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सफल रहा आठवाँ भारत रंग महोत्सव | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
दर्शकों को बाँधने वाले संवाद, तबलों और तालियों की थाप, नैपथ्य का संगीत और मंच पर जीवंत होती कहानियाँ-नाटक, कुछ ऐसी ही तस्वीर थी दिल्ली में इस वर्ष की शुरुआत में आयोजित हुए आठवें भारत रंग महोत्सव की, जो अपने में कई तरह के विमर्श और बिंबों को समेटे हुए था. बारह दिनों तक दुनिया के 10 देशों से आए क़रीब 60 नाटकों के मंचन के बाद शनिवार को देर रात इस महोत्सव का समापन हुआ. इनमें पाकिस्तान, लेबनान, चीन, जापान, नेपाल, बांग्लादेश, ईरान, श्रीलंका और दक्षिण कोरिया जैसे देशों से आई नाट्य प्रस्तुतियों को लोगों ने काफ़ी पसंद किया. सबसे ख़ास बात तो यह थी कि इस बार बाहर से आए नाटकों का चयन केवल इसलिए नहीं किया गया कि वे अन्य देशों के हैं बल्कि इस बार महोत्सव का मुख्य फ़ोकस एशियाई और अरब देशों के प्रतिनिधित्व पर आधारित था. कोशिश यह थी कि इन देशों में फैले रंगमंच की विविधता से दर्शकों को रूबरू कराया जाए जिससे दर्शकों को तो लाभ मिले ही, साथ ही भारत में रंगकर्म से जुड़े लोगों को रंगमंच को कई नए और प्रयोगधर्मी आयामों से देखने का मौका भी मिले. प्रस्तुतियां महोत्सव का समापन हुआ तो लोगों की वाह-वाह के साथ मूल्यांकन और विशेष टिप्पणियों से राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के गलियारे गूंज उठे. लोगों की इन बातों से यह तो साफ़ था कि पिछले दो-तीन वर्षों की तुलना में इस बार का आयोजन ज़्यादा सफल और सराहनीय था. पर सबसे ज़्यादा प्रशंसा बटोरी अन्य देशों से आए हुए नाटकों ने, इसलिए नहीं कि ये प्रस्तुतियां विदेशी थीं, बल्कि इसलिए कि इनको देखने के बाद लगा कि मंचकला में अभी भी बहुत कुछ हो रहा है और भारतीय रंगमंच को अभी बहुत कुछ सीखना है. सबसे ज़्यादा पसंद किया गया चीन का 'पेकिंग ओपेरा' और जापान का 'ओथेलो'. दक्षिण कोरिया के 'रोमियो जूलियट' और पाकिस्तान के 'नवाब साहिब क़िब्ला' को भी कम वाहवाही नहीं मिली. विषयों की बात करें तो शेक्सपियर से लेकर प्रेमचंद तक और सलमान रूश्दी से लेकर तमाम समसामयिक घटनाओं को लोगों के मंच पर जीवंत होते देखा पर बहस फिर भी क़ायम रही, हिंदी में नए और अच्छे नाटक क्यों नहीं लिखे जा रहे. डॉक्यूमेंट्री नाटक महोत्सव में सबसे अलग प्रस्तुति थी लेबनान से आए नाटक 'लुकिंग फ़ॉर ए मिसिंग ऐंप्लाई' की.
