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'पीएम का फ़ैसला करने की लिमिट नहीं' | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पाकिस्तान में सरकार बनाने की कोशिशें लगातार चल रही हैं लेकिन अभी तक सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) प्रधानमंत्री का नाम तय नहीं कर सकी है. पीपीपी के सांसदों की एक बैठक के बाद इस्लामाबाद में बीबीसी संवाददाता एजाज़ मेहर ने उनसे विस्तार से बात की. पार्टी के नेशनल एसेंबली के मेंबरों (एमएनए) की बैठक में आज क्या फ़ैसला हुआ? आज की बैठक में हमने सारे सांसदों से मुलाक़ात की, पार्टी ने भविष्य की रणनीति तय की, हमने काफ़ी सारे फ़ैसले किए हैं. जो चुनौतियाँ नज़र आ रही हैं, उन चुनौतियों पर चर्चा हुई. क्या आप बता सकते हैं, क्या चुनौतियाँ हैं? सबसे बड़ा चैलेंज आतंकवाद है, उसके अलावा वकील बिरादरी की भी एक माँग है, (न्यायपालिका को बहाल करने की) वह भी बड़ी चुनौती है. संवैधानिक चुनौतियां हैं, शक्ति संतुलन की भी बात है, राष्ट्रपति और संसद के बीच. आपको प्रधानमंत्री के नाम का ऐलान करना है, उसमें इतनी देर क्यों हो रही है? इसी विचार-विमर्श करने के लिए सांसदों की बैठक बुलाई गई थी. वोट उनके पास है, उन्हें तय करना है. उन्हीं की सहमति से हमें इस पर फ़ैसला करना है. कब तक ये फ़ैसला हो पाएगा कि अगला प्रधानमंत्री कौन होगा? जल्द ही होगा, मैं इस मामले पर कोई टाइम लिमिट तय नहीं कर रहा हूँ. अभी तो नेशनल एसेंबली की बैठक भी नहीं बुलाई गई है. क्या इस सिलसिले में राष्ट्रपति से आपकी बात हुई कि नेशनल एसेंबली की बैठक क्यों नहीं बुलाई जा रही है? हमारी पार्टी ने फ़ैसला किया है कि जब संसद अस्तित्व में आ जाएगी, प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया जाएगा तब संस्थागत तौर पर हम संवाद शुरू करेंगे. सत्ता में साझीदारी को लेकर कोई बातचीत हुई है क्या, क्या कोई समझौता हुआ है, कोई फ़ार्मूला बना है? उसके लिए हमने एक कमेटी बना दी है जो इस काम में लगी है. क्या ये सच है कि मुस्लिम लीग (नवाज़) ने कोई ओहदा लेने से इनकार कर दिया है? उनका ये रुख़ है, ऐसा मैंने अख़बारों में पढ़ा है लेकिन जब वे हमसे विचार-विमर्श करेंगे, हमारे सामने अपनी बात रखेंगे तो हम अपनी पार्टी में राय-मशविरा करके अगला क़दम उठाएँगे. आपके ख़िलाफ़ पाँच मुक़दमे वापस लिए गए हैं, परवेज़ मुशर्रफ़ और आपके बीच विश्वास कायम करने की जो कोशिश चल रही है, उसके बारे में आप क्या कहेंगे? जब कोई हवा चल पड़ती है तो चल पड़ती है, अब देखिए शहबाज़ शरीफ़ (पीएमएल-नवाज़ के नेता) का एक मुक़दमा भी वापस लिया गया है लाहौर में, तो क्या आप कहेंगे कि उनका कोई समझौता हो गया है, असल में ये तो सिचुएशन ऑन ग्राउंड (ज़मीनी हक़ीकत) है. हाइकोर्ट का एक फ़ैसला आया है कि ये होना चाहिए, हाइकोर्ट के फ़ैसले के तहत ही केस ख़त्म किए गए हैं. लेकिन ये तो परवेज़ मुशर्रफ़ के नियुक्त किए हुए जज हैं, क्या आप उनको मानते हैं? ये फ़ैसला तो नीचे की जुडिशियरी ने किया है. |
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