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पाकिस्तानी हिंदू:अस्तित्व की चिंता-2 | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बुद्धाराम के चेहरे पर अपनी जवान बेटी के भविष्य की चिंता साफ़ नज़र आती है. यह चिंता पायल के पिता बुद्धाराम की ही नहीं है पाकिस्तान में रहने वाले बहुत से हिंदुओं की है. उनकी लड़कियों को या तो ज़बरदस्ती मुसलमान बना लिया जाता है या फिर वे हालात की वजह से ख़ुद ही इस्लाम की तरफ़ आकर्षित हो जाती हैं कि शायद मुसलमान बनकर वे ज़्यादा सुरक्षित और ख़ुशहाल रहेंगी. एक सामाजिक कार्यकर्ता मंगलेश शर्मा को यह दलील ही समझ में नहीं आती कि अचानक हिंदू लड़कियों को इस्लाम से मोहब्बत क्योंकर हो जाती है, “इस्लाम एक बहुत बड़ा मज़हब है तो उसकी किस बात से अचानक इतनी मोहब्बत हो जाती है कि वह लड़की अपने इस्लाम को क़बूल करने के लिए अपने परिवार को छोड़ने के लिए तैयार हो जाती है.” इस्लाम की एक अच्छी जानकार मंगलेश शर्मा कहती हैं कि हिंदू लड़कियों के इस्लाम क़बूल करने के मुद्दों को राजनीतिक हवा भी दी जाती है और अधिकतर मामलों में समाज और व्यवस्था बहुसंख्यक समुदाय यानी मुसलमानों के साथ खड़ी नज़र आती है. पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग के महासचिव इक़बाल हैदर कहते हैं कि चिंता की बात ये है कि अकसर मामलों में न्यायालय भी कम उम्र हिंदू लड़की के इस बयान को मान्यता दे देते हैं कि वह अपनी मर्ज़ी से इस्लाम क़बूल कर रही है और उस लड़की की उम्र पूछने की ज़हमत भी गवारा नहीं की जाती, ऐसे में पूरा मामला ही ढीला पड़ जाता है. इक़बाल हैदर के अनुसार बहुत से कट्टरपंथी मुसलमान इस मुहिम पर बड़ी मुस्तैदी से काम कर रहे हैं कि हिंदुओं को और ख़ासतौर पर उनकी बेटियों को मुसलमान बनाया जाए. पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2005-6 में लगभग पचास हिंदू लड़कियों ने इस्लाम क़बूल किया था. मंदिर-मस्जिद हिंदुओं की एक बड़ी चिंता ये भी है कि उनके अनेक मंदिर ऐसे भी हैं जिन पर क़ब्ज़ा हो चुका है लेकिन सरकार कोई सुध नहीं लेती. बुद्धाराम का कहना है कि उनकी ही बस्ती में एक मंदिर पर क़ब्ज़ा करके वहाँ पीर की दरगाह बना दी गई, सरकारी विभागों में बार-बार गुहार लगाने के बावजूद कोई सुनवाई नहीं हुई है. पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों की निगरानी करने वाले एवेक्यूई ट्रस्ट बोर्ड के चेयरमैन ज़ुल्फ़िक़ार अली ख़ान के सामने जब हमने यह सवाल रखा तो उनका कहना था कि मंदिरों की देखरेख हिंदू समुदाय के ही लोग करते हैं और उनमें सरकार का कोई दखल नहीं होता.
भारत में 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस का असर पाकिस्तान में भी महसूस किया गया. लाहौर के कृष्णा मंदिर की देखरेख करने वाले मुनव्वर चंद कहते हैं, “उस समय एक धार्मिक उन्माद देखा गया था और अनेक हिंदू मंदिरों को या तो गिराया गया या नुक़सान पहुँचाया गया लेकिन सरकार ने ज़्यादातर मंदिरों को फिर से बनवा दिया है.” मुनव्वर चंद अपनी इस बात के समर्थन में दलील देते हैं कि लाहौर के कृष्णा मंदिर का आधुनिकीकरण करने के लिए सरकार ने पच्चीस लाख रुपए की सहायता दी है और भारी संख्या में हिंदू उसमें पूजा-अर्चना करने के लिए आते हैं. स्कूलों में इस्लामी तालीम अनिवार्य है और हिंदुओं को अपने धर्म और भाषा का अध्ययन सिर्फ़ घरों और मंदिरों में ही करना होता है, सरकार इसमें कोई मदद नहीं करती. आशा की किरण तमाम मुश्किलों के बावजूद कुछ हिंदू यह कहने में भी नहीं हिचकिचाते कि सरकार उनका ख़याल रखती है. मंगलेश शर्मा की नज़र में परवेज़ मुशर्रफ़ की सरकार ने हिंदुओं के लिए हालात बेहतर बनाए हैं और उनके शासन काल में अल्पसंख्यकों को ऐसा महसूस हुआ है कि वे भी इनसान हैं. मंगलेश शर्मा के अनुसार 1992 में हिंदुओं को बहुत तकलीफ़ें हुई थीं लेकिन भारत में जब 2002 में गुजरात दंगे हुए तो पाकिस्तान में हिंदुओं को कोई परेशानी या तकलीफ़ नहीं हुई जिसकी वजह ये थी कि सरकार ने ठोस उपाय किए थे. राणा भगवान दास जैसे नाम अक्सर समाचारों में सुनने को मिलते हैं जो हिंदू होते हुए भी पाकिस्तान के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के पद तक पहुँच गए मगर ऐसे उदाहरण बिरले ही मिलते हैं. पाकिस्तान में भी हिंदुओं को उसी अदृश्य पक्षपात और पूर्वाग्रह का सामना करना पड़ता है जिसका आरोप भारत में रहने वाले मुसलमान लगाते हैं यानी संविधान और नियम-क़ानूनों में तो बराबरी का दर्जा हासिल है लेकिन वास्तविकता में वो बराबरी दूर की बात है. तमाम भेदभाव और पक्षपात के माहौल के बावजूद ज़्यादातर हिंदुओं का कहना था कि उनकी पहचान एक पाकिस्तानी के रूप में ही है और इसमें उन्हें कोई अफ़सोस भी नहीं है. वे पाकिस्तान में रहकर ही अपने लिए हालात बेहतर करने की जद्दोजहद के लिए हिम्मत जुटाते नज़र आते हैं. इसमें कोई शक नहीं कि पाकिस्तान में हिंदुओं को हालात काफ़ी दयनीय हैं लेकिन लाहौर उच्च न्यायालय के हाल के एक फ़ैसले से एक उम्मीद भी नज़र आती है. न्यायालय ने अपने फ़ैसले में एक मंदिर गिराकर वहाँ एक शापिंग माल बनाने पर रोक लगाते हुए कहा था कि किसी धार्मिक स्थल को नुक़सान पहुँचाना दंडनीय अपराध है. |
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