रज़बीह म्रूई के निर्देशन वाला यह नाटक लेबनान में पिछले कुछ वर्षों में संदिग्ध रूप से अपहृत सरकारी मुलाज़िमों की मौतों का एक दस्तावेज था. अख़बारों में प्रकाशित ख़बरों से लेकर सरकारी कागज़ातों के इस्तेमाल वाले इस डॉक्यूमेंट्री नाटक को एकदम नए प्रयोग के तौर पर देखा जा रहा है. निर्देशक म्रूई इस बाबत बताते हैं, "मंच पर इस तरह के प्रयोग क्यों नहीं हो सकते. मैंने सिर्फ़ यह बताने की कोशिश की है कि लेबनान में पिछले वर्षों में क्या हुआ है. मैंने इसके दस्तावेजों को जुटाया है और मंच के ज़रिए इसे लोगों के सामने रखा है." ख़ुद भारतीय निर्देशक सुधनवा देशपांडे इस बाबत कहते हैं, "इस नाटक ने लोगों को एक नई दिशा दी है कि रंगमंच में इस तरह के प्रयोग भी किए जा सकते हैं और यह सार्थक रंगमंच का एक बड़ा उदाहरण है." निराशा भारत से इस महोत्सव में क़रीब चार दर्जन नाटक दिखाए गए पर उंगलियों पर गिनी जा सकनेवाली कुछ प्रस्तुतियों को छोड़ दें तो बाकी नाटकों से निराशा ही मिली.
इस बाबत जानी-मानी रंगकर्मी और निर्देशक डॉ. रीता गांगुली कहती हैं, "कोई भी आयोजन आदर्श नहीं हो सकता है. कुछ ख़ामियां तो हैं साथ ही कुछ भारतीय निर्देशकों को सीखने की भी आवश्यकता है." गांगुली बताती हैं कि आयोजन में आए नाटकों को देखकर इतना तो कहा जा सकता है कि जबतक लोग हैं, रंगमंच ज़िंदा रहेगा. ख़ुद सुधनवा देशपांडे यह कहने से नहीं चूकते कि भारतीय नाटकों से अब नाटककार ग़ायब होता जा रहा है. केवल निर्देशक और समूहों के नाम पर बहुत दिनों तक नाटक नहीं किया जा सकता. हालांकि जानी-मानी निर्देशक और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की प्रोफ़ेसर त्रिपुरारी शर्मा कहती हैं, "भारतीय नाटकों में इसबार उत्तर-पूर्वी राज्यों से काफ़ी नाटक आए और अंग्रेज़ी में भी कई नाटक किए गए, जो विस्तार का संकेत है." भारत से गिरीश कर्नाड, मोहन अगासे, हबीब तनवीर, सुधनवा देशपांडे, वामन केंद्रे जैसे निर्देशकों के नाटकों को काफ़ी सराहना मिली वहीं कई नामी निर्देशकों ने निराश भी किया. पाकिस्तानी निर्देशक उस्मान पीरज़ादा इस बारे में एक अहम संकेत देते हैं. उन्होंने बताया, "भारत में तो रंगमंच के लिए एनएसडी जैसे संस्थान हैं मगर पाकिस्तान में तो हम एक-दूसरे से ही सीखते हैं पर लाहौर में नाटकों के लिए एक टिकट पाँच हज़ार तक बिकता है. ऐसा भारत में शायद ही होता हो." इतना तो साफ़ है कि रंगमंच नई सदी में तकनीकी के इस्तेमाल के साथ नए कलेवर में सामने आ रहा है जिसके पास अपने अस्तित्व की बहस है तो प्रयोगों से उपजती नई आशाएं और संभावनाएं भी, पर भारतीय रंगमंच को इस वक्त दोनों को समझना है, तकनीकी को भी और दुनिया के रंगमंच की कदमताल को भी. | इससे जुड़ी ख़बरें काबुल के रंगमंच पर शेक्सपियर के रंग09 सितंबर, 2005 | मनोरंजन 'हिंदी रंगमंच पीछे छूटता जा रहा है'26 जून, 2005 | मनोरंजन शेक्सपियर का नाटक अनूठे अंदाज़ में24 अक्तूबर, 2004 | मनोरंजन अब भी रास्ता दिखाता है पृथ्वी थिएटर 19 अगस्त, 2004 | मनोरंजन हिंदी फ़िल्मों में थिएटर से आए एक्टर19 अप्रैल, 2004 | मनोरंजन | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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