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शनिवार, 16 फ़रवरी, 2008 को 14:57 GMT तक के समाचार
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पाक चुनाव: अल्पसंख्यकों के मुद्दे

पाकिस्तान के अल्पसंख्यक
पाकिस्तान के अल्पसंख्यक हिंदू समूदाय का सबसे ज़्यादा वोट थरपारकर के इलाक़े में है
पाकिस्तान के अल्पसंख्यक ये नहीं तय कर पाए हैं कि उन के लिए संयुक्त चुनाव प्रणाली बेहतर है या अलग चुनाव प्रणाली.

पाकिस्तान में आम चुनाव 1971 तक तो चुनाव संयुक्त प्रणाली के तहत होते रहे मगर 1979 में राष्ट्रपति बने जनरल ज़ियाउल हक़ ने मार्शल लॉ लगाने के बाद पृथक चुनाव प्रणाली की शुरूआत की और मतदाता मुस्लिम और ग़ैर मुस्लिम सम्प्रदाय में बँट गए.

कई सरकारें आईं और गईं लेकिन कोई सरकार भी इस प्रणाली को नहीं बदल सकी. आख़िर एक फ़ौजी शासक के बनाए गए क़ानून का दूसरे फ़ौजी शासक ने ख़ात्मा किया.

1999 में सत्ता में आए जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ जब चुनाव कराने की योजना बनाई तो उन्होंने अल्पसंख्यकों के लिए पृथक चुनाव प्रणाली ख़त्म करके फिर से संयुक्त चुनाव प्रणाली लागू की 2002 के आम चुनाव में अल्पसंख्यकों ने इसी प्रणाली के तहत हिस्सा लिया.

इसका सबसे ज़्यादा प्रभाव सिंध के रेगिस्तानी ज़िले थरपारकर में देखा गया जहाँ की लगभग अठारह लाख जनसंख्या में से 50 प्रतिशत हिंदू हैं और इस निर्धन क्षेत्र के सब से ग़रीब लोग भी हिंदू ही हैं.

पृथक चुनाव प्रणाली के तहत जीतने वाले उम्मीदवार इसी इलाक़े से भारी वोट हासिल करते रहे हैं. मिठ्ठू के रहने वाले भीरू मल ऐडवोकेट का कहना है कि पृथक चुनावी प्रणाली सही नहीं थी और इसकी वजह से हिंदू समूदाय में महरूमी का अहसास पाया जाता था और वह मुख्यधारा से कटे हुए थे और राजनीतिक पार्टियाँ भी उन पर ध्यान नहीं देती थीं, संयुक्त चनाव प्रणाली से कम से कम बराबरी का अहसास तो पैदा हुआ है.

संयुक्त चुनाव प्रणाली

कुछ अल्पसंख्यक यानी हिंदू नेता संयुक्त चुनाव प्रणाली के ख़िलाफ़ हैं. पृथक प्रणाली के समर्थक मैंघोड़ा क़बीले के डॉक्टर खट्टू मल का कहना है कि पृथक चुनाव में वोटर अपने प्रतिनिधि ख़ुद चुनते थे और वे उपने वोटरों के प्रति जवाबदेह भी होते थे. डॉक्टर खट्टूमल तीन बार सांसद रह चुके हैं.

जनता की पहचान...
 वास्तव में मौजूदा सिस्टम में अल्पसंख्यकों का वास्तविक प्रतिनिधित्व सामने नहीं आ रहा है. राजनीतिक पार्टियों ने अल्पसंख्यकों के लिए जो सीटें रखी हुई है वो जागीरदार और पूंजीपति वर्ग के लोगों को दी जाती हैं, जिनकी जनता में पहचान नहीं है.
भीरूमल एडवोकेट

खट्टूमल के मुताबिक़ दरअसल हिंदू अल्पसंख्यकों को दो हिस्सों में बाँटना चाहिए, एक वे हिंदू हों जो शहरों में रहते हैं और दूसरे अनुसूचित जाति के हिंदू. उन 80 प्रतिशत हिंदू जातियों को सदा नज़रअंदाज़ किया जाता था, उन्हें हमने संगठित किया.

