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शनिवार, 02 जून, 2007 को 13:35 GMT तक के समाचार
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बिहार का 'मिनी सीरियल किलर'

अमरजीत
अमरजीत के मित्र काफ़ी सहमे हुए हैं
उसके चेहरे पर भय और चिंता की कोई लकीरें नहीं हैं. बस मुस्कुराने या क्रोधित होने जैसे भाव ही उसकी आँखों में देखे जा सकते हैं.

दस वर्ष के इस बच्चे पर तीन मासूमों की हत्या का आरोप है. मिनी सीरियल किलर के रूप में चर्चित इस लड़के का ज़िक्र आते ही उसके हमउम्र दोस्त काँप उठते हैं.

बिहार के बगूसराय ज़िले के भगवानपुर थाना के मुसहरी गाँव के इस बालक अमरजीत सदा पर आरोप है कि इसने आख़िरी बार अपने ही गाँव की छह महीने की बच्ची ख़ुशबू को पत्थर मार-मार कर उसकी हत्या कर दी और फिर उसकी लाश एक खेत की मिट्टी से ढँक दी.

स्थानीय अदालत में पेश किए जाने से पहले इस संबंध में अमरजीत ने किसी भी सवाल का जवाब निहायत ही बेफ़िक्री से दिया. इस संबंध में वह कुछ भी बताने से पहले बिस्किट की मांग करता है.

आरोप

हाथ में बिस्किट का पैकेट मिलते ही पहले मुस्कुराता है फिर कहता है, "मारने के बाद मैंने इसे खेत में रख दिया. उसकी माँ ने खोजा तो मैंने उस बता दिया कि उसे कहाँ रखा था." उसे क्यों मारा-इस सवाल के जवाब में बेपरवाही से कहता है, ‘बस मार दिया.’

गाँव वालों का कहना है कि पिछले एक वर्ष में उसने तीन हत्या की है. छह महीने पहले उसने कथित तौर आठ महीने की अपनी बहन को नाले के कीचड़ में घसीट कर मार डाला था.

इससे पहले एक वर्ष से भी कम उम्र के अपने ममेरे भाई की हत्या का आरोप भी अमरजीत पर लगाया जा रहा है. जबकि अमरजीत की माँ लीला देवी का कहना है, ‘इसने अपने ममेरे भाई की हत्या नहीं की, हाँ उसके हाथों से उसकी बहन नाले में गिर गई जिसके बाद उसकी मौत हो गई.'

 अपने लंबे पुलिस करियर में मुझे पहली बार ऐसे बच्चे का पाला पड़ा है जो आत्मविश्वास से भरा है. वर्दी का कोई ख़ौफ़ नहीं. डाँटने का भी उसपर कोई असर नहीं होता. उसे न तो कोई ग़म है और न ही कोई पश्चाताप
थाना प्रभारी शत्रुघ्न कुमार

अमरजीत की हमउम्र चनिया ने उसे ख़ुशबू को खेत की तरफ़ ले जाते देखा था. चनिया बताती है, ‘जब हमने उसे धूप में ले जाने का विरोध किया तो अमरजीत ने ग़ुस्से में आकर मुझे दाँत काट लिया.’

दलितों में सबसे पिछड़ा मानी जाने वाली मुसहर जाति के अमरजीत के माँ-बाप घोर आर्थिक तंगी के शिकार हैं.

उसकी माँ लीला कहती हैं, ‘भगवान मेरी कुछ भी नहीं सुनता. एक ओझा को इक्कीस रुपये देकर उसके गले में तावीज़ बांधी थी पर यह भी काम नहीं आया. गाँव के स्कूल में कुछ पढ़ने के लिए उसे भेजती हूँ तो वह शिक्षक की कोई बात नहीं मानता. स्कूल में मिलने वाली खिचड़ी खा कर वह शिक्षक से आँखें चुरा कर भाग निकलता है.’

दहशत

अमरजीत के हमउम्र दोस्त इस हादसे के बाद दहशत में हैं. उसका एक साथी कहता है, ‘सिपाही-चोर के खेल में वह हम लोगों की बहुत पिटाई करता है, हमलोग उससे दूर रहना चाहते हैं लेकिन अगर उसे न खेलने दें तो हम लोगों को उससे और ख़तरा रहता है.’

अमरजीत की माँ हत्या की बात नहीं मानती

भगवानपुर थाना के प्रभारी शत्रुघ्न कुमार कहते हैं, ‘अपने लंबे पुलिस करियर में मुझे पहली बार ऐसे बच्चे का पाला पड़ा है जो आत्मविश्वास से भरा है. वर्दी का कोई ख़ौफ़ नहीं. डाँटने का भी उसपर कोई असर नहीं होता. उसे न तो कोई ग़म है और न ही कोई पश्चाताप.’

उन्होंने बताया कि अमरजीत को गुरुवार को स्थानीय अदालत में पेश किया गया जहाँ से उसे बाल सुधार गृह में भेज दिया गया.

शत्रुघ्न कुमार ने बताया कि चूँकि अमरजीत अवयस्क है इसलिए उसे सज़ा नहीं होगी. उन्होंने कहा कि अमरजीत के हत्या की बात स्वीकारने के बावजूद वे इस मामले की तहक़ीक़ात कर रहें हैं.

पटना के प्रख्यात मनोविश्लेषक शमशाद हुसैन ऐसे बच्चों को मनोहिंसक कहते हैं. उनके अनुसार ऐसे बच्चों में सही या ग़लत में अंतर करने का माद्दा नहीं होता.

 ऐसे बच्चे दूसरे को प्रताड़ित कर आनंदित होते हैं और इस तरह के आनंद की प्राप्ति के लिए वह हिंसक भी हो जाते हैं
शमशाद हुसैन, मनोचिकित्सक

अंडरस्टैंडिंग ह्यूमन विहैवियर के लेखक और मगध विश्विद्यालय के पूर्व उपकुलपति हुसैन कहते हैं,"ऐसे बच्चे दूसरे को प्रताड़ित कर आनंदित होते हैं और इस तरह के आनंद की प्राप्ति के लिए वह हिंसक भी हो जाते हैं."

उनके अनुसार ऐसी प्रवृति विकसित होने में पारिवारिक पृष्ठभूमि के साथ समाजिक हालात भी ज़िम्मेदार होते हैं. उनका कहना है कि ऐसे बच्चों के इस तरह के मनोविकार को सतत मनोवैज्ञानिक उपचार से सही और ग़लत में फ़र्क़ करने की समझ विकसित की जा सकती है.

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