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भारतीय मुसलमान:60 साल का अरसा-3 | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कुछ लोगों का कहना है कि मुसलमान ख़ुद ही दंगे भड़काते हैं और सामाजिक भाईचारे को नुक़सान पहुँचाते हैं. दूसरी तरफ़ मुसलमानों का कहना है कि सांप्रदायिक तनाव के दौरान उन्हें कट्टर हिंदुओं और सुरक्षा बलों दोनों के ही बलप्रयोग का सामना करना पड़ता है. इस संबंध में भागलपुर, मेरठ, मुंबई, गुजरात, अलीगढ़ के दंगों का ज़िक्र किया जाता है जिनमें पुलिस और सुरक्षा बलों की कार्रवाई पर सवाल उठाए गए. मौलाना वहीदुद्दीन ख़ान का विचार है कि मुसलमान ख़ुद ही हिंदुओं और सुरक्षा बलों को भड़काते हैं, "हर दंगे के दो पहलू होते हैं - एक शुरुआती और एक आख़िरी. मीडिया अक्सर आख़िरी चरण की बात करता है. सम्पूर्ण तस्वीर ये है कि मुसलमान भावुक होते हैं, बहुत जल्दी भड़क जाते हैं और भड़ककर पत्थर मारने लग जाते हैं, यहाँ तक पुलिस और सुरक्षा बलों को भी पत्थर मारने लगते हैं, पुलिस को ग़ुस्सा आता है और मुसलमानों को मारती है. हर जगह यही होता है." मौलाना वहीदुद्दीन ख़ान से जब सवाल किया गया कि अगर यह मान भी लिया जाए कि मुसलमान पत्थर मारकर शुरूआत करते हैं तो क्या पत्थर का बदला गोली से जान लेना है तो उनका कहना था कि यही होगा. जब पुलिस को ग़ुस्सा आता है तो ऐसा ही होता है और ऐसे हालात में ऐसा ही होता है. लेकिन पत्रकार कुलदीप नैयर इससे सहमत नहीं हैं, "अभी तो ये भी साबित नहीं हुआ है कि गुजरात में गोधरा रेलगाड़ी आगज़नी काँड में मुसलमानों का हाथ था, अभी इस पर भी सवालिया निशान लगे हैं. लेकिन अगर ये मान भी लिया जाए कि गोधरा में मुसलमानों का कोई हाथ था तो इसका क्या मतलब है कि उसके बाद सुनियोजित तरीके से और सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल करके मुसलमानों का सरेआम क़त्लेआम किया जाए, ये तो कोई बात नहीं हुई, ये तो कोई दलील नहीं हुई." सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सीतलवाड़ का कहना है कि गुजरात में सांप्रदायिक ताक़तें आज भी खुली घूमती हैं, "गुजरात नरसंहार के बाद भारत के लोकतंत्र के लिए एक बड़ा इम्तेहान है. ये सच जगज़ाहिर है कि नरेंद्र मोदी आज भी खुले घूमते हैं, वे जेल में नहीं बैठे हैं, हालाँकि इतने सबूत मौजूद हैं कि नरेंद्र मोदी ने दंगों की योजना बनाई थी और उसे अमल में लाने के लिए पुलिस और प्रशासन का इस्तेमाल किया." मुंबई दंगों की जाँच करने वाले श्रीकृष्ण आयोग ने भी सरकार और पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाए. दंगों की विभीषिका देख चुके एक नागरिक फ़ज़ल शाद का कहना है कि मुंबई बम धमाकों में जिस तरह से ठोस क़ानूनी कार्रवाई हुई है, सांप्रदायिक दंगों की भी जाँच होनी चाहिए थी और श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट पर अमल होना चाहिए था.