पहली बार भील, कोहली, और मैंघोड़ा समुदाय के प्रतिनिधि संसद तक पहुँचे, जो समस्याओं से जूझ रहें हैं वे शहरों में नहीं बल्कि देहात में रहते हैं.

विरोध

लेकिन मट्ठी के डॉक्टर शंकर डॉक्टर खट्टूमल के विचार से सहमत नहीं हैं. डॉक्टर शंकर का कहना है कि अगर पृथक चुनाव प्रणाली से हिंदुओं को कुछ लाभ पहुँचता था तो इसके नाम पर उन्हें पूरे समूदाय से अलग करने का कोई औचित्य नहीं बनता है.

डॉक्टर खट्टूमल कहते हैं कि जब लोग उन्हें निर्वाचित करके संसद में भेजते थे तो अल्पसंख्यकों की समस्याएँ कहीं अधिक हुआ करती थी, उनके विरुद्ध संसद में आवाज़ उठती थी, 2002 के बाद बनने वाली पार्लियामेंट में पार्टियों ने जो सदस्य नामांकित करके भेजे हैं उनमें से किसी ने कभी उनकी आवाज़ नहीं सुनी.

भीरूमल ऐडवोकेट का कहना है, "वास्तव में मौजूदा सिस्टम में अल्पसंख्यकों का वास्तविक प्रतिनिधित्व सामने नहीं आ रहा है. राजनीतिक पार्टियों ने अल्पसंख्यकों के लिए जो सीटें रखी हुई है वो जागीरदार और पूंजीपति वर्ग के लोगों को दी जाती हैं, जिनकी जनता में पहचान नहीं है."

संयुक्त चुनाव प्रणाली के लिए मानवाधिकार संगठन और जनसाधरण सक्रिय रहे हैं लेकिन इससे अल्पसंख्यकों की भलाई और तरक़्क़ी पर कोई विशेष फ़र्क़ नज़र नहीं आता.

पानी की समस्या

थार ज़िले के मुख्यालय से सिर्फ़ पाँच किलोमीटर पर स्थित हिन्दू गाँव मालनहोर वीणा में अस्पताल, स्कूल और सामुदायिक भवन मौजूद हैं मगर ये सारी सहूलतें उन्हें अल्पसंख्यक कोटे से मिली हैं. परवेज़ मुशर्रफ़ के राजकाल में उन्हें मीठे पानी की कुछ बूंदें मिली हैं.

पाकिस्तानी हिंदू

थार में पानी की लाइन थार कोल एरिया के लिए बिछाई गई थी मगर रास्ते में आने वाले कुछ देहातों को इसमें से पानी दिया गया. एक महीने में दो बार कुछ घंटों के लिए हिंदू किसानों को नदी का पानी मिलता है. बाक़ी ज़रूरत ये लोग कुँए के खारे पानी से पूरी करते हैं.

थार के किसान छीनूमल का कहना है कि उनकी तो कोई पार्टी नहीं है, वह पटेल के कहने पर वोट देते हैं. सहूलत तो उन्हें मिलती है जो बड़े आदमी हैं, वे ख़ुद तो ग़रीब लोग हैं.

पूर्व प्रधानमंत्री शौकत अज़ीज़ का संबंध थार से ही रहा है और थार सिंध के मुख्यमंत्री अरबाब ग़ुलाम रहीन का भी चुनावी क्षेत्र रहा है. मगर उनके काम से लोग संतुष्ट नज़र नहीं आते हैं. लोगों का कहना है कि दोनों नेता संसद की ठंडी हवाओं में प्यासे रेगिस्तान के लोगों की परेशानियों को भूल गए.

