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शुक्रवार, 06 फ़रवरी, 2004 को 18:05 GMT तक के समाचार
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नाराज़ फ़िल्मकारों की पहल

फ़िल्म फ़ेस्टिवल
फ़िल्म फ़ेस्टिवल में काफ़ी लोगों ने रुचि दिखाई
मुंबई इंटरनेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल यानी एमआईएफ़एफ़ की चयन प्रक्रिया से नाराज़ फ़िल्मकारों ने एक अलग डॉक्युमेंट्री फ़िल्मोत्सव का आयोजन किया है.

इसका नाम रखा गया है--'विकल्प'.

'विकल्प' में कुल 57 फ़िल्में दिखाई जा रही हैं इनमें 13 फ़िल्में वे हैं जो एमआईएफ़एफ़ ने चुनी थीं लेकिन उनके निर्देशकों ने 'विकल्प' को बेहतर मंच माना और वहाँ चले गए.

बाक़ी फ़िल्में वे हैं जिन्हें एमआईएफ़एफ़ ने नहीं चुना था और नाराज़ निर्माता-निर्देशक 'विकल्प' की ओर चले गए.

फ़िल्म निर्माता पंकज रिशी कुमार की चुनाव प्रक्रिया पर बनी फ़िल्म 'मत' को भी एमआईएफ़एफ़ के लिए नहीं चुना गया था और वे आरोप लगाते हैं कि इसका कारण राजनीतिक था.

पंकज कहते हैं, "अगर आप ठुकराई गई फ़िल्मों की सूची देखें तो आपको पता चलेगा कि ज़्यादातर फ़िल्में राजनीतिक हैं, ये फ़िल्में दुनिया के कई देशों में दिखाई गई हैं और उन्हें सम्मान भी मिला है."

नाराज़गी

एमआईएफ़एफ़ का आयोजन भारत सरकार की संस्था फ़िल्म्स डिवीज़न दो वर्ष में एक बार करती है और फ़िल्मों की चयन प्रक्रिया को लेकर हमेशा हंगामा मचता है.

लेकिन यह पहली बार हुआ है कि फ़िल्मकारों ने नाराज़ होकर अपना अलग ही फ़ेस्टिवल शुरू कर लिया है.

पिछले महीने एमआईएफ़एफ़ के निर्णायक मंडल के सदस्य गिरीश कर्नाड ने यह कहते हुए इस्तीफ़ा दे दिया था कि वे फ़िल्मों के चयन से नाख़ुश हैं.

एक फ़िल्म का पोस्टर
विकल्प के आयोजन में कई फ़िल्में सामाजिक मुद्दों पर केंद्रित रहीं

मगर एमआईएफ़एफ़ के निदेशक रघु कृष्णा सभी आरोपों को बेबुनियाद बताते हैं और चुनाव प्रक्रिया को पूरी तरह निष्पक्ष बताते हैं.

उनका कहना है कि "हम पर किसी फ़िल्म को चुनने या ठुकराने के लिए कोई दबाव नहीं था, किसी भी तरह की सेंसरशिप का आरोप पूरी तरह बेबुनियाद है."

दिलचस्पी

केरल सरकार की नीतियों के बारे में फ़िल्म बनाने वाली सुरभि शर्मा की 'आमाकार' को एमआईएफ़एफ़ ने चुन लिया था लेकिन उन्होंने विकल्प में जाने का फ़ैसला किया और अपनी फ़िल्म वापस ले ली.

 अगर आप ठुकराई गई फ़िल्मों की सूची देखें तो आपको पता चलेगा कि ज़्यादातर फ़िल्में राजनीतिक हैं, ये फ़िल्में दुनिया के कई देशों में दिखाई गई हैं और उन्हें सम्मान भी मिला है
पंकज रिशी कुमार

वे कहती हैं, "मैं ऐसे उत्सव में नहीं रह सकती जिसमें असंतोष की आवाज़ को शामिल न किया जाए. हमें लगा कि अब समय आ गया है कि अपने लिए अलग जगह बनाई जाए."

अंतरराष्ट्रीय फ़िल्मकारों, फ़िल्म के छात्रों और दर्शकों ने भी विकल्प में ख़ासी दिलचस्पी दिखाई है.

फ़िल्म निर्माण का कोर्स कर रहीं वाणी अरोड़ा कहती हैं, "मैं एमआईएफ़एफ़ की फ़िल्मों से ख़ुश नहीं हूँ क्योंकि वे एकतरफ़ा हैं, लेकिन विकल्प में मुद्दों के सारे पहलू सामने रखे गए हैं और फ़िल्मकार से चर्चा का मौक़ा भी मिलता है."

पहली बार की सफलता को देखकर लग रहा है कि अब शायद 'विकल्प' का आयोजन हर वर्ष हो.

पंकज कुमार कहते हैं, "फ़िल्मकारों को ये बात समझ में आ गई है कि एकता में शक्ति है और अब विकल्प मुंबई में ही नहीं बल्कि पूरे देश के छोटे-छोटे शहरों में भी आयोजित होगा."

सरकारी व्यवस्था और चयन प्रक्रिया से नाराज़गी के नतीजे के तौर पर पहली बार समानांतर आयोजन हुआ और वह सफल रहा, इससे फ़िल्मकारों का हौसला ज़रूर बढ़ा है.

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