फ़ज़ल शाद कहते हैं, "आप हैरत करेंगे कि एक हज़ार से भी ज़्यादा लोगों का क़त्लेआम होने और हज़ारों करोड़ रुपए की संपत्ति बर्बाद होने के बावजूद किसी पर भी टाडा नहीं लगाया गया बल्कि उसके उलट मार्च में हुए बम धमाकों के सिलसिले में जितने लोगों को पकड़ा गया उनसब पर टाडा ही लगाया गया. मैं यक़ीन से कहता हूँ कि मुंबई दंगों के सिलसिले में अगर ठोस क़ानूनी कार्रवाई हुई होती तो दंगाइयों की इतनी हिम्मत नहीं बढ़ती की वे क़ानून की इस तरह धज्जियाँ उड़ाते और शायद गुजरात के दंगे भी नहीं हुए होते." मुंबई की मोहम्मद अली रोड पर है सुलेमान बेकरी है जिसमें आरोप हैं कि 1993 के दंगों के दौरान एक एसीपी त्यागी के आदेश पर चलाई गई गोली में कुछ निर्दोष मुसलमान मारे गए थे. इस घटना का ज़िक्र श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट में भी है. उस बेकरी के पास ही रहने वाले एक नागरिक अतहर का कहना है कि गोली चलाने वाले पुलिस अधिकारी और जवानों के ख़िलाफ़ आज भी कोई कार्रवाई नहीं हुई है. पुलिस की भूमिका दंगों में पुलिस की भूमिका का भी एक बड़ा मुद्दा है. भारतीय पुलिस सेवा के एक रिटायर्ड अधिकारी के एस सुब्रमण्यन ने अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हिंसा पर केंद्रीय गृह मंत्रालय में विशेष काम किया है और उनका कहना है कि उन्होंने कई ऐसी घटनाएँ देखी हैं जिनसे यह साबित होता है कि मुसलमानों के ख़िलाफ़ पूर्वाग्रह और भेदभाव की भावना बहुत गहरी जड़े जमा चुकी है. सुब्रमण्यन बताते हैं, "हमारे केंद्रीय गृह मंत्रालय में एक मुस्लिम सेक्रेटरी हुआ करते थे, बहुत बड़े अफ़सर थे, उनका नाम था सैयद मुज़फ़्फ़र हुसैन बर्नी. मैं उनके मातहत काम कर रहा था. एक बार उन्होंने मुझसे कहा कि सुब्रमण्यन, इंटेलीजेंस ब्यूरो तो मुझे रिपोर्ट ही नहीं कर रहा है. ऐसा एक सेक्रेटरी स्तर का अधिकारी मुझसे कह रहा था जिससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि प्रशासन, पुलिस और गुप्तचर एजेंसियों में मुस्लिम विरोधी पूर्वाग्रह कितना ज़्यादा हो चुका है."
भारतीय पुलिस सेवा के एक अन्य वरिष्ठ अधिकारी विभूति नारायण राय का कहते हैं कि पुलिस का सांप्रदायिकरण एक बड़ी चिंता का विषय है और बहुत से पुलिसकर्मी संविधान की शपथ को ही भूल जाते हैं. विभूति नारायण राय मेरठ के हाशिमपुरा काँड में पीएसी के जवानों की भूमिका की जाँच से जुड़े रहे हैं. राय कहते हैं, "जब भी कोई पुलिसकर्मी चाहे वो किसी भी रैंक या स्तर का हो, अपनी ट्रेनिंग पूरी करके पास आउट करता है तो संविधान की रक्षा की शपथ लेता है और इस शपथ को पूरा करने और संविधान की रक्षा करने की डूयूटी निभाते समय उसे अगर अपनी जान भी देनी पड़े तो पीछे नहीं हटना चाहिए." तो क्या पुलिस, सुरक्षा बलों और सेना में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व बढ़ाने यानी सिर-गिनती करने से समस्या के हल में कुछ मदद मिलेगी? कुछ ऐसी भी दलीलें दी जाती हैं कि मुसलमानों की जनसंख्या के अनुपात में ही सरकारी नौकरियों, पुलिस, सुरक्षा बलों और सेना में उनका प्रतिनिधित्व होना चाहिए. मगर क्या इससे सांप्रदायिकता और नहीं बढ़ेगी. जेएनयू के एक छात्र का कहना था, "जब इस देश में अनुसूचित जाति और जनजाति और पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण की सूची बनी थी तो क्या उससे सांप्रदायिकता बढ़ी थी या समाज किस हद तक बँटा था, जब सिखों के लिए इसी तरह की विशेष सुविधाएँ दी जाती हैं तो समाज में किस हद तक दरार पैदा होती है, तो मुसलमानों के लिए ऐसी किसी विशेष व्यवस्था का नाम आते ही हाय तौबा क्यों मचने लगती है." जेएनयू के इस मुस्लिम छात्र का कहना था, "आज मुसलमानों को हज कमेटी की सब्सिडी नहीं चाहिए, मुसलमानों को विकास चाहिए, अपने बच्चों के लिए शिक्षा और अच्छा भविष्य चाहिए, रोज़गार और नौकरियाँ चाहिए. लेकिन विकास का यह एजेंडा कहीं नहीं आता है, जब भी इसकी बात की जाती है तो शोर मचने लगता है कि मुसलमानों का तुष्टीकरण हो रहा है." आशा की किरण लेकिन तस्वीर का उजला पहलू भी है. कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि अल्पसंख्यक होने के नाते उन्हें विशेष बर्ताव मिलता है. हिंदुओं का एक बड़ा समुदाय ऐसा है जो मुसलमानों के अधिकारों के लिए संघर्ष करता है और उनकी बदौलत देश का धर्मनिर्पेक्ष चरित्र बरक़रार है.
शिक्षाविद मुशीरुल हसन कहते हैं, "बुनियादी तौर पर दलील तो यही है कि सिस्टम को ज़रा चुस्त-दुरुस्त और असरदार बनाने की ज़रूरत है ताकि संविधान में अल्पसंख्यकों को दिए गए अधिकारों और आश्वासनों का कोई उल्लंघन ना कर सके. मुसलमानों को चाहिए कि अपने जायज़ आधिकारों और माँगों की पूर्ति के लिए क़ानून के दायरे में रहकर जद्दोजहद करें और समान विचारधारा वाले लोगों को साथ लेकर चलें." प्रोफ़ेसर मुशीरुल हसन कहते हैं कि देश की सबसे बड़ी ताक़त ये है कि उसका ढाँचा लोकतांत्रिक और धर्मनिर्पेक्ष है और मुसलमानों के हक़ में यही सबसे बड़ी बात है. असग़र अली इंजीनियर मानते हैं कि सारा दोष सरकार पर थोपने भर से कोई बात नहीं बनने वाली है, "इसमें कोई शक नहीं है कि सरकार को मुसलमानों के लिए जितना कुछ करना चाहिए था, उसने नहीं किया लेकिन सिर्फ़ इससे काम नहीं चलेगा, मुसलमानों को ख़ुद आगे आकर अपनी हालत में सुधार के लिए अथक प्रयास करने होंगे." सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में भी कहा गया है कि मुसलमानों के शैक्षिक और आर्थिक पिछड़ेपन को दूर करने और उनके राजनीतिक सशक्तीकरण का अभियान सिर्फ़ मुसलमानों की समस्या नहीं है, बल्कि यह एक राष्ट्रीय समस्या है. इसलिए यह बेहद ज़रूरी है कि इस अभियान को सभी धर्मनिर्पेक्ष और लोकतांत्रिक ताक़तों और संगठनों को साथ लिया जाए. रिपोर्ट कहती है कि यह न सिर्फ़ समानता और निष्पक्षता के लिए ज़रूरी है बल्कि यह इसलिए भी ज़रूरी है कि कोई भी देश 15 करोड़ की आबादी को पीछे छोड़कर प्रगति नहीं कर सकता. तमाम शिकवे-शिकायतों के बावजूद हक़ीकत यही है कि हिंदू और मुसलमानों को जब ज़िंदगी का सफ़र साथ-साथ ही तय करना है तो तल्ख़ियाँ और दूरियाँ क्यों. शायर निदा फ़ाज़ली --- इंसान में हैवान यहाँ भी है वहाँ भी, अल्लाह निगेहबान वहाँ भी है यहाँ भी, |
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