थार में हर दूसरे साल सूखा पड़ता है और इसकी वजह से बड़े पैमाने पर लोगों का विस्थापन होता है, लोग रोज़गार की तलाश में बैराजी क्षेत्रों का रुख़ करते हैं, उनमें ज़्यादातर अनुसूचित जातियों के लोग होते हैं जिनमें मैंघोड़ा, भील और कोल्ही जातियाँ शामिल हैं.

इस साल अच्छी बारिश के नतीजे में फ़सल भी अच्छी हुई है लेकिन उनकी क़ीमतें इतनी गिरा दी गईं कि खेती-बाड़ी का ख़र्च भी नहीं निकल पा रहा है. यहाँ बाजरा, ग्वार, तिल और मूंग की फ़सलें होती है.

ग़ल्ले के दाम

किसान छीनूमल का कहना है, "दाम बहुत कम मिल रहा है, ग़रीबों के लिए यहाँ कोई फ़ायदा नहीं, अगर सरकार कोशिश करे तो दाम एक ही हों. एक दिन दाम हज़ार रूपए मन था, जब अनाज लेकर जाता हूँ तो लाला कहता है कि दाम तो कम हो गया, मुझे क्या पता ऐसा क्यों हुआ, कोई बताता भी नहीं है."

जिसे वोट दिया है...
 पहले वोट लेने वाले और देने वाले दोनों हिंदू होते थे मगर उस उम्मीदवार की चलती नहीं थी, वो बहुसंख्यक समुदाय के मोहताज होते थे, अगर उनके पास जाते तो वे कह देते थे कि जिनको वोट दिया है उनके पास जाओ. मगर इससे इतना फ़र्क़ पड़ा है कि यह लोग अब हमें भी अपना वोटर मानते हैं.
शंभूदत्त माली

देश में कोयले का सबसे बड़ा भंडार भी इसी इलाक़े में है जिससे कई नौजवानों की उम्मीदें जागी रहीं लेकिन दस साल गुज़रने के बाद भी इस परियोजना पर कोई काम नहीं हो सका और सिर्फ़ सहमति पत्रों पर ही हस्ताक्षर होते रहे.

प्राथमिक विद्यालय शिक्षक केवलराम का कहना है कि उनकी आर्थिक स्थिति पहले से ही कमज़ोर है और यहाँ कोई कारख़ाना नहीं है और रोज़गार का भी कोई रास्ता नहीं है जिसके कारण वह मजबूर होकर पलायन करते हैं.

थार के क़रीबी ज़िले अमरकोट में भी अल्पसंख्यक हिंदूओं की स्थिति कुछ अलग नहीं है, मगर दूसरे क्षेत्रों के मुक़ाबले ये लोग कुछ मज़बूत हैं लेकिन सामाजिक और राजनीतिक तौर पर कमज़ोर हैं.

सिंध प्रांत के पूर्व मुख्यमंत्री सैयद मुज़फ़्फ़र हुसैन शाह के दौर में अमरकोट से उमरकोट बनने वाले इस ज़िले की आबादी छह लाख से ज़्यादा है.

यहाँ के निवासी शंभू दत्त माली का कहना है, "पहले वोट लेने वाले और देने वाले दोनों हिंदू होते थे मगर उस उम्मीदवार की चलती नहीं थी, वो बहुसंख्यक समुदाय के मोहताज होते थे, अगर उनके पास जाते तो वे कह देते थे कि जिनको वोट दिया है उनके पास जाओ. मगर इससे इतना फ़र्क़ पड़ा है कि यह लोग अब हमें भी अपना वोटर मानते हैं."

भारतीय उपमहाद्वीप को जब एक लकीर से विभाजित किया गया था तो भारतीय राजस्थान और गुजरात से ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से जुड़े ये अल्पसंख्यक हिंदू पाकिस्तान के क्षेत्र में आ गए थे लेकिन उनकी क़िस्मत की लकीरें अभी तक धुंधली है.

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