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रविवार, 24 अक्तूबर, 2004 को 08:58 GMT तक के समाचार
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शेक्सपियर का नाटक अनूठे अंदाज़ में

नाटक का एक दृश्य
नाटक का काफ़ी सहज और मनोरंजक लगता है
शेक्सपियर के नाटक न जाने दुनिया भर में कितनी भाषाओं में मंचित हुए हैं लेकिन यह नाटक अपने प्रस्तुतिकरण की वजह से बिल्कुल अनूठा है.

नाटक देखने वाले कुछ समय के लिए भूल जाते हैं कि वे लंदन के एलबरी थिएटर में हैं न कि भारत के केरल में.

शेक्सपियर के मशहूर नाटक 'ट्वेल्फ्थ नाइट' की कहानी और उसके संवादों को तो नहीं छेड़ा गया है लेकिन उसमें बाक़ी सब कुछ भारतीय है.

यहाँ तक कि थिएटर पहुँचने के रास्ते में सड़क को चटक रंग के फूलों से भारतीय शैली में सजाया गया है.

नाटक का सेट, उसके कलाकार, संगीत सब भारतीय है, नाटक में ज़रूरत की वजह से हिंदी के कुछ शब्द और गाने हैं तो ज़रूर लेकिन बाक़ी पूरे संवाद शेक्सपियर के ही हैं.

बहुत सारे लोग तो इस भ्रम में नाटक देखने पहुँच गए कि यह नाटक हिंदी में होगा.

नाटक में केरल के एक छोटे से गाँव की कहानी दिखाई गई है जिसका नाम इलरिया है.

यह शेक्सपियर का रखा हुआ एक काल्पनिक नाम है और नाटक के निर्देशक स्टीफ़न ब्रेसफर्ड कहते हैं कि यह कहीं भी हो सकता है, ज़रूरी नहीं है कि वह इंग्लैंड में ही हो.

वे कहते हैं, "इससे पहले किसी ने नहीं सोचा कि इलरिया भारत में भी हो सकता है, क्यों नहीं हो सकता."

 इससे पहले किसी ने नहीं सोचा कि इलरिया भारत में भी हो सकता है, क्यों नहीं हो सकता
निर्देशक

नाटक में शेक्सपियर की शैली के साथ बिल्कुल खरा उतरता है और उसमें पूरी सहजता दिखाई देती है, शेक्सपियर के ज़माने की कई सचाइयाँ ऐसी हैं जो आज के भारत के ग्रामीण परिवेश में मिलती हैं.

मिसाल के तौर पर शेक्सपियर के नाटक में विधवा महिलाओं का अजनबी लोगों से मुँह ढँककर मिलना भारतीय विधवाओं की स्थिति से बहुत अलग नहीं है.

राजा-रानियाँ उनके सेवक, सड़क पर तमाशा दिखाने वाले नट-बाज़ीगर, गीत-संगीत सब कुछ नाटक में एक सहज भारतीय रंग भर देते हैं.

दरअसल, सोलहवीं सदी में लिखा गया नाटक भारतीय परिस्थितियों में इतनी आसानी से ढल गया है कि भाषा समझ में न आने की समस्या भी काफ़ी हद तक हल हो जाती है.

नाटक में हास्य काफ़ी है जो धर्म, सेक्स और विवाह जैसे विषयों पर तीख़ी व्यंगात्मक टिप्पणियाँ करता है.

आप भारतीय हों या न हों, यह नाटक शेक्सपियर को समझने की दृष्टि से आसान तो बना ही देता है और मनोरंजक तो है ही.

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