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'फ़ाइनल सॉल्यूशन' बर्लिन में पुरस्कृत | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
बर्लिन फ़िल्म समारोह 2004 में भारतीय फ़िल्म 'फ़ाइनल सॉल्यूशन' को पुरस्कृत किया गया है. राकेश शर्मा की इस फ़िल्म में गुजरात दंगों की पृष्ठभूमि में घृणा की राजनीति का विश्लेषण किया गया है. प्रतिष्ठित वोल्फ़गंग स्टाउट पुरस्कार के लिए 'फ़ाइनल सॉल्यूशन' का मुक़ाबला बर्लिन फ़िल्म समारोह के विशेष फ़ोरम खंड में 30 देशों की 90 से ज़्यादा फ़िल्मों से था. इन फ़िल्मों में भारत की चार अन्य फ़िल्में 'कल हो न हो', 'हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी', 'हवा आने दे' और 'मक़बूल' शामिल थीं. लंबी फ़िल्म फ़ोरम में शामिल सबसे लंबी फ़िल्म 'फ़ाइनल सॉल्यूशन' में दो साल पहले गुजरात में हुए सांप्रदायिक दंगों की गहराई से पड़ताल की गई है.
डॉक्यूमेंट्री शैली में बनी 218 मिनट की इस फ़िल्म में फ़रवरी 2002 से जुलाई 2003 के बीच के गुजरात को फ़िल्माया गया है. फ़िल्म में सांप्रदायिक दंगों की विभीषिका को भोगने वाले मुसलमानों और हिंदुओं की दास्तान तो है, साथ ही कट्टरपंथी ताक़तों के उभार को भी समझने की कोशिश की गई है. बर्लिन फ़िल्म समारोह में 'फ़ाइनल सॉल्यूशन' का विशेष उल्लेख बेहतरीन एशियाई फ़िल्म के नेटपैक पुरस्कार की जूरी ने भी किया. फ़िल्मकार श्याम बेनेगल के सहायक के रूप में अपना कैरियर शुरू करने वाले राकेश ने कई साल टेलीविज़न पत्रकार के रूप में भी काम किया है. इससे पहले 2002 में उनकी फ़िल्म 'ऑफ़्टरशॉक्स: द रफ़ गाइड टू डेमोक्रेसी' अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत हो चुकी है. |
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