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मुंबई में बाल नाट्य महोत्सव की धूम | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
गर्मी की छुट्टी में बच्चे क्या करते हैं? कुछ परिवार के साथ नए शहरों और देशों की सैर करने चले जाते हैं कुछ घर में खूब टीवी देखते हैं और कुछ बच्चे दिन भर खेलते रहते है. लेकिन मुंबई के बाल कलाकार लगभग डेढ़ महीने के लिए दूसरे बच्चों और बड़ों का मनोरंजन कर रहे हैं. छह मई से मुंबई के सभी थियेटरों में बच्चों का एक नाटक उत्सव चल रहा है जो देश में पहली बार हो रहा है. यह 16 जुलाई तक जारी रहेगा. अभिनेता शशि कूपर की बेटी और पृथ्वी थियेटर की कर्ताधर्ता संजना कपूर इस आयोजन के बारे में बताती हैं, “ कुल 16 प्रोडक्शन हाउस 104 शो कर रहे हैं. ये नाटक चार अलग स्थानों में चलाए जा रहे हैं. हमें उम्मीद है लगभग 21 हज़ार लोग देखने आएंगे.” समीर लेयेंगर भी पृथ्वी थियेटर से जुड़ी हैं. वह कहती हैं, “ज़बर्दस्त सफलता मिल रही है. शॉ पूरी तरह से हाउसफुल जा रहे हैं.” कुछ नाटकों में बाल कलाकार लोगों को हँसाने का काम कर रहे हैं तो कुछ में गंभीर मुद्दों को उठाने का. बच्चों ने पूछे सवाल “अगर और मगर” नाटक में जिसे गुलज़ार ने लिखा है. इसमें पुरानी रीति-रिवाजों को चुनौती दी गई है. मिताली लाड इस नाटक की एक बाल अभिनेत्री हैं. लाड बताती हैं, “यह नाटक है रिवाजों और परंपराओं के बारे में है जो सालों से चलती आ रही हैं लेकिन किसी ने भी कोशिश नहीं की है उन पर सवाल करने की. इस नाटक के द्वारा हम बच्चे यह सवाल पूछते हैं.”
नाटक “पर हमें स्कूल जाना है” एक गंभीर मुद्दे को मनोरंजक अंदाज़ में उठाने की कोशिश करता है. सुशील मोथिल ने इसमें एक खास भूमिका निभाई है. वो कहते हैं कि इस नाटक का उद्देश्य बच्चों में सांप्रदायिक सदभावनाओं को जगाना है. सुशील बताते हैं, “कहानी मुंबई में 1992 के दंगे के इर्दगिर्द घुमती है. नफ़रत के कारण बच्चों के माता पिता अपने अपने बच्चों को अपने समुदाय के स्कूल भेजने लगते हैं. लेकिन बच्चे आपस में मिलकर एक रणनीति बनाते हैं क्योंकि उन्हें साथ रहना है. उनके बीच हिंदू-मुस्लिम का भेदभाव नहीं है. आखिरकार उनकी रणनीति सफल होती है.” इस उत्सव की खास बात यह है कि बड़े भी बच्चे बनकर हिस्सा ले रहे हैं. मराठी भाषा में लिखे गए नाटक “पहले पान ” और “ इपान बाबा पान” इसका उदाहरण है. पुणे से आई शिभांग्ली दावले कहती हैं “इसकी खासियत यह है कि इन खेलों में बड़े कलाकार बच्चों का रोल अदा करते हैं. दूसरी खासियत यह कि यह नाटक बच्चों के बारे में होते और उनकी समस्याओं के बारे में होते हैं. इनमें न तो राजा रानी की कहानियाँ होती है और न ही भूत प्रेतों की कहानियाँ होती हैं इनमें स्कूल हैं, पापा-मम्मी हैं.” समस्याएँ पर क्या आजकल के कार्टून नेटवर्क, मल्टीप्लेक्स सिनेमा घरों, डीवीडी और हैरी पॉटर के दौर में बच्चे थियेटर जाकर नाटक देखना पसंद करेंगे? संजना कपूर कहती हैं, “मेरे ख्याल से थियेटर की जगह कोई और माध्यम नहीं ले सकता. जब रेडियो टीवी फ़िल्म और डीवीडी आया तो लोगों ने हमेशा कहा नाटक का दौर खत्म हो जाएगा. लेकिन थियेटर अभी भी ज़िंदा है.” लेकिन यह भी सही है कि नाटक और मंच को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. दर्पण मिश्रा 19 वर्षों से बच्चों के नाटक से जुड़े हैं. वो कहते हैं “सरकार की मदद के बिना नाटक ज़िंदा नहीं रह सकता. पृथ्वी थियेटर की तरह मुंबई में पाँच-सात और थियेटर चाहिए. सिर्फ़ मुंबई में नहीं, बल्कि दूसरे शहरों में भी.” छोटे स्तर पर ही सही इसकी शुरूआत हो चुकी है. अब कुछ थियेटरों को निजी कंपनियों से आर्थिक सहायता मिलने लगी है. और आर्थिक मदद के साथ बाल अभिनेताओं की एक पीढ़ी भी तैयार हो रही है. शायद भारत में नाटक की कला दोबारा ज़िंदा हो रही है. | इससे जुड़ी ख़बरें कनाडा में लॉर्ड ऑफ़ द रिंग्स अब मंच पर24 मार्च, 2006 | मनोरंजन सफल रहा आठवाँ भारत रंग महोत्सव15 जनवरी, 2006 | मनोरंजन लंदन में पैर पसारता पंजाबी थियेटर19 दिसंबर, 2005 | मनोरंजन गांधी-नायडू के पत्र व्यवहार पर नाटक 17 अगस्त, 2005 | मनोरंजन कबीर बेदी दिल्ली लौटना चाहते हैं 06 जून, 2005 | मनोरंजन थियेटर को जया बच्चन का तोहफ़ा15 जनवरी, 2005 | मनोरंजन | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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