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शुक्रवार, 14 सितंबर, 2007 को 09:27 GMT तक के समाचार
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भारतीय मुसलमान:60 साल का अरसा-2

अलीगढ़ का संवेदनशील अपरकोट इलाक़ा
मस्जिद और मंदिर हर शहर में होते हैं और हिंदू-मुसलमानों की घनी आबादी भी एक साथ होती है
दिल्ली से निकलकर हमने रुख़ किया उन दो शहरों का जहाँ दो विश्वविद्यालयों के नाम के साथ हिंदू और मुस्लिम लगा है. हमने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के मेडिकल कॉलेज में कुछ छात्रों से मुलाक़ात की जहाँ काफ़ी संख्या में हिंदू छात्र भी पढ़ाई करते हैं.

एक डॉक्टर छात्रा शिल्पी का कहना था कि उन्हें वहाँ माहौल में कुछ बदलाव नज़र नहीं आता मगर वो इस सवाल पर ख़ामोश हो गईं कि क्या अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय सिर्फ़ मुस्लिम छात्रों के लिए होना चाहिए.

वहीं हमने एक और छात्रा डॉक्टर सकीना से बात की तो उनका कहना था कि जो छात्र प्रतियोगिता में जगह नहीं बना पाते तो उन्हें कहीं भी जगह नहीं मिलनी चाहिए इसलिए अलीगढ़ भी इसका अपवाद क्यों हो मगर उनका यह भी कहना था कि देखने में आ रहा है कि अगर आपके नाम के साथ मोहम्मद या अहमद लगा है तो आपके साथ भेदभाव किया जाता है और अक्सर ऐसे मामलों में हक़ नहीं मिलता.

सामाजिक ताना-बाना

अलीगढ़ सांप्रदायिक रूप से काफ़ी संवेदनशील रहा है. अलीगढ़ के अपरकोट इलाक़े में हिंदू और मुसलमानों की घनी आबादी है और दोनों के घरों की दीवारें एक दूसरे से सटी हुई हैं. रोज़मर्रा की ज़िंदगी में दोनों का एक दूसरे के बिना गुज़ारा नहीं हो सकता. हिंदू दुकानदार है तो मुसलमान ग्राहक है, मुसलमान फ़ैक्टरी का मालिक है तो हिंदू मज़दूर है लेकिन फिर भी वहाँ अक्सर तनाव और झगड़े होते रहते हैं. यह तस्वीर देश के किसी भी शहर की हो सकती है.

हमने बाज़ारों में घूमकर देखा कि हिंदू और मुसलमानों की दुकानों में कोई फर्क नहीं किया जा सकता और वहाँ लोगों और दुकानदारों से बातचीत की तो ज़्यादातर का कहना था कि दंगे बाहरी तत्व आकर भड़काते हैं.

तो फिर स्थानीय लोग एकजुट होकर दंगाइयों का मुक़ाबला क्यों नहीं करते? इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं था हालाँकि सबने इसका दोष राजनीति पर मढ़ दिया. एक बात ज़रूर साफ़ हुई कि हिंदू और मुसलमान एक दूसरे के बिना रह भी नहीं सकते और न ही उनका कारोबार चल सकता मगर फिर भी दंगे जैसी बातें उनके नियंत्रण से बाहर नज़र आती हैं.

अलीगढ़ का एक बाज़ार

हम कई ऐसी फ़ैक्टरियों और कारख़ानों में भी गए जिनके मालिक मुसलमान थे और मज़दूर हिंदू और मालिक हिंदू थे और मज़दूर मुस्लिम और यह रिश्ता दशकों से इसी तरह से चला आ रहा है. मज़दूरों का कहना था कि दंगों के दौरान उनके मालिक उनकी हिफ़ाज़त करते हैं और कभी भी दिलों में दरार पैदा नहीं हुई है. तो क्या ऐसे समाज की उम्मीद करना सिर्फ़ कोरी कल्पना है कि जहाँ कहीं इस तरह की दरारें हैं वे दूर हो जाएँ.

अलीगढ़ से निकलकर हमने रुख़ किया मंदिरों के शहर वाराणसी का और सबसे पहले पहुँचे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय जहाँ कई छात्रों का कहना था कि साठ साल के दौरान मुसलमानों की ख़ासी प्रगति भी हुई है और उन्हें उनके अधिकार भी मिले हैं. समाज शास्त्र विभाग में अध्ययनरत राहुल का कहना था कि मुसलमानों में धार्मिक कठमुल्लापन की वजह से बहुत सी समस्याएँ बनी हुई हैं जो उनकी प्रगति को प्रभावित करती हैं.

