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सोमवार, 16 फ़रवरी, 2004 को 11:18 GMT तक के समाचार
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समाज में युवकों की भूमिका का चित्रण

'हवा आने दे' का एक दृश्य
'हवा आने दे' में भारतीय युवाओं को उपभोक्तावाद की चपेट में दिखाया गया है
भारत के एक नए फ़िल्मकार पार्थो सेनगुप्ता की पहली ही फ़िल्म 'हवा आने दे' को बर्लिन फ़िल्म समारोह में जगह मिल गई. पहले वे सेट डिज़ाइनर हुआ करते थे.

पार्थो ने बर्लिन में बीबीसी हिंदी ऑनलाइन से बातचीत की.

*अपनी पहली ही फ़िल्म को एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मंच मिलने के बारे में आप क्या कहेंगे?

यह एक बड़ी उपलब्धि है मेरे लिए. 'हवा आने दे' एक सामाजिक-राजनीतिक फ़िल्म है. इसके माध्यम से मैंने ऐसा संदेश देने की कोशिश की है जो लोगों को सवाल उठाने पर मजबूर कर सके.

*क्या कहना चाहा है आपने इस फ़िल्म के ज़रिए?

'हवा आने दे' में मैंने एक सरल कहानी में पेचीदा चीज़ों को समेटने की कोशिश की है. इसमें भारतीय मध्य वर्ग पर ग्लोबलाइज़ेशन के, कन्ज़ूयमरिज़्म के प्रभाव का चित्रण है. और यह सब भारत-पाकिस्तान तनाव की पृष्ठभूमि में दिखाया गया है. फ़िल्म में आप मुख्य भूमिकाओं में दो युवाओं के अलावा टेलीविज़न को भी पाएँगे जो कि उपभोक्तावाद का प्रतिनिधित्व करता है.

*आप इसे व्यक्तिगत फ़िल्म क्यों बताते हैं?

मैं ख़ुद मुंबई के मध्यवर्गीय इलाक़े शिवाजी पार्क से हूँ. मैंने देखा है कि कैसे उपभोक्तावाद के असर में आज के युवा अपने सामाजिक सरोकारों की अनदेखी कर रहे हैं, और कैसे नेता लोग इस प्रवृति का फ़ायदा उठा रहे हैं. 'हवा आने दे' में मैंने इन अनुभवों को स्वर दिया है.

पार्थो सेन गुप्ता
अपनी अलग की फ़िल्म स्टाइल बनाना चाहते हैं पार्थो सेन गुप्ता

*आपने किस फ़िल्मकार को अपना आदर्श बनाया है?

किसी को भी नहीं. मैंने अपना ख़ुद का एक स्टाइल बनाया है. मेरा तो मानना है कि हर अच्छे फ़िल्मकार का अपना व्यक्तिगत स्टाइल होना चाहिए जैसा कि हर कवि, हर चित्रकार की अपनी विशेष शैली होती है.

*आपने फ़्रांस में फ़िल्म की पढ़ाई की है. आपको वहाँ किस तरह का प्रशिक्षण मिला?

फ़्रांस में रह कर ही मैंने फ़िल्म को 'फ़र्स्ट पर्सन एकाउंट' बनाना सीखा, वरना भारत में तो कहानी को 'थर्ड पर्सन' में कहने पर ज़ोर दिया जाता है. मैं सेट डिज़ाइनर के तौर पर बहुत पहले से बॉलीवुड से जुड़ा रहा हूँ. अपनी फ़िल्म में मैंने भारतीय शैली को पाश्चात्य शैली के साथ मिलाने की कोशिश की है.

*'हवा आने दे' का निर्माण फ़्रांस की एक फ़िल्म कंपनी के साथ मिल कर किया गया है. आपको 'को-प्रोडक्शन' के क्या फ़ायदे या नुक़सान दिखे?

फ़िल्म से संबंद्ध भारत और फ़्रांस की टीमों को परस्पर बहुत कुछ सीखने को मिला. फ़्रांसीसी तकनीशियनों के लिए भारत आ कर काम करना एक नया अनुभव था, वहीं फ़्रांस में पोस्ट-प्रोडक्शन का काम करने के दौरान हमें बहुत कुछ सीखने को मिला. किसी भी को-प्रोडक्शन में 'लॉजिस्टिक लेवल' पर परेशानियाँ तो होती ही हैं और पैसे को लेकर भी थोड़ी खींचतान होती है क्योंकि दोनों देशों में मेहनताने का अलग-अलग स्तर होता है.

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