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मंगलवार, 14 सितंबर, 2004 को 11:39 GMT तक के समाचार
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उगते सूर्य के देश के हिंदीप्रेमी

जापान के हिंदीप्रेमी
जापानी दल हिंदी में नाटक पेश कर रहा है
उगते सूरज के देश जापान से हिंदी प्रेम का पैग़ाम लेकर एक अनूठा दल इन दिनों भारत दौरे पर है.

ओसाका विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर मिज़ोकामी के नेतृत्व में ये दल रंगमंच के ज़रिए पूरी दुनिया में हिंदी के प्रचार-प्रसार में जुटा है.

14 सितंबर को हिंदी दिवस के मौके पर इन्होंने देहरादून में नाटक पेश किये.

 मैं हिंदी फिल्मों की हीरोइनों की तरह ही बोलना चाहती हूँ
ली यो शिये

साड़ी बाँधे,बिंदी लगाये जापानी युवतियाँ जब मंच पर आईं तो लोग उन्हें देखते रह गये लेकिन जब उन्होंने धाराप्रवाह हिंदी में संवाद भी बोलना शुरू किया तो सब हैरत में पड़ गये.

सबके दिल में बस यही सवाल उठा कि इन्होंने हिंदी को कैसे अपनाया.

फ़िल्मों के लिए हिंदी

जापानी कलाकार ली यो शिये ने खिलखिलाते हुए लोगों की उत्सुकता का जवाब दिया,"क्योंकि मुझे हिंदी फिल्में बहुत पसंद हैं इसलिये मैंने हिंदी सीखी."

"मैं हिंदी फिल्मों की हीरोइनों की तरह ही बोलना चाहती हूँ”ये कहते हुये ली दिल चाहता है फिल्म का टाइटल गीत गुनगुना उठती हैं.

जापानी दल
जापानी दल के नाटक में हिंदी फ़िल्मों के गीत भी पेश किए जाते हैं

ली को देखकर बरबस ही रूस,अमरीका और अफ्रीका के उन दीवानों की याद आ गई जिन्हें लता और किशोर के गाने मुँहज्ञबानी याद रहते हैं.

हिंदी गीतों की इसी लोकप्रियता को देखते हुये ही शायद जापानी दल की नाटक प्रस्तुतियों में भी फ़िल्मी गानों का भी इस्तेमाल किया गया.

पहले नाटक “क्षुधारहित युग” में आनेवाले जीवन की विडँबनाएं दिखाने की कोशिश थी जब शायद जीवन में भूख का अहसास बदल चुका होगा और भोजन का मतलब एक दवा की गोली भर रह जाएगा.

वहीं सास बहू के रिश्तों पर आधारित दूसरे नाटक “सासूजी सावधान” ने लोगों को खूब हँसाया.

निर्देशक प्रो.मिज्ञोकामी कहते हैं,"भाषा के प्रचार के लिये लोकप्रिय माध्यमों के साथ-साथ लोकप्रिय विषय भी ज़रूरी हैं."

हिंदी का हक़ नहीं मिला

प्रो.मिज़ोकामी ओसाका विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के अध्यक्ष हैं.

वे पिछले 36 साल से हिंदी के प्रचार प्रसार से जुड़े हैं और इस बात पर अफ़सोस ज़ाहिर करते हैं कि हिंदी को वो अंतरराष्ट्रीय सम्मान नहीं मिल पाया है जिसकी वो हकदार है.

 इन्हें देखकर प्रेरणा मिलती है कि हम हिंदी में औऱ अच्छा काम करे. रंगमंच वास्तव में हिंदी के प्रसार में मददगार हो सकता है
श्रेय डोभाल, रंगकर्मी

उनकी राय में इसमें बाधक भी खुद भारतीयों की मानसिकता ही है.

वो कहते हैं,"एक ही बाधा है-अंग्रेज़ियत...आप अंग्रेज़ी ज़रूर सीखें हम भी सीखते हैं लेकिन साथ साथ हिंदी भी चलती रहे."

वे कहते हैं कि किसी सेमिनार में अग्रेज़ी ज़रूरी हो सकती है लेकिन जहां ज़रूरी नहीं वहाँ भी अंग्रेज़ी बोलना दिखावा है.

रंगमंच के ज़रिए हिंदी का पैगाम लेकर आए इन हिंदीप्रेमियों को देखकर लोग प्रभावित हुए.

मशहूर रंगकर्मी श्रीश डोभाल का कहना था कि,"इन्हें देखकर प्रेरणा मिलती है कि हम हिंदी में औऱ अच्छा काम करे. रंगमंच वास्तव में हिंदी के प्रसार में मददगार हो सकता है.”

जापान का ये हिंदी दल अपने मिशन को लेकर ब्रिटेन, मॉरिशस, इंडोनेशिया सहित 17 से ज़्यादा देशों में अपने नाटक पेश कर चुका है.

अब उत्तरांचल और दिल्ली के बाद ये दल दक्षिण भारत के दौरे पर जाएगा.

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