राहुल का ख़याल था कि ख़ुद इस्लाम एक उदार और प्रगतिशील धर्म है लेकिन अशिक्षा और मुल्ला-मौलवियों के शिकंजे में जकड़े होने की वजह से उसका सही अनुकरण नहीं हो पाता है.

मगर बहुत से मुसलमानों की शिकायत है उनके इलाक़ों को विकास के लिए जानबूझकर नज़रअंदाज़ किया जाता है और वहाँ बुनियादी सुविधाएँ नहीं के बराबर हैं. उनका कहना है कि अक्सर ऐसे शहरों को सांप्रदायिक हिंसा का शिकार बनाया जाता है जहाँ मुसलमानों के कारोबार अच्छे चल रहे होते हैं जैसे कि रोज़ाबाद, मेरठ, अलीगढ़, सूरत, अहमदाबाद, मुरादाबाद वग़ैरा.

बनारस के एक ऐसे ही इलाक़े में हम लोगों से बात करने पहुँचे जहाँ क़रीब 95 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है और उसका नाम है बजरडीहा. वहाँ का हाल देखने पर कहानी अपने आप समझ में आने लगती है. वहाँ न कोई स्कूल है, न कोई अस्पताल और न ही सड़क, पानी और बिजली.

इनके और उनके हालात
 हिंदुओं में प्रगतिशीलता ज़्यादा है क्योंकि उनमें खुलापन ज़्यादा है. वे मुसलमानों की तरह मुल्ला-मौलवियों के शिकंजे में जकड़े नहीं रहते हैं. मुसलमान ख़ुद को समय के साथ बदलने से डरते हैं, हिचकिचाते हैं. और मुसलमान जब तक ये नहीं समझेंगे कि उनका भला हिंदू समाज के साथ भाईचारे में है तो उनके हालात नहीं सुधरेंगे.
पांचजन्य संपादक तरुण विजय

बजरडीहा के निवासियों के कहना था कि कुछ साल पहले मीडिया में ख़बरें आई थीं कि वहाँ बम बनाने की कोई फ़ैक्टरी पकड़ी गई थी. जब मैंने उत्सुकता जताई कि वो फ़ैक्टरी क्या मैं देख सकता हूँ तो लोग हँसने लगे कि आप भी कैसा मज़ाक करते हैं. जब कोई ऐसी फ़ैक्टरी है ही नहीं तो हम आपको दिखाएँगे क्या. निवासियों का दावा था कि अगर पूरे बनारस का सर्वेक्षण किया जाए तो बजरडीहा सबसे पिछड़ा इलाक़ा है.

बनारस में ही बहुत से मुसलमान साड़ी उद्योग में अपने हुनर के बूते पर रोज़ी-रोटी कमाते थे लेकिन अब बहुत से परिवार भूखमरी के कगार पर हैं और साड़ी बुनकर पेट पालना उनके बूते के बाहर की बात हो गई है. कई ऐसे बुनकरों से मेरी बात हुई तो पता चला कि बच्चों को पढ़ाना-लिखाना तो दूर की बात, दो जून की रोटी ही मिल जाए तो गनीमत है. वे नहीं जानते कि उनकी यह हालत कब तक चलेगी और क्या उसमें कभी कोई सुधार आएगा.

भेदभाव

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुखपत्र पांचजन्य के संपादक तरुण विजय का ख़याल है कि मुसलमान अपनी हालत के लिए ख़ुद ही ज़िम्मेदार हैं, "हिंदुओं में प्रगतिशीलता ज़्यादा है क्योंकि उनमें खुलापन ज़्यादा है. वे मुसलमानों की तरह मुल्ला-मौलवियों के शिकंजे में जकड़े नहीं रहते हैं. मुसलमान ख़ुद को समय के साथ बदलने से डरते हैं, हिचकिचाते हैं. और मुसलमान जब तक ये नहीं समझेंगे कि उनका भला हिंदू समाज के साथ भाईचारे में है तो उनके हालात नहीं सुधरेंगे."

