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'ग़रीबों, लाचारों को भी जगह देने की ज़रूरत है'

राजू, अतिथि संपादक
राजू आश्रयहीन बच्चों की एक संस्था, 'जमघट' के साथ रहता है
मैं ख़बरें देखता रहता हूँ और अख़बार भी पढ़ता हूँ पर बीबीसी की हिंदी वेबसाइट देखना और वह भी उनके कार्यालय आकर, मेरे लिए यह पहला मौका था.

जब मुझसे कहा गया कि मैं पत्रिका के इस अंक का संपादन करूँ तो पहले तो मुझे हैरानी हुई. संकोच भी कि यह कैसे करूँगा पर फिर लगा कि इसे एक सीखने के मौके की तरह देखूँ.

मेरी माँ का देहांत तभी हो गया था जब मैं दो बरस का था. इसके बाद पिता, दो बहनों और बड़े भाई के साथ मैं रहा. इन्हीं लोगों ने मुझे पाला पर माँ की कमी हमेशा रही.

मैं पढ़ना चाहता था पर पिताजी ने काम में मदद करने को कहा. मेरी पढ़ाई छुड़वा दी गई. भाई घर से भाग गया और मैं भी ग़लत लड़कों के साथ नशे की आदत में पड़ गया.

बाद में भाई घर लौटा पर दिक्कतें कम होने के बजाए और बढ़ गईं. वो बदल चुका था और मुझे एक दुश्मन की तरह देखने लगा.

 देश में पढ़ाई और रोज़गार की बहुत दिक्कत है. मैं पढ़ना चाहता था पर पढ़ाई नहीं कर सका. जीने के लिए काम की ज़रूरत होती है पर लोगों को काम नहीं मिल रहा है

इससे मुझे बहुत तकलीफ़ पहुँची और मैंने घर छोड़ दिया. पिताजी शराब पीते हैं और घर में भाई ही सबपर हावी रहता है.

दिल्ली की एक संस्था 'जमघट' ने मुझे इस बुरे दौर से निकाला. मैंने नशा छोड़ दिया है और जिन लोगों ने मुझे नशा सिखाया था, उन्हें भी. मैं अब नशा करने वालों को समझाता हूँ कि इस तरह अपनी ज़िंदगी ख़त्म करने का कोई मतलब नहीं है.

आज मैं सिलाई का काम सीख रहा हूँ. कुछ चित्रकारी का भी शौक है. मेरा मन है कि आगे चलकर अपने पैरों पर खड़ा हो सकूँ और अपने परिवार के साथ ही अपने जैसे लोगों की सहायता कर सकूँ.

ख़बरों की बात

देश और दुनिया की कितनी ही बातें टीवी से लेकर इंटरनेट और अख़बारों में दिखती हैं. मुझे कई बातें बहुत पसंद आती हैं पर कुछ बातें ऐसी भी हैं जो बताई ही नहीं जातीं.

हम जैसे बच्चों के बारे में, उन लोगों के बारे में जो फ़ुटपाथों पर रहते हैं और जो बहुत ग़रीब हैं, उनके बारे में कहीं कुछ भी नहीं दिखाया जाता.

सरकार भी इस ओर ध्यान नहीं देती है. इसकी वजह से नशा, एड्स, अपराध, ग़रीबी जैसी समस्याओं से लोग परेशान हैं.

राजू, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम की संपादक सलमा ज़ैदी के साथ
राजू मानते हैं कि जिन लोगों ने अभाव देखे हैं, उनकी बातों को सामने लाने की ज़रूरत है

आज मेरी उम्र के कितने ही बच्चों के सामने पढ़ाई और फिर रोज़गार एक बड़ी ज़रूरत है जो पूरी नहीं हो पा रही है.

मैं चाहता हूँ कि इन बातों को भी ख़बरों में जगह दी जाए ताकि लोग जानें तो कि कहाँ पर किसके साथ बुरा हो रहा है. इससे सरकार को भी पता चलेगा कि किन लोगों को मदद की ज़रूरत है.

एक बात और, देश में पढ़ाई और रोज़गार की बहुत दिक्कत है. मैं पढ़ना चाहता था पर पढ़ाई नहीं कर सका. जीने के लिए काम की ज़रूरत होती है पर लोगों को काम नहीं मिल रहा है.

अगर इस दुनिया के लिए मुझे कभी कुछ करने का मौका मिलता है तो मैं पढ़ाई और रोज़गार पर ध्यान दूँगा. मैं नहीं चाहता कि जो तकलीफ़ें मैंने देखी हैं, वो किसी और को भी देखनी पड़े.

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