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मंगलवार, 29 मई, 2007 को 15:51 GMT तक के समाचार
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छोटे-छोटे बच्चों के लिए बड़ी-बड़ी फ़िल्में

आने वाली फ़िल्मों में केन घोष की 'चेन खुली कि मेन खुली' भी है
फिल्मों के विषय मौसम की तरह बदलते हैं. इसी साल की शुरूआत में खेल की कई फ़िल्में आईं लेकिन वर्ल्ड कप में हार के साथ ही ये फ़िल्में भी पिट गईं.

अब बॉलीवुड में नया मौसम है बच्चों की फ़िल्मों का. आने वाली फ़िल्में हैं, बॉबी देओल की मुख्य भूमिका वाली ‘नन्हे जैसलमेर’, सुजोय घोष की ‘अलादीन’ जिममें मुख्य भूमिका में अमिताभ बच्चन हैं.

इसके अलावा आमिर ख़ान की मुख्य भूमिका वाली फ़िल्म ‘तारे ज़मीन पर’, अनुराग बासु की ‘हनुमान2’, केन घोष की 'चेन खुली कि मेन खुली' भी हैं.

 मैं मानती हूँ जो फ़िल्में बच्चों को ज़्यादा पसंद आती है उनका बाज़ार अपने आप अच्छा हो जाता है क्योंकि उनके साथ माँ-बाप, भाई-बहन सबको वो फ़िल्म देखनी पड़ती है
इंदु मिरानी, फ़िल्म समीक्षक

बच्चों की फ़िल्मों का बढ़ता बाज़ार देखकर बड़े-बड़े निर्माता-निर्देशक भी इस पर दाँव लगाने को तैयार हैं. बच्चों को लुभाने के लिए नई कहानियों और बड़े कलाकारों का सहारा लेकर कई निर्देशक मैदान में उतर रहे हैं.

बच्चों की अहम भूमिका वाली फ़िल्म ‘ता रा रम पम’ के निर्देशक सिद्धार्थ आनंद कहते हैं, “जब मैंने फ़िल्म ता रा रम पम बनाने की सोची तो मुझे इस नए ट्रेंड के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. मुझे बस यही लगा था कि हमारी फ़िल्म इंडस्ट्री में बच्चों के लिए अच्छी और मनोरंजक फ़िल्मों की कमी है इसलिए मैंने इसे बनाने का फ़ैसला किया. मेरे ख़याल से बड़े स्टारों की वजह से जोखिम कम हो जाता है”.

टेलीविजन पर ‘जस्ट मोहब्बत’ और ‘टार्ज़न- द वंडर कार’ जैसी फ़िल्मों के माध्यम से बच्चों के बीच में अपनी एक पहचान बना चुके अभिनेता वत्सल सेठ मानते हैं कि भारत में बच्चों पर केंद्रित फ़िल्मों का ज़्यादा बाज़ार नहीं है.

बड़ा बाज़ार

मिस्टर इंडिया से लेकर हनुमान, कृष्णा आदि जैसी फ़िल्मों के हिट होने पर भी निर्माता ऐसी फ़िल्मों को हाथ लगाने से घबराते हैं.

वत्सल कहते हैं, “मैं जहाँ भी जाता हूँ बच्चे मुझे घेर लेते हैं. असल में बच्चों के लिए बनी फ़िल्मों की ज़्यादा पब्लिसिटी भी नहीं की जाती है. विदेशों में ऐसी फ़िल्में यहाँ से कहीं ज़्यादा कारोबार करती हैं.”

बच्चों को ख़ुश करना कोई आसान काम नहीं है

निर्देशक सुजोय घोष को अपनी फ़िल्म अलादीन के लिए बिग बी से अच्छा कोई और नहीं नज़र आया.

वे कहते हैं, “मेरी इस फ़िल्म के लिए अमिताभ एकदम फिट बैठते हैं. वे बच्चों की तरह मस्ती भी करते हैं. बच्चों के बीच चर्चित होने के साथ वे स्क्रीन पर भी उनके दिल में उतरने में कामयाब होते हैं. इस फ़िल्म में उनका किरदार सचमुच बहुत मनोरंजक है. मैंने स्पेशल इफेक्ट्स के साथ ही बहुत कुछ नया करने की कोशिश की है जो दर्शक देखेगा कभी भूल नहीं पाएगा”.

रमेश सिप्पी प्रोडक्शन के बैनर तले बन रही इस फ़िल्म में अमिताभ बच्चन के अलावा अलादीन के किरदार में रितेश देशमुख और रिंग मास्टर के किरदार में संजय दत्त हैं.

लगता है इंडस्ट्री अब इस बात को बखूबी समझ चुका है कि बच्चों के सामने कुछ भी नहीं परोसा जा सकता है बल्कि उन्हें ख़ुश करना ज़्यादा मुश्किल काम है.

चुनौती

फ़िल्म समीक्षक इंदू मिरानी कहती हैं, “मिस्टर इंडिया जैसी फ़िल्में समय-समय पर बनती रही हैं और सफल भी होती हैं. मैं मानती हूँ जो फ़िल्में बच्चों को ज़्यादा पसंद आती है उनका बाज़ार अपने आप अच्छा हो जाता है क्योंकि उनके साथ माँ-बाप, भाई-बहन सबको वो फ़िल्म देखनी पड़ती है.”

 मेरे ख़याल से हर फ़िल्ममेकर को अपने करियर में बच्चों की कम से कम दो-तीन फ़िल्में ज़रूर बनानी चाहिए और यह नहीं भूलना चाहिए कि हम भी कभी बच्चे थे. मेरी तो मुहिम मकड़ी से ही शुरू हो गई है और आगे भी जारी रहेगी
विशाल भारद्वाज, निर्देशक

मकड़ी, मक़बूल, ओमकारा जैसी फ़िल्मों के निर्देशक विशाल भारद्वाज भी मानते हैं कि हमारी इंडस्ट्री में बच्चों की फ़िल्में कम बनती हैं.

वे कहते हैं, “मनोरंजन इंडस्ट्री का एक हिस्सा होने के बावजूद हम बच्चों को कोई अहम दर्जा नहीं देते हैं. मेरे ख़याल से हर फ़िल्ममेकर को अपने करियर में बच्चों की कम से कम दो-तीन फ़िल्में ज़रूर बनानी चाहिए और यह नहीं भूलना चाहिए कि हम भी कभी बच्चे थे. मेरी तो मुहिम मकड़ी से ही शुरू हो गई है और आगे भी जारी रहेगी.”

फ़िल्म समीक्षक तरन आदर्श कहते हैं, “बच्चे बहुत ही महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं और मुझे हमेशा से यही लगता है कि वही सचमुच के दर्शक भी हैं. उन्हें बड़े या फिर छोटे बजट से कोई लेना-देना नहीं होता है इसलिए अगर फ़िल्म अच्छी है तो चलेगी, वरना नहीं”.

भविष्य में बच्चों की फ़िल्मों का यह दौर जारी रहेगा या नहीं, यह बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि इन फ़िल्मों को कितनी सफलता मिलती है.

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