तरूण विजय का कहना है, "हिंदू समाज मुसलमानों का भला चाहता है, अगर भला नहीं चाहता तो 1947 में हिंदुओं को कोई नहीं रोक सकता था कि भारत को एक हिंदू राष्ट्र बना दिया जाता."

बनारस में एक बुनकर
बनारस में बहुत से बुनकर रोज़ी-रोटी की समस्या का सामना कर रहे हैं

लेकिन बहुत से मुसलमानों का कहना है कि उनके साथ हर क्षेत्र में भेदभाव किया जाता है, उन्हें बैंकों से क़र्ज़ नहीं मिलता, नौकरियों में भर्ती में भेदभाव किया जाता है, अच्छी शिक्षा नहीं होने की वजह से वह अच्छी नौकरियाँ नहीं पाते और अगर शिक्षा पाते भी हैं तो अक्सर मामलों में उनके साथ भेदबाव होता है.

सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार मुस्लिम बहुल इलाक़ों में अक्सर देखा गया है कि स्कूल, अस्पताल और बुनियादी सुविधाएँ नहीं के बराबर हैं.

रिपोर्ट के अनुसार पश्चिम बंगाल और बिहार में एक हज़ार और उत्तर प्रदेश में 1943 से ज़्यादा ऐसे मुस्लिम गाँव हैं जहाँ कोई शैक्षणिक संस्थान ही नहीं है. यह समस्या तब और गंभीर नज़र आती है कि मुसलमानों की घनी आबादी ऐसे राज्यों में जहाँ वैसे ही बुनियादी सुविधाओं का ढाँचा चरमराया हुआ है.

सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया था, "एक बहुलतावादी समाज में सरकार को प्रतिनिधिक बनाने के लिए यह ज़रूरी है कि सरकारी नौकरियों और मशीनरी में सभी समुदायों का समुचित प्रतिनिधित्व हो." लेकिन सरकारी नौकरियों और मशीनरी में मुसलमानों के बहुत कम प्रतिनिधित्व होने के हालात से भारत में सरकार चलाने की पक्षपातपूर्ण फ़ितरत का भंडाफोड़ होता है.

अलीगढ़ का एक कारख़ाना
बहुत से मुसलमान अनपढ़ होने की वजह से सिर्फ़ मज़दूरी ही कर पाते हैं

सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार प्रतिष्ठित भारतीय प्रशासनिक सेवा यानी आईएएस में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व 3 प्रतिशत, भारतीय विदेश सेवा में 1.8 प्रतिशत और भारतीय पुलिस सेवा यानी आईपीएस में 4 प्रतिशत पाया गया. भारतीय रेल में 4.5 प्रतिशत मुसलमान नौकरी करते पाए गए लेकिन उनमें से

लगभग सभी यानी क़रीब 98.9 प्रतिश निम्न स्तर की नौकरियों पर पाए गए. सुरक्षा एजेंसियों में मुसलमानों का हिस्सा चार प्रतिशत पाया गया और न्यायिक व्यवस्था में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व और मौजूदगी हमेशा ही चिंता का विषय रहा है. इसी तरह से बैंकों और विश्वविद्यालयों में भी मुसलमानों का प्रतिनिधित्व बहुत कम है.

मुसलमान अक्सर कहते हैं कि आबादी तो 13 प्रतिशत है लेकिन सरकारी नौकरियों में इतना प्रतिनिधित्व भेदभाव को ज़ाहिर करता है. सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के अनुसार एक भी ऐसा राज्य नहीं मिला जहाँ मुसलमानों को उनकी जनसंख्या के अनुपात में सरकारी नौकरियों और मशीनरी में प्रतिनिधित्व हासिल हो.

जेएनयू के एक छात्र समीर इस सवाल पर तमतमा उठते हैं कि मुसलमानों के साथ भेदभाव की बात कितनी सही है, "गुजरात दंगों में जिस तरह से मुसलमानों का नरसंहार किया गया वह अनेक रिपोर्टों से ज़ाहिर हो चुका है लेकिन इसके बावजूद पोटा के सारे के सारे केस मुसलमानों पर लगाए गए. इतना ही नहीं,

पुलिस हो, आर्मी हो या फिर कोई और जगह, आपके नाम में अगर मोहम्मद या अहमद लगा है तो भारत के किसी भी पुलिसिये को आपकी तलाशी लेने का हक़ है, आपको बेइज़्ज़त करने का हक़ है."

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