था.

भारत से संबंध

जनरल मुशर्रफ़ की भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से पहली बार मुलाक़ात जुलाई 2001 में आगरा में हुई जब भारत ने उन्हें शिखर वार्ता का न्योता दिया.

मुशर्रफ़-मनमोहन
मुशर्रफ़ ने भारत के साथ रिश्तों को बेहतर बनाने का प्रयास किया है

भारत पहुंचने से ऐन पहले जनरल मुशर्रफ़ ने ख़ुद को देश का राष्ट्रपति घोषित कर दिया और राष्ट्रपति रफ़ीक तारड़ को बिना कोई कारण बताए पद से हटा दिया गया था.

बहरहाल, काफ़ी उम्मीदें जगाने के बाद आगरा शिखर बैठक बिना किसी निष्कर्ष के समाप्त हो गया क्योंकि जनरल मुशर्रफ़ कश्मीर को विवादित क्षेत्र मानने पर ज़ोर दे रहे थे जिस पर भारत को कड़ी आपत्ति थी.

लेकिन बाद के वर्षों में मुशर्रफ़ ने भारत के साथ संबंधों को बेहतर बनाने के लिए खुल कर कोशिशें की. इस सिलसिले में भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से उनकी कई मुलाक़ातें हुईं.

वर्दी छोड़ने को तैयार

राष्ट्रपति के रूप में दूसरे कार्यकाल के लिए मुशर्रफ़ ने जनरल रहते हुए अपना नामांकन पत्र दाखिल किया और आगे चलकर राष्ट्रपति भी बन गए.

मुशर्रफ़ के सेनाध्यक्ष रहते राष्ट्रपति चुनाव में भाग लेने के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएँ दायर की गई थीं, जिसे कोर्ट के नौ सदस्यीय बेंच ने तकनीकी आधार पर ख़ारिज़ कर दिया.

मुशर्रफ़ ने राष्ट्रपति बनने के बाद आगे चलकर सेनाध्यक्ष पद छोड़ भी दिया.

आगे चलकर पाकिस्तान में चुनाव हुए और नई सरकार बनी.

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