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बादल का छाताः एक बाल कथा | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
एक था नन्हा सा बच्चा. नाम तो न जाने उसका क्या था, पर घर में सब उसे बचुआ कहकर बुलाते थे. एक दिन बचुआ घर के पास वाले सरस्वती पार्क में घूमने गया. वहाँ ढेर सारे बच्चे मिलकर खेल रहे थे. पर बचुआ का कोई दोस्त नहीं था. वह चुपचाप पार्क के एक कोने में बैठकर आकाश में उमड़-घुमड़ रहे बादलों को देख रहा था. बादलों की अजब-गजब शक्लें थीं. कोई हाथी, कोई ऊँट, कोई बहुत बड़े खरगोश तो कोई छुक-छुक रेलगाड़ी की शक्ल जैसा बादल भी था. कुछ हवाई ज़हाज की शक्ल में भूरे-सलेटी बादल भी थे. एक बादल तो ऐसा था, जैसे कोई बाघ मोटर साइकिल पर शान से बैठा, उसे चला रहा हो. और ये सारे अजीबोगरीब शक्लों वाले जानवर तेज़ी से दौड़ लगा रहे थे. देखकर बचुआ को बड़ा मज़ा आया. इतने में उसे लगा कि नन्हा सा बादल उसे देखकर हँसा है. यह देखकर बचुआ भी हँस पड़ा. थोड़ी देर में नन्हा बादल आसमान से उतरा और बचुआ के पास आकर खड़ा हो गया. बोला,‘‘आओ बचुआ, घूमने चलें. झटपट मेरे ऊपर बैठ जाओ.’’ बचुआ बड़ा खुश हुआ. वह बादल के ऊपर बैठा, तो नन्हा बादल झटपट उड़कर आसमान की ओर जाने लगा. बचुआ को थोड़ा-थोड़ा डर लग रहा था. बादल हँसकर बोला,‘‘आराम से टाँगें फैलाकर बैठ जाओ बचुआ और वह सामने वाली किरणों की डोरी पकड़ लो. फिर डर नहीं लगेगा.’’ बचुआ बैठ गया तो बादल और भी तेज़ी से उड़ने लगा. फिर वह एक जगह रुका. हँसकर बोला,‘‘बचुआ, ठंडी-ठंडी हवा में कही सो तो नहीं गए! देखो, हम जापान देश में आ गए हैं. आओ, नीचे उतरकर ज़रा यहाँ की खूबसूरती देखें.’’ जब वे घूमने निकले, तो थोड़ी-थोड़ी बारिश हो रही थी. नन्हा बादल बोला, ‘‘ठहरो, मैं कुछ करता हूँ.’’ और वह झट एक छाते में बदल गया. अब बादल के छाते के अंदर बचुआ देर तक घूमता रहा. वह ज़रा भी नहीं भीगा था. रास्ते में जहाँ कहीं बचुआ भटकता, छाता बना नन्हा, भूरा बादल उसे रास्ता दिखाता,‘‘बचुआ, ऐसे नहीं, ऐसे चलो.’’ बचुआ थक गया, तो नन्हा बालक एक चुस्त, फुर्तीला जापानी लड़का बन गया. उसने बादलों के रंग की टोपी पहनी हुई थी. उस पर बिजली की तरह चम-चम चमकते मोती लगे थे. वह जापानी लड़का बड़ा चुस्त और खुशदिल था. दौड़कर उसके लिए ढेर सारे फल और मेवे ले आया. कुछ देर बाद बचुआ फिर बादल पर बैठा और उड़ चला. अब नन्हे बादल ने उसे चीन देश की सैर कराई. वहाँ वह नीली आँखों वाली एक प्यारी सी चीनी लड़की ता शिंकू की शक्ल में उसके आसपास घूमता. इसी तरह नन्हे बादल ने बचुआ को पूरी दुनिया घुमा दी. इंगलैंड, जर्मनी, फ्राँस, अमरीका समेत उसने दुनिया के अजब-अजब तरह के लोग देखे. सुंदर नदियाँ, पहाड़ और समुद्र देखे. झीलें देखीं, जंगल और रेगिस्तान देखे. देखकर बचुआ खूब खुश हुआ. जिन चीज़ों को पहले उसने खाली भूगोल की किताब में पढ़ा था, आज उन्हें ख़ुद अपनी आँखों से देख पा रहा था. लौटा तो बचुआ को घर की बुरी तरह याद आ रही थी. अम्मा और बाबू जी याद आ रहे थे. सोच रहा था ‘वाह! उन्हें दुनिया के अजब-गजब रंग-रूपों के बारे में बताऊँगा, तो वे कितने खुश होंगे.’ उसने नन्हे बादल से कहा, तो वह हँसकर बोला,‘‘हाँ-हाँ बिलकुल...बिलकुल खुश होंगे. बताना उन्हें सारी बातें.’’ बचुआ नीचे उतरा, तो बादल एक सुंदर रिक्शा बन गया. सफेद रंग का चम-चम चमकता रिक्शा. उस पर एक सुंदर, सुनहरा छाता भी तन गया. बचुआ बैठा, तो वह रिक्शा ख़ुद-ब-ख़ुद चल पड़ा. बचुआ खुश-अहह...! वाह रे राम, दुनिया कितनी खूबसूरत है! उधर सड़क पर लोग यह देख रहे थे. हैरान होकर सोच रहे थे,‘अरे, यह क्या?.. यह तो अजब तमाशा है.’ तभी बचुआ का घर आ गया. बचुआ झट रिक्शे से उतरा और दौड़ते हुए अपने घर जा पहुँचा. वह झट अपनी अम्मा से मिला, बाबू से मिला. सबको अपनी अनोखी सैर के बारे में बताया. सब खुश थे. वाह रे वाह, अपने बचुआ ने तो बड़ा कमाल किया! बचुआ की अम्मा और बाबू जी ने सोचा कि बादल को धन्यवाद तो देना चाहिए. पर उन्होंने बाहर जाकर देखा, तो बादल गायब. वह ऊपर आसमान में जाकर बड़े प्यार से हँसता हुआ हाथ हिला रहा था. मानो विदा ले रहा हो. बाहर अब भी ढेरों लोग खड़े थे. सब पूछ रहे थे बचुआ की अम्मा और बाबू से कि बचुआ कौन से रिक्शे में बैठकर आया है? चाँदी जैसा चम-चम करता रिक्शा था. उस पर सुनहरा छत्र तना था. उसे तो कोई चला भी नहीं रहा था. अपने आप हवा में चलता जा रहा था. और फिर वह रिक्शा हमारे देखते-देखते हवा में उड़कर जाने कहाँ चला गया!... कैसे हुआ यह अजूबा? जब बचुआ ने बताया कि वह रिक्शा तो एक नन्हा खुशदिल बादल था और वही उसे सारी दुनिया में घुमाकर लाया है, तो लोग बड़े हैरान हुए. सब बचुआ से उसकी अनोखी यात्रा के बारे में पूछने लगे. बचुआ ने उन्हें सब कुछ बताया कि वह किस तरह उस नन्हे सैलानी बादल पर बैठकर दुनिया के अजब-अनोखे पर्वत, नदियाँ, झरने, झीलें और समंदर देखकर आया है, तो लोगों की खुशी का ठिकाना न रहा. अब बचुआ पार्क में जाता, तो अकेला न रहता. सब बच्चे बार-बार उसकी अजब-अनोखी कहानी सुनते. उसे अपने साथ खेल खिलाते और बातें करते. बचुआ ने पक्का वादा किया है कि अब के बादल आया, तो वह उन सबको अपने साथ बादल पर बैठ, सारी दुनिया की सैर कराने ले जाएगा. प्रकाश मनु | इससे जुड़ी ख़बरें 'धंधे का टेम है साब, खोटी मत करो न..'08 दिसंबर, 2006 | पत्रिका नई पीढ़ी को सलाम08 दिसंबर, 2006 | पत्रिका 'ग़रीबों, लाचारों को भी जगह देने की ज़रूरत है'08 दिसंबर, 2006 | पत्रिका एक बाल कविता08 दिसंबर, 2006 | पत्रिका सेलफ़ोन, कंप्यूटर, वीडियो गेम, आइपॉड?...'नो सर'08 दिसंबर, 